
पत्थरबाज़ी का मनोविज्ञान: असंतोष, पहचान और व्यवस्था की चूक !
देश में माहोल बिगड़ने की कई वजह है, आये दिन होने वाली स्टोन पेल्टिंग की घटनाये समाज में क्यों हो रही है ये एक गंभीर सवाल है, इसे मनोविज्ञान के चश्मे से देखे तो ये एक ऐसा जटिल मुद्दा दिखता है, जो समाज को विकृत बना रहा है | पत्थरबाज़ी केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है; यह एक गहरी मानसिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रिया का लक्षण है। मनोविज्ञान कहता है कि जब किसी समूह को लंबे समय तक यह महसूस होता है कि उसकी आवाज़ सुनी नहीं जा रही, उसके साथ न्याय नहीं हो रहा या उसकी पहचान को नकारा जा रहा है, तब असंतोष धीरे-धीरे प्रतीकात्मक हिंसा का रूप ले लेता है। पत्थर यहाँ हथियार से ज़्यादा एक संदेश बन जाता है—“हम मौजूद हैं, और हमें अनदेखा नहीं किया जा सकता।” यह व्यवहार अक्सर व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक होता है, जहाँ भीड़ व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी को धुंधला कर देती है और हिंसा को वैध ठहराने वाली मानसिक ढाल प्रदान करती है।
भारत के संदर्भ में यह मानना भ्रम होगा कि पत्थरबाज़ी किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित है। इतिहास बताता है कि जब-जब राजनीतिक संवाद कमजोर पड़ा, संस्थागत रास्ते अविश्वसनीय लगे और न्याय की प्रक्रिया धीमी या पक्षपाती महसूस हुई, तब-तब हिंसक विरोध को “तेज़ और असरदार” विकल्प की तरह देखा गया। समस्या यह नहीं कि भारत में संविधान या लोकतांत्रिक ढांचा नहीं है; समस्या यह है कि कई तबकों तक इसकी पहुँच अधूरी और अनुभव असमान है। जब चुनाव, अदालत, प्रशासन और मीडिया—चारों पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तब सड़क ही संसद बन जाती है और पत्थर तर्क का स्थान ले लेता है।
सामाजिक मनोविज्ञान यह भी बताता है कि ऐसी हिंसा अक्सर विचारधारा से ज़्यादा भावनाओं से संचालित होती है—क्रोध, अपमान और बदले की भावना से। बेरोज़गारी, शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट, स्थानीय नेतृत्व का अभाव और बाहरी उकसावे इस मानसिकता को खाद देते हैं। डिजिटल युग में अफ़वाहें, आधे-अधूरे सच और भावनात्मक नैरेटिव आग में घी का काम करते हैं, जहाँ विरोध का उद्देश्य समाधान नहीं, दृश्यता बन जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ विरोध विकृत हो जाता है—वह सत्ता से टकराने के बजाय समाज को ही नुकसान पहुँचाने लगता है।
यह कहना कि पत्थरबाज़ी “देशविरोध” है, अधूरा सच है; और यह कहना कि यह “एकमात्र रास्ता” है, खतरनाक भ्रम। असल सवाल यह है कि सिस्टम कहाँ चूक रहा है। जवाब साफ है: संवाद की निरंतरता में, स्थानीय समस्याओं के समयबद्ध समाधान में, निष्पक्ष पुलिसिंग में, और सबसे अहम—विश्वसनीय प्रतिनिधित्व में। जब लोकतंत्र केवल पाँच साल में एक बार वोट तक सिमट जाता है, तब रोज़मर्रा की भागीदारी के लिए खालीपन बनता है, जिसे उग्र विरोध भर देता है।
इसका समाधान पत्थरों के जवाब में और कठोरता नहीं, बल्कि रास्तों की विश्वसनीयता बहाल करना है। शांतिपूर्ण विरोध के लिए सुरक्षित और प्रभावी मंच, जवाबदेह प्रशासन, तेज़ न्याय, और युवाओं के लिए वास्तविक अवसर—ये वे तत्व हैं जो असंतोष को रचनात्मक दिशा दे सकते हैं। क्रांति का अर्थ अराजकता नहीं; उसका अर्थ है व्यवस्था को बेहतर बनाना। यदि विरोध दिशा देता है, तो वह बदलाव लाता है; यदि वह पत्थर उठाता है, तो अंततः अपने ही घर की खिड़कियाँ तोड़ता है। भारत के लिए चुनौती यह नहीं कि असंतोष है—चुनौती यह है कि उस असंतोष को सुना जाए, समझा जाए और लोकतांत्रिक रास्तों से हल किया जाए, ताकि गुस्सा हथियार न बने, बल्कि नीति।
Ankit Awasthi





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