
मुरली मनोहर जोशी: विचारधारा, विद्वत्ता और सत्ता के संगम की कहानी
5 जनवरी भारतीय राजनीति के लिए एक अहम तारीख़ है, क्योंकि इसी दिन डॉ. मुरली मनोहर जोशी का जन्म हुआ था। वह उन गिने-चुने राजनेताओं में हैं जिनकी पहचान सिर्फ़ सत्ता या चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि विचार, शिक्षा और संगठन—तीनों स्तरों पर उनका प्रभाव दिखाई देता है। एक तरफ़ वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकली वैचारिक परंपरा के प्रतिनिधि रहे, तो दूसरी ओर देश के शिक्षा और विज्ञान ढांचे को दिशा देने वाले केंद्रीय मंत्री भी।
डॉ. जोशी का जन्म 1934 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें सामान्य राजनेताओं से अलग करती है। उन्होंने भौतिकी (Physics) में उच्च शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन से लेकर शोध तक का अनुभव रखा। यही कारण रहा कि जब वह राजनीति में सक्रिय हुए, तो उनके भाषण और हस्तक्षेप सिर्फ़ नारे नहीं, बल्कि वैचारिक संदर्भों से भरे होते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका जुड़ाव छात्र जीवन से ही रहा और बाद में भारतीय जनता पार्टी के गठन व विस्तार में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।
राजनीतिक रूप से डॉ. मुरली मनोहर जोशी को सबसे ज़्यादा पहचान राम जन्मभूमि आंदोलन के दौर में मिली, जब वह लालकृष्ण आडवाणी के साथ पार्टी के प्रमुख वैचारिक स्तंभ के रूप में उभरे। हालांकि, उनकी भूमिका सिर्फ़ आंदोलन तक सीमित नहीं रही। वह कई बार लोकसभा के सदस्य बने और मानव संसाधन विकास मंत्री (अब शिक्षा मंत्रालय) तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। मंत्री रहते हुए उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों, शोध संस्कृति और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की बात ज़ोर देकर कही, भले ही उनके कुछ फैसले और विचार विवादों में भी रहे हों।
डॉ. जोशी का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा रहा—एक ओर वह आधुनिक विज्ञान के विद्यार्थी और शिक्षक थे, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक। यही द्वंद्व उन्हें समर्थकों के लिए एक मज़बूत वैचारिक नेता बनाता है और आलोचकों के लिए बहस का विषय। लेकिन यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि उन्होंने भारतीय राजनीति में विचारधारा को केवल चुनावी औज़ार नहीं, बल्कि बौद्धिक बहस का हिस्सा बनाए रखा।
आज जब राजनीति अक्सर तात्कालिक लाभ और सोशल मीडिया शोर में उलझी दिखती है, मुरली मनोहर जोशी का जीवन यह याद दिलाता है कि एक समय ऐसा भी था जब नेता को उसके पढ़े-लिखे होने, तर्क करने और वैचारिक स्पष्टता के लिए जाना जाता था। उनके जन्मदिन पर उन्हें किसी महिमामंडन से ज़्यादा, एक ऐसे राजनेता के रूप में याद करना ज़रूरी है जिसने सत्ता और सिद्धांत—दोनों को एक साथ साधने की कोशिश की।
डॉ. मुरली मनोहर जोशी : प्रमुख पुस्तकें (संक्षिप्त परिचय सहित)
1. प्रज्ञा-प्रवाह (Pragya-Pravah)
यह पुस्तक डॉ. जोशी के वैचारिक लेखों का संग्रह है, जिसमें भारतीय संस्कृति, राष्ट्रबोध, शिक्षा और चेतना के प्रश्नों पर उनका दृष्टिकोण सामने आता है। इसमें राजनीति को तात्कालिक सत्ता से अलग रखकर एक दीर्घकालिक सभ्यतागत सोच के रूप में देखा गया है।
2. विकल्प (The Alternative)
इस पुस्तक में डॉ. जोशी पश्चिमी विकास मॉडल के समानांतर एक भारतीय वैचारिक विकल्प प्रस्तुत करते हैं। वे तर्क देते हैं कि भारत का विकास उसकी सांस्कृतिक जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि उनसे जुड़कर ही संभव है। यह कृति विचारधारा और नीति के बीच सेतु बनाती है।
3. Hindutva: A Challenge
यह पुस्तक हिंदुत्व को केवल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत और बौद्धिक चुनौती के रूप में रखती है। इसमें लेखक अपने दृष्टिकोण से भारतीय पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक निरंतरता पर विमर्श करते हैं, जिस पर व्यापक बहस भी हुई।
4. A Hundred Hues: A Tribute to Dr. Murli Manohar Joshi
यह पुस्तक स्वयं डॉ. जोशी द्वारा लिखी नहीं गई है, बल्कि उनके जीवन, विचारों और सार्वजनिक योगदान पर आधारित एक श्रद्धांजलि ग्रंथ है। इसमें विभिन्न लेखकों ने उन्हें एक राजनेता के साथ-साथ शिक्षाविद् और विचारक के रूप में आंका है।
5. संकलित लेख एवं भाषण (Collected Essays & Speeches)
डॉ. जोशी के समय-समय पर दिए गए भाषणों और लेखों के संकलन अलग-अलग रूपों में प्रकाशित हुए हैं। इनमें शिक्षा नीति, विज्ञान, राष्ट्रवाद और संस्कृति से जुड़े उनके विचार दर्ज हैं, जो उनके बौद्धिक व्यक्तित्व को समझने में सहायक हैं।
ये पुस्तकें और लेखन मिलकर मुरली मनोहर जोशी को केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि विचारधारा आधारित सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में स्थापित करते हैं।
Ankit Awasthi





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