
मतदाता दिवस विशेष: आज़ादी की कतार से डिजिटल बूथ तक
सुबह का वक्त है। हाथ में पहचान पत्र है, आंखों में उम्मीद। आज भी लोग कतार में खड़े हैं—लेकिन यह कतार वैसी नहीं रही जैसी कभी हुआ करती थी। यह कहानी उसी बदलाव की है।
यह कहानी उस मतदाता की है, जिसने आज़ादी के बाद पहली बार वोट डालते समय लोकतंत्र को छुआ था, और उसी मतदाता की अगली पीढ़ी की भी, जो आज मोबाइल स्क्रीन पर चुनावी बहस देखती है।
जब वोट अधिकार नहीं, उत्सव था
1947 के बाद जब देश ने पहली बार अपने प्रतिनिधि खुद चुनने की तैयारी की, तब मतदाता होना गर्व की बात थी। निरक्षरता ज़्यादा थी, साधन कम थे, लेकिन भरोसा गहरा था।
लोग चुनाव को सरकार चुनने का नहीं, देश बनाने का अवसर मानते थे।
मतदाता उम्मीदवार को जानता नहीं था, लेकिन व्यवस्था पर विश्वास करता था।
धीरे-धीरे सवाल पैदा हुए
समय बदला। चुनाव नियमित हुए। लोकतंत्र स्थिर हुआ।
अब मतदाता सवाल पूछने लगा—सड़क कहाँ है, स्कूल क्यों नहीं है, नौकरी का क्या हुआ?
यह वह दौर था जब वोट भावना से निकलकर उम्मीद और अपेक्षा की तरफ बढ़ा।
जाति, वर्ग और पहचान का दौर
फिर एक समय आया जब मतदाता की पहचान उसके मुद्दों से ज़्यादा उसकी जाति, समुदाय और वर्ग से जोड़ी जाने लगी।
राजनीति ने मतदाता को समझने के बजाय खंडों में बाँटना शुरू किया।
मतदाता ने भी यह खेल समझा—और कई बार मजबूरी में उसी ढांचे के भीतर वोट किया।
मौन मतदाता का उभरना
एक दौर ऐसा भी आया जब मतदाता चुप हो गया।
वह वोट डालता था, लेकिन विश्वास कम हो गया था।
लाइन में खड़ा होता था, पर मन में यह सवाल था—“क्या सच में कुछ बदलेगा?”
डिजिटल युग का मतदाता
आज का मतदाता अलग है।
उसके पास जानकारी है—कभी अधूरी, कभी भ्रामक, कभी तीखी।
वह भाषण सुनने से पहले फैक्ट चेक करता है, पोस्टर से पहले सोशल मीडिया देखता है।
लेकिन साथ ही वह फेक न्यूज़ और भावनात्मक उकसावे का शिकार भी होता है।
क्या सच में मतदाता बदला है?
बदला है—लेकिन पूरी तरह नहीं।
आज भी वह बेहतर भविष्य चाहता है।
आज भी वह चाहता है कि उसका वोट केवल संख्या न बने, आवाज़ बने।
फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वह उम्मीद के सहारे वोट करता था,
आज वह तुलना, आशंका और अनुभव के आधार पर करता है।
सबसे बड़ा बदलाव: सवाल करने का साहस
अगर आज़ादी से अब तक के मतदाता में कोई सबसे बड़ा परिवर्तन है, तो वह है—सवाल पूछने का साहस।
आज का मतदाता जानना चाहता है, पूछना चाहता है, जवाब मांगता है।
यही लोकतंत्र की असली जीत है।
मतदाता दिवस का अर्थ
मतदाता दिवस केवल मतदान की याद दिलाने का दिन नहीं है।
यह उस सफ़र को याद करने का दिन है—जहाँ मतदाता ने खुद को समझा, बदला और गढ़ा।
लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता, बल्कि जागरूक मतदाता से जीवित रहता है।
अंत में
कतार अब भी है।
बस चेहरों की उम्र बदली है, हाथों में काग़ज़ से मोबाइल आ गया है।
लेकिन लोकतंत्र की धड़कन आज भी उसी मतदाता से चलती है—
जो हर चुनाव में उम्मीद और सवाल, दोनों लेकर बूथ तक पहुँचता है।
Ankit Awasthi





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