उत्तर 24 परगना का दुर्ग क्या कहता है बंगाल चुनाव पर ?
उत्तर 24 परगना केवल पश्चिम बंगाल का एक जिला नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला सबसे जटिल और निर्णायक भू-भाग है। कोलकाता से सटा होना इसे आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है, लेकिन इसकी असली पहचान इसके भीतर छिपी सामाजिक विविधता, विस्थापन की स्मृतियों और राजनीतिक संघर्षों से बनती है। विभाजन के बाद यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों का ठिकाना बना। यह केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं था, बल्कि एक पूरी सभ्यता, संस्कृति और पीड़ा का पुनर्वास था। इन शरणार्थियों ने खाली पड़ी जमीनों पर बस्तियां बसाईं, संघर्ष के जरिए जीवन को खड़ा किया और धीरे-धीरे इस जिले की सामाजिक रीढ़ बन गए। आज भी यहां की राजनीति में विस्थापन की वह स्मृति, नागरिकता का सवाल और पहचान का संकट बेहद गहराई से मौजूद है। इस जिले की जनसंख्या संरचना इसे बंगाल का सबसे संवेदनशील चुनावी क्षेत्र बनाती है। हिंदू और मुस्लिम आबादी का अनुपात ऐसा है कि मामूली राजनीतिक ध्रुवीकरण भी बड़े चुनावी उलटफेर में बदल सकता है। इसके अलावा अनुसूचित जाति, विशेषकर मतुआ समुदाय, यहां का सबसे बड़ा निर्णायक वर्ग है। मतुआ समाज ऐतिहासिक रूप से सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक हाशिए और नागरिकता की अनिश्चितता से जूझता रहा है। यही कारण है कि उनके लिए राजनीति केवल सत्ता चयन नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। हाल के वर्षों में मतदाता सूची में तेज वृद्धि, सीमावर्ती इलाकों में जनसंख्या विस्फोट और पहचान से जुड़े विवादों ने इस जिले को एक स्थायी राजनीतिक तनाव क्षेत्र में बदल दिया है। यहां चुनाव अब केवल विकास या भ्रष्टाचार पर नहीं, बल्कि नागरिकता, सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता पर लड़े जाते हैं।
राजनीतिक इतिहास की दृष्टि से उत्तर 24 परगना लंबे समय तक वाम मोर्चा का अभेद्य दुर्ग रहा। भूमि सुधार, पंचायत व्यवस्था और मजदूर आंदोलन ने वाम राजनीति को यहां गहरी सामाजिक जड़ें दीं। वाम शासन के दौरान यह जिला संगठित राजनीतिक चेतना का केंद्र बना, जहां पार्टी कैडर गांव-गांव तक फैले हुए थे। लेकिन समय के साथ यह संरचना सत्ता-संरक्षण, जड़ता और स्थानीय तानाशाही में बदलने लगी। इसका परिणाम 2011 में हुआ, जब तृणमूल कांग्रेस ने न केवल सत्ता बदली, बल्कि इस जिले की राजनीतिक आत्मा को भी नए सिरे से गढ़ा। ममता बनर्जी ने खुद को शरणार्थियों, महिलाओं और वंचित समुदायों की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया और यह रणनीति यहां अत्यंत सफल रही। तृणमूल का शासनकाल उत्तर 24 परगना में कल्याणकारी राजनीति, संगठनात्मक विस्तार और सत्ता के केंद्रीकरण का मिला-जुला रूप रहा। कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी, लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने गरीब और महिला मतदाताओं में गहरी पकड़ बनाई। लेकिन इसके समानांतर एक मजबूत स्थानीय सत्ता संरचना भी खड़ी हुई, जिसने पंचायत से लेकर थाना स्तर तक राजनीतिक नियंत्रण स्थापित कर लिया। यही संरचना धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, वसूली, हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात के आरोपों से घिरने लगी। शिक्षक भर्ती घोटाला, नगर निकायों में अनियमितताएं और पंचायत चुनावों में हिंसा ने तृणमूल की नैतिक छवि को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया, विशेषकर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में।
2019 के बाद भाजपा का उभार इस जिले में केवल एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक ध्रुवीकरण की नई प्रक्रिया का संकेत था। भाजपा ने मतुआ समाज की नागरिकता मांग, सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय पहचान को केंद्र में रखकर एक वैचारिक अपील खड़ी की। इससे वे वर्ग जो स्वयं को राज्य की राजनीति में असुरक्षित महसूस कर रहे थे, भाजपा की ओर आकर्षित हुए। शहरी मध्यम वर्ग, युवा मतदाता और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों में तृणमूल के प्रति असंतोष भाजपा के लिए अवसर में बदल गया। हालांकि भाजपा अभी भी यहां स्थायी सांगठनिक जड़ें बनाने की प्रक्रिया में है, लेकिन उसका सामाजिक आधार लगातार विस्तृत हो रहा है।वर्तमान परिदृश्य में उत्तर 24 परगना एक स्थायी राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। यहां एक ओर तृणमूल की मजबूत संगठनात्मक पकड़ है, तो दूसरी ओर उसके खिलाफ गहरी नाराजगी भी पनप रही है। मुस्लिम मतदाता अब भी बड़े पैमाने पर तृणमूल के साथ जुड़े हुए हैं, क्योंकि उन्हें भाजपा के उदय में अपनी सामाजिक सुरक्षा के लिए खतरा दिखता है। इसके विपरीत अनुसूचित जाति और मतुआ समाज केि राजनीति अब एकमुश्त नहीं रही, बल्कि वहां गहरा विभाजन उभर चुका है। यही द्वंद्व इस जिले को चुनावी दृष्टि से अत्यंत अनिश्चित बनाता है।
2026 विधानसभा चुनाव में उत्तर 24 परगना का परिणाम पूरे बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। यहां की 33 सीटें केवल संख्या का खेल नहीं हैं, बल्कि ये सत्ता संतुलन की धुरी हैं। यदि तृणमूल यहां 20 से अधिक सीटें बनाए रखने में सफल रहती है, तो उसका शासन अगले पांच वर्षों तक स्थिर रहेगा। लेकिन यदि भाजपा 12 से 15 सीटों तक पहुंच जाती है, तो यह बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की ठोस जमीन तैयार कर देगा। इस संघर्ष में असली निर्णायक तत्व मतुआ समाज, शहरी युवा मतदाता और सीमावर्ती क्षेत्रों का रुझान होगा।इस जिले की राजनीति को केवल चुनावी गणित से नहीं समझा जा सकता। यहां की हर वोट पर्ची के पीछे विस्थापन की स्मृति, पहचान की पीड़ा, सुरक्षा की चिंता और बेहतर जीवन की आकांक्षा छिपी होती है। यही कारण है कि उत्तर 24 परगना बंगाल की राजनीति का सबसे संवेदनशील और सबसे शक्तिशाली केंद्र बन चुका है। 2026 का चुनाव यहां केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि बंगाल अपनी राजनीति को पहचान आधारित संघर्ष की दिशा में ले जाएगा या विकास और संस्थागत सुधार के नए मार्ग पर आगे बढ़ेगा।
Ankit Awasthi
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