
‘जन नायक’ का विवाद: विजय की फ़िल्म, राजनीति और निजी छवि के बीच खिंची रेखा
तमिल सिनेमा में ‘थलापति’ विजय सिर्फ़ एक सुपरस्टार नहीं, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक प्रतीक बन चुके हैं। ऐसे में उनकी प्रस्तावित/चर्चित फ़िल्म ‘जन नायक’ को लेकर उठा विवाद महज़ सिनेमाई नहीं रहा, बल्कि सीधे-सीधे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा, सार्वजनिक छवि और निजी जीवन से जुड़ गया है। यही वजह है कि यह फ़िल्म रिलीज़ से पहले ही बहस के केंद्र में आ गई।
विवाद की जड़ फ़िल्म के शीर्षक, कथानक और प्रतीकात्मक भाषा में छिपी मानी जा रही है। ‘जन नायक’ नाम अपने आप में एक राजनीतिक संकेत देता है—ऐसा नेता जो जनता से निकला हो और सत्ता से टकराने की क्षमता रखता हो। आरोप यह लगे कि फ़िल्म का नायक एक ऐसे जननेता के रूप में दिखाया गया है, जिसकी छवि वास्तविक राजनीति से मेल खाती है। विरोधियों का कहना है कि यह सिनेमा के ज़रिए राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश है, खासकर तब जब विजय खुद सक्रिय राजनीति में कदम रख चुके हैं।
कुछ राजनीतिक दलों और संगठनों ने फ़िल्म पर यह आरोप भी लगाया कि इसमें वर्तमान सत्ता, नौकरशाही और व्यवस्था पर परोक्ष हमला किया गया है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है और सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं। लेकिन सवाल यह है कि जब एक अभिनेता खुद राजनीतिक दल का नेतृत्व कर रहा हो, तो क्या उसकी फ़िल्म को ‘सिर्फ़ कला’ के रूप में देखा जा सकता है?
विजय की निजी छवि इस विवाद में एक अलग कोण जोड़ती है। वह लंबे समय तक विवादों से दूर, अनुशासित और सीमित सार्वजनिक जीवन जीने वाले अभिनेता रहे हैं। न तो उनकी निजी ज़िंदगी सुर्खियों में रही, न ही वे आक्रामक बयानबाज़ी के लिए जाने गए। यही ‘क्लीन इमेज’ आज उनके लिए ताक़त भी है और चुनौती भी। समर्थक इसे ईमानदार नेता का संकेत मानते हैं, जबकि आलोचक कहते हैं कि यह छवि फ़िल्मों के ज़रिए सावधानी से गढ़ी गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ‘जन नायक’ का विवाद असल में फ़िल्म से ज़्यादा विजय के भविष्य को लेकर है। यह बहस इस बात की है कि क्या वे सिनेमा को राजनीति का मंच बना रहे हैं, या राजनीति में उतरने से पहले जनता से संवाद का माध्यम खोज रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति में एमजीआर और जयललिता जैसे उदाहरण पहले से मौजूद हैं, इसलिए तुलना स्वाभाविक है—और यही तुलना विवाद को और धार देती है।
अंततः, ‘जन नायक’ का विवाद हमें एक बड़े सवाल तक ले जाता है: क्या आज के दौर में कला, राजनीति और व्यक्ति को अलग-अलग देखा जा सकता है? विजय के मामले में जवाब आसान नहीं है। यह फ़िल्म चाहे बॉक्स ऑफिस पर जो भी करे, इतना तय है कि इसने तमिल राजनीति के विमर्श को नई ऊर्जा दे दी है। अब फैसला दर्शकों और मतदाताओं को करना है—वे विजय को परदे के नायक के रूप में देखना चाहते हैं, या सत्ता के संभावित ‘जन नायक’ के रूप में।
Ankit Awasthi





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