ऋत्विक घटक: टूटन, विस्थापन और मनुष्यता का सिनेमा
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होते जाते हैं। ऋत्विक घटक उन्हीं कालजयी फिल्मकारों में से एक थे, जिनका सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के भीतर धधकते सवालों का दस्तावेज़ है। उन्होंने कैमरे को चमक-दमक से दूर रखकर उस पीड़ा, संघर्ष और टूटन की ओर मोड़ा, जिसे अक्सर पर्दे के बाहर छोड़ दिया जाता है।
1947 के विभाजन ने उनके जीवन और सिनेमा दोनों पर गहरी छाप छोड़ी। विस्थापन, जड़ों से उखड़ने का दर्द, पहचान का संकट और नए सिरे से जीवन गढ़ने की जद्दोजहद—ये सब उनके सिनेमा की स्थायी थीम बने। उनकी फिल्मों में पात्र सिर्फ किरदार नहीं, बल्कि अपने समय के प्रतिनिधि दिखाई देते हैं। ‘मेघे ढाका तारा’, ‘सुवर्णरेखा’ और ‘कोमल गांधार’ जैसी कृतियाँ उस पीड़ा को स्वर देती हैं, जिसे शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं।
ऋत्विक घटक का यथार्थवाद सपाट नहीं था। वे यथार्थ को भावनात्मक तीव्रता और प्रतीकात्मकता के साथ प्रस्तुत करते थे। उनके फ्रेम में प्रकृति, ध्वनि और मौन भी कथा के सक्रिय घटक बन जाते हैं। नदी का बहाव, ट्रेन की सीटी, या किसी किरदार की खामोशी—हर तत्व दर्शक को भीतर तक झकझोरने का काम करता है। यही वजह है कि उनकी फिल्में देखना एक अनुभव है, महज़ दृश्य नहीं।
उनका सिनेमा सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़ा हुआ था। गरीबी, वर्ग संघर्ष, स्त्री की स्थिति, शरणार्थियों की त्रासदी और टूटते पारिवारिक संबंध—ये सभी विषय उनकी फिल्मों में बिना किसी लाग-लपेट के सामने आते हैं। वे न तो करुणा का व्यापार करते हैं और न ही सतही संवेदना पर संतोष करते हैं। उनके पात्र अपनी कमजोरियों, द्वंद्वों और सपनों के साथ पूरे मनुष्य के रूप में सामने आते हैं।
ऋत्विक घटक की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे सिनेमा को सामाजिक जिम्मेदारी से अलग नहीं मानते थे। उनके लिए फिल्म बनाना एक नैतिक हस्तक्षेप था—समाज के भीतर चल रही बेचैनी को आवाज़ देना। शायद इसी कारण उनके जीवनकाल में उन्हें वह व्यावसायिक सफलता नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। लेकिन समय ने साबित किया कि उनका सिनेमा क्षणिक लोकप्रियता से कहीं आगे की चीज़ था।
आज, जब सिनेमा का बड़ा हिस्सा बाजार और ट्रेंड के दबाव में दिशा तय कर रहा है, ऋत्विक घटक का काम एक जरूरी आईना बनकर सामने आता है। यदि आज के फिल्मकार उनके सिनेमा का एक अंश भी आत्मसात कर लें—मनुष्यता के प्रति संवेदनशीलता, सामाजिक सरोकार और नैतिक जिम्मेदारी—तो भारतीय सिनेमा का कैनवास कहीं अधिक गहरा, सशक्त और ईमानदार हो सकता है।
ऋत्विक घटक हमें यह सिखाते हैं कि सिनेमा केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद करने का एक सशक्त उपकरण है। उनका सिनेमा आज भी दिशा देता है, प्रश्न उठाता है और सोचने पर मजबूर करता है। यही किसी भी महान कलाकार की सबसे बड़ी विरासत होती है—समय के पार जाकर भी मनुष्य के भीतर हलचल पैदा कर देना।
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Ankit Awasthi





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