
तकनीक, सत्ता और ज़िम्मेदारी का संकट
तकनीक अपने साथ सुविधा लाती है, गति लाती है और शक्ति भी देती है। लेकिन यही शक्ति जब दिशा खो देती है, तो वही विज्ञान जो मानवता का सहायक था, धीरे-धीरे मानवता के लिए संकट बन जाता है। विडंबना यह है कि अक्सर यह परिवर्तन अचानक नहीं होता—हमें पता भी नहीं चलता और विज्ञान चुपचाप गलत हाथों में पहुँच चुका होता है।
विज्ञान की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह नैतिक नहीं होता। वह सही-गलत नहीं पहचानता, वह केवल सक्षम बनाता है। इंटरनेट ज्ञान फैलाने के लिए बना था, लेकिन आज वही साइबर ठगी, डेटा चोरी और ऑनलाइन शोषण का माध्यम बन गया है। सोशल मीडिया संवाद के लिए आया था, लेकिन अब वह अफवाह, नफरत और फेक न्यूज़ का सबसे तेज़ वाहक बन चुका है। विज्ञान ने हथियार नहीं उठाया, लेकिन उसने ऐसे औज़ार ज़रूर दिए जिन्हें उठाना आसान हो गया।
समस्या यह नहीं है कि तकनीक पैदा हुई, समस्या यह है कि तकनीक सबसे पहले गलत इरादों वालों तक पहुँच जाती है। अपराधी, अफवाह फैलाने वाले, ठग और दुष्प्रचार करने वाले—ये सब विज्ञान के नए प्रयोगों को सबसे पहले अपनाते हैं। क़ानून, समाज और नैतिक विमर्श हमेशा पीछे रह जाते हैं। जब तक नियम बनते हैं, तब तक नुकसान हो चुका होता है।
फेक न्यूज़ इसका सबसे खतरनाक उदाहरण है। आज सच और झूठ के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो चुकी है कि आम नागरिक भ्रमित है। तकनीक ने हर व्यक्ति को प्रकाशक बना दिया, लेकिन ज़िम्मेदारी किसी को नहीं दी। परिणाम यह हुआ कि समाज में अविश्वास, डर और ध्रुवीकरण बढ़ा। यह विज्ञान का उद्देश्य नहीं था, लेकिन विज्ञान का उपयोग करने वालों की मंशा ने इसे अभिशाप बना दिया।
यही स्थिति साइबर अपराधों की है। डिजिटल भुगतान ने जीवन आसान किया, लेकिन उसी ने ठगी के नए रास्ते भी खोल दिए। एक क्लिक में सुविधा है, तो एक क्लिक में नुकसान भी। विज्ञान तटस्थ है, पर उसका प्रभाव तटस्थ नहीं रहता।
यह मान लेना भोला होगा कि विज्ञान खुद-ब-खुद सही दिशा में चलेगा। इतिहास बताता है कि बिना नियंत्रण के हर शक्ति विनाश की ओर जाती है। इसलिए आज ज़रूरत है केवल तकनीकी विकास की नहीं, बल्कि कठोर रणनीति और नैतिक निगरानी की। क़ानून को तेज़, शिक्षा को जागरूक और संस्थाओं को सक्षम बनाना होगा। यह भी समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए बिना तकनीक समाज को तोड़ सकती है।
विज्ञान को रोकना समाधान नहीं है, लेकिन उसे दिशा देना अनिवार्य है। यह दिशा सरकार अकेले नहीं दे सकती—समाज, मीडिया, शिक्षण संस्थान और नागरिक सभी को मिलकर यह तय करना होगा कि तकनीक का उपयोग मानवता के पक्ष में हो, उसके विरुद्ध नहीं।
विज्ञान स्वयं अभिशाप नहीं है,
अभिशाप तब बनता है जब बुद्धि से तेज़ शक्ति और नियंत्रण से तेज़ सुविधा पैदा हो जाती है।
आज का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि हम क्या बना सकते हैं,
बल्कि यह है कि हम उसे किसके हाथों में और किन शर्तों पर सौंपते हैं।
अगर हमने समय रहते विज्ञान को दिशा नहीं दी,
तो भविष्य हमसे यही पूछेगा—
तकनीक थी, चेतना क्यों नहीं थी?
Ankit Awasthi





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