
‘योगी जी की पाती’: सत्ता और समाज के बीच संवाद की एक ज़रूरी पहल
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि लगातार संवाद का तंत्र है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा शुरू की गई ‘योगी जी की पाती’ इसी संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में उभरती दिख रही है। यह पहल इसलिए भी खास है क्योंकि यह सत्ता को मंच से उतारकर जनता के बीच लाने का प्रयास करती है—ठीक उसी तरह जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मन की बात’ ने राष्ट्रीय स्तर पर किया।
‘योगी जी की पाती’ का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि आम नागरिक सीधे यह समझ पाता है कि सरकार किन मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है, किन चुनौतियों से जूझ रही है और किस दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। योजनाएँ अक्सर फाइलों और प्रेस नोट्स में सिमट जाती हैं, लेकिन जब वही बातें सरकार का मुखिया स्वयं सरल भाषा में रखता है, तो उनमें विश्वसनीयता और अपनापन जुड़ जाता है।
इस पहल ने शासन और जनता के बीच मौजूद उस दूरी को कम किया है, जो अक्सर सत्ता के केंद्रीकरण से पैदा हो जाती है। लोग यह महसूस करते हैं कि सरकार केवल आदेश देने वाली संस्था नहीं है, बल्कि सुनने और समझने वाली व्यवस्था भी है। यही कारण है कि इसका असर ज़मीन पर दिख रहा है—चाहे वह कानून-व्यवस्था पर भरोसा हो, योजनाओं को लेकर स्पष्टता हो या प्रशासनिक निर्णयों के पीछे का तर्क।
‘मन की बात’ ने यह साबित किया कि जब संवाद एकतरफा भाषण न होकर भावनात्मक और सामाजिक जुड़ाव बन जाता है, तो वह राजनीति से ऊपर उठकर जन-संवाद बन जाता है। उसी राह पर ‘योगी जी की पाती’ एक राज्य-स्तरीय उदाहरण प्रस्तुत करती है, जहाँ शासन की भाषा आदेशात्मक नहीं, संवादात्मक दिखने लगती है।
इस अनुभव से एक बड़ा सबक निकलता है—ऐसी पहलें केवल केंद्र या राज्य के मुखिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अगर स्थानीय स्तर पर—जैसे ज़िलाधिकारी, नगर प्रमुख, विधायक या मंत्री—नियमित रूप से जनता से संवाद करें, तो शासन अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बन सकता है। स्थानीय मुद्दों का समाधान भी तब अधिक प्रभावी होता है, जब संवाद स्थानीय हो।
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‘योगी जी की पाती’ जैसी पहलें यह दिखाती हैं कि शासन की मजबूती केवल सख़्ती से नहीं, संवाद से भी आती है।
जब जनता यह जान पाती है कि सरकार के मन में क्या है, तो अविश्वास की जगह सहभागिता जन्म लेती है।
आज ज़रूरत है कि संवाद को अपवाद नहीं, प्रशासन की नियमित संस्कृति बनाया जाए—
क्योंकि लोकतंत्र में बोलना जितना ज़रूरी है,
उतना ही ज़रूरी है सुना जाना।
Ankit Awasthi





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