
न्याय बनाम कानून - एक लकीर
लोकतंत्र में कानून को न्याय का माध्यम माना जाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार इसके उलट सामने आती है। काग़ज़ों में जो प्रक्रिया पूरी तरह वैध दिखती है, वही प्रक्रिया किसी आम नागरिक के लिए वर्षों का मानसिक, आर्थिक और सामाजिक संकट बन जाती है। सवाल यह नहीं कि कानून लागू हुआ या नहीं—सवाल यह है कि क्या हर वैध कार्यवाही न्यायपूर्ण भी होती है?
कानून और न्याय के बीच की खाई
कानून दस्तावेज़ों की भाषा समझता है—नोटिस, धारा, आदेश। न्याय इंसान की भाषा बोलता है—घर, रोज़गार, भविष्य। जब किसी क्षेत्र में विकास परियोजना के नाम पर अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होती है, तो सरकारी रिकॉर्ड में सब कुछ नियमानुसार चलता है।
लेकिन वही प्रक्रिया उस दुकानदार के लिए जीवन बदल देती है, जिसकी तीन पीढ़ियों की रोज़ी एक छोटी-सी दुकान पर निर्भर थी। मुआवज़े का चेक मिल जाता है, पर ग्राहक नहीं लौटते, पहचान नहीं बचती।
घटना जो काग़ज़ों में नहीं दिखती
कुछ वर्ष पहले एक औद्योगिक परियोजना के लिए दर्जनों परिवारों की ज़मीन ली गई। फाइलों में लिखा गया—“सहमति से अधिग्रहण।”
असल में सहमति तब ली गई जब लोगों को बताया गया कि विकल्प यही है। जिन बुज़ुर्गों ने कभी बैंक का फॉर्म नहीं भरा था, उन्होंने अंगूठा लगा दिया। क़ानून ने अपना काम पूरा कर लिया, लेकिन न्याय कहीं रास्ते में छूट गया।
तारीख़ों में उलझता इंसाफ
एक अन्य मामले में कुछ लोग मुआवज़े की दर को चुनौती देने अदालत पहुँचे। सुनवाई शुरू हुई, तारीख़ें बढ़ती गईं। दस साल बाद फैसला आया—लेकिन तब तक कई याचिकाकर्ता या तो शहर छोड़ चुके थे या दुनिया।
फैसला कानून के मुताबिक था, पर न्याय समय पर नहीं मिला—और देर से मिला न्याय अक्सर अधूरा होता है।
मुआवज़ा बनाम पुनर्वास
कई शहरों में देखा गया कि अधिग्रहण के बाद लोगों को एकमुश्त राशि दे दी गई, लेकिन पुनर्वास की ठोस योजना नहीं थी। जिनके पास खेती या छोटे व्यवसाय के अलावा कोई कौशल नहीं था, वे अचानक बेरोज़गार हो गए।
कानून ने “क्षतिपूर्ति” कर दी, पर जीवन की निरंतरता नहीं बचा सका।
क्यों फँस जाता है आम आदमी
प्रक्रिया जटिल, भाषा कठिन
कानूनी लड़ाई महंगी और लंबी
शक्ति-संतुलन असमान
पुनर्वास केवल काग़ज़ों में
इन सबके बीच आम आदमी कानून में फँसता चला जाता है और न्याय एक सैद्धांतिक शब्द बनकर रह जाता है।
विकास ज़रूरी है, लेकिन अगर विकास की कीमत किसी की पूरी ज़िंदगी हो, तो उस मॉडल पर सवाल उठना चाहिए। कानून अगर संवेदनशील न हो, तो वह न्याय का साधन नहीं बल्कि दबाव का औज़ार बन जाता है।
रास्ता क्या हो सकता है
अधिग्रहण से पहले वास्तविक संवाद
मुआवज़े के साथ रोज़गार/पुनर्वास की गारंटी
समयबद्ध और सरल आपत्ति प्रक्रिया
मानवीय प्रभाव को निर्णय का केंद्र
कानून का शासन तभी सार्थक है जब वह न्याय की आत्मा से जुड़ा हो। वरना वह एक ऐसा ढांचा बन जाता है जिसमें आम आदमी फँसता है और व्यवस्था आगे बढ़ जाती है।
सच्चा न्याय वही है जो नियमों से निकलकर इंसान तक पहुँचे।
Ankit Awasthi





Leave A Comment
Don’t worry ! Your email address will not be published. Required fields are marked (*).