
स्टीफन हॉकिंग: जिसने ब्रह्मांड को सोचने की नई भाषा दी
8 जनवरी को जन्मे स्टीफन हॉकिंग केवल एक महान वैज्ञानिक नहीं थे; वे उस मानवीय जिजीविषा का प्रतीक थे जो शरीर की सीमाओं को स्वीकार करती है, लेकिन सोच की सीमाओं को कभी नहीं मानती। जिस दिन दुनिया एल्विस प्रेस्ली जैसे सांस्कृतिक आइकन का जन्मदिन मनाती है, उसी दिन एक ऐसा मस्तिष्क भी जन्मा जिसने यह साबित किया कि असली शक्ति आवाज़ में नहीं, विचारों में होती है। हॉकिंग का जीवन इस सच्चाई का जीवित प्रमाण है कि ब्रह्मांड को समझने के लिए मजबूत शरीर नहीं, बल्कि अडिग जिज्ञासा चाहिए।
बहुत कम उम्र में मोटर न्यूरॉन डिज़ीज़ (ALS) जैसी लाइलाज बीमारी का पता चल जाना किसी भी व्यक्ति के लिए अंत जैसा होता, लेकिन हॉकिंग के लिए यह शुरुआत थी। डॉक्टरों ने उन्हें कुछ साल का जीवन बताया था, पर उन्होंने दशकों तक न सिर्फ जीवन जिया, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे जटिल सवालों पर काम किया—ब्लैक होल क्या हैं, समय की शुरुआत कैसे हुई, और क्या यह ब्रह्मांड स्वयं उत्पन्न हो सकता है। उनका शोध यह बताता है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होता; वह साहस और धैर्य से भी जन्म लेता है।
हॉकिंग की सबसे क्रांतिकारी देन यह विचार था कि ब्लैक होल पूरी तरह काले नहीं होते। उनकी खोज, जिसे आज हॉकिंग रेडिएशन कहा जाता है, ने यह धारणा बदल दी कि ब्लैक होल सब कुछ निगल लेते हैं और कुछ वापस नहीं देते। इस एक विचार ने क्वांटम फिजिक्स और कॉस्मोलॉजी के बीच सेतु बनाया और आधुनिक भौतिकी की दिशा को ही मोड़ दिया। यह विज्ञान का वही क्षण था जब अंधकार के भीतर भी नियम और रोशनी खोजी गई।
लेकिन स्टीफन हॉकिंग की असली क्रांति उनकी प्रयोगशाला से बाहर शुरू होती है। A Brief History of Time जैसी किताबों के जरिए उन्होंने जटिल विज्ञान को आम लोगों की भाषा में पहुँचाया। उन्होंने यह दिखाया कि ब्रह्मांड केवल वैज्ञानिकों की बपौती नहीं, बल्कि हर जिज्ञासु मन की विरासत है। उनका संवाद कंप्यूटर-जनित आवाज़ से होता था, लेकिन उस आवाज़ के पीछे जो विचार थे, वे पूरी दुनिया में गूंजे।
8 जनवरी को स्टीफन हॉकिंग का जन्म हमें यह याद दिलाता है कि मानव इतिहास को आगे बढ़ाने वाले लोग हमेशा शक्तिशाली या सुविधाजनक परिस्थितियों में पैदा नहीं होते। कई बार वे सबसे कठिन हालात में जन्म लेते हैं—और वहीं से इतिहास को चुनौती देते हैं। हॉकिंग ने हमें यह नहीं सिखाया कि ब्रह्मांड क्या है, बल्कि यह सिखाया कि हार मान लेना प्रकृति का नियम नहीं, बल्कि एक विकल्प है—और उसे ठुकराया जा सकता है।
आज जब हम 8 जनवरी को देखते हैं, तो यह सिर्फ एक जन्मतिथि नहीं रहती। यह उस सोच का उत्सव बन जाती है जो कहती है कि जब शरीर रुक जाए, तब भी विचार उड़ सकते हैं—तारों से भी आगे।
Ankit Awasthi





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