
पांच राज्यों के चुनाव में जनता आखिर कहना क्या चाहती है?
भारत में चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते, वे समाज की सामूहिक मनोदशा का संकेत भी देते हैं। आने वाले महीनों में जिन राज्यों— पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल—में चुनावी माहौल बन रहा है, वहां टीवी स्टूडियो की बहसों से अलग एक और चुनाव चल रहा है। यह चुनाव सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनलों और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों की रिपोर्टों में दिखाई देता है।
अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के शोर को कुछ देर के लिए किनारे रख दिया जाए तो डिजिटल स्पेस में उभरती तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल है—जनता पूरी तरह खुश भी नहीं है और पूरी तरह नाराज भी नहीं।
1. रोजगार: सबसे बड़ा लेकिन शांत मुद्दा
सोशल मीडिया की चर्चाओं और स्वतंत्र पत्रकारों की ग्राउंड रिपोर्टों में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरता है।
Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE) के आंकड़ों के अनुसार 2025–26 की शुरुआत में भारत की औसत बेरोजगारी दर 7–8% के आसपास बनी रही। लेकिन युवा वर्ग में यह दर कई बार 20% से ऊपर तक पहुंचती देखी गई।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और जटिल है। रोजगार के अवसर सीमित होने के कारण बड़ी संख्या में युवा अस्थायी या गिग इकॉनमी के कामों की ओर जा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर यह असंतोष अक्सर ऐसे वाक्यों में दिखता है:
“काम है, लेकिन करियर नहीं है।”
दिलचस्प बात यह है कि गुस्सा पहले की तरह उग्र नहीं दिखता। डिजिटल पत्रकारों के अनुसार यह क्रोध अब थकान में बदल चुका है—युवा शिकायत करते हैं, लेकिन उम्मीद कम रखते हैं।
2. महंगाई: रोजमर्रा की चिंता
महंगाई चुनावी चर्चा का दूसरा बड़ा मुद्दा है।
Ministry of Statistics and Programme Implementation के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के अनुसार 2024–25 के दौरान भारत में खुदरा महंगाई दर औसतन 5–6% के आसपास रही।
लेकिन खाद्य पदार्थों की महंगाई कई महीनों में 8–10% तक दर्ज की गई।
सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा इन चीजों पर होती दिखती है:
एलपीजी सिलेंडर की कीमत
दाल और सब्जियों के दाम
किराया और बिजली बिल
कई डिजिटल पत्रकारों का विश्लेषण यह कहता है कि जनता ने महंगाई को अब स्थायी समस्या की तरह स्वीकार कर लिया है।
लोग शिकायत करते हैं, लेकिन यह भी मानते हैं कि शायद कोई भी सरकार इसे पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाएगी।
3. कल्याण योजनाएं: सरकार की मजबूत ढाल
जहां असंतोष है, वहीं कुछ क्षेत्रों में संतुष्टि भी साफ दिखाई देती है।
सोशल मीडिया पर ग्रामीण इलाकों से आने वाली रिपोर्टों में अक्सर यह कहा जाता है कि राशन और कल्याण योजनाओं ने आर्थिक दबाव को कुछ हद तक कम किया है।
NITI Aayog के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार पिछले एक दशक में करीब 24 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं।
इसके अलावा मुफ्त राशन योजना से 80 करोड़ से अधिक लोगों को लाभ मिलने की बात सरकारी आंकड़ों में कही जाती है।
डिजिटल पत्रकारों के अनुसार यही योजनाएं कई मतदाताओं के मन में यह भावना पैदा करती हैं कि “कम से कम कुछ तो मिल रहा है।”
4. पहचान की राजनीति बनाम रोजमर्रा की जिंदगी
टीवी डिबेट में चुनाव अक्सर जाति और धर्म की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमते दिखाई देते हैं।
लेकिन सोशल मीडिया की बातचीत में कई बार स्थानीय मुद्दे ज्यादा प्रमुख दिखते हैं—जैसे सड़क, अस्पताल, सरकारी स्कूल और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली।
डिजिटल रिपोर्टों में यह भी कहा जा रहा है कि पहचान की राजनीति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन मतदाता का ध्यान अब जीवन की गुणवत्ता पर भी बढ़ रहा है।
5. भरोसा सीमित, विकल्प भी अस्पष्ट
इन पांच राज्यों में उभरती सामाजिक मनोदशा को अगर एक वाक्य में समझना हो तो शायद वह यह होगा—
जनता पूरी तरह संतुष्ट नहीं है, लेकिन पूरी तरह असंतुष्ट भी नहीं है।
एक तरफ लोग कहते हैं कि डिजिटल सेवाओं, बैंक खातों और सरकारी योजनाओं ने व्यवस्था को थोड़ा व्यवस्थित बनाया है।
दूसरी तरफ रोजगार, स्थानीय भ्रष्टाचार और अवसरों की कमी को लेकर असंतोष अभी भी मौजूद है।
एक जटिल मतदाता
आने वाले चुनावों में असली कहानी शायद वही नहीं होगी जो टीवी स्क्रीन पर दिखाई जाएगी।
सोशल मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता के विश्लेषण बताते हैं कि यह चुनाव खुशी बनाम नाराजगी का सीधा संघर्ष नहीं है।
यह एक ऐसे मतदाता का चुनाव है जो आंशिक रूप से संतुष्ट है, आंशिक रूप से निराश है और पूरी तरह निश्चित भी नहीं है कि बदलाव से वास्तव में कितना बदलाव आएगा।
शायद इसलिए इस बार मतदाता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—
“जो है, वह कितना ठीक है… और जो आएगा, वह कितना बेहतर होगा?”
Ankit Awasthi





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