
मैकेनिकल का 'इंजीनियर' और नियति का 'ब्लैक बॉक्स'
लखनऊ | "साक्षर होने और 'समझदार' होने के बीच एक बहुत गहरी खाई होती है—और अक्सर उसी खाई में ऐसे 'इंजीनियर बाबा' गिरते हैं।" #अभिषेक_मिश्रा की कहानी इसी कड़वे सच का एक आधुनिक दस्तावेज़ है। अभिषेक मिश्रा का चेहरा, जो कभी कोडिंग और मशीनों के लॉजिक में उलझा रहता था, आज इंसानी जज्बातों के सॉफ्टवेयर को हैक करने की कुत्सित कोशिश में बेनकाब हो चुका है। अभिषेक मिश्रा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के थर्मोडायनामिक्स के नियम तो रट लिए, पर वह जीवन के उस अटल सत्य को भूल गया कि पाप की बैलेंस शीट अंत में हमेशा जीरो-सम (zero-sum) हो जाती है।
उसकी कार्यशैली एक अजीब सा डिस्ट्रोपियन स्टार्टअप मॉडल थी, जहाँ आईआईटी की डिग्री और 'आदिकर्ता नारायण दास' का चोला ओढ़कर उसने आस्था के बाज़ार में अपना मार्केट शेयर हथिया लिया। उसने 'गंधर्व विवाह' को एक ऐसा जरिया बनाया जहाँ नशीले दूध के सर्वर से डेटा यानी ब्लैकमेलिंग फोटो चुराकर वह मथुरा में अपना आलीशान घर खड़ा कर रहा था। यह विडंबना ही है कि जो शख्स 'आदिकर्ता' होने का ढोंग कर रहा था, वह असल में अपनी ही विनाश लीला की पटकथा लिख रहा था।
अभिषेक मिश्रा के उस मुखौटे के पीछे का दर्शन बहुत सरल है: जब तक मार्केटिंग काम करती है, तब तक आप भगवान हैं, और जैसे ही कानून का एल्गोरिदम पकड़ता है, आप सिर्फ एक मुजरिम रह जाते हैं। उसने शायद यह नहीं सोचा कि जिस मोबाइल में उसने लड़कियों की अस्मिता को कैद किया था, वही डिजिटल सबूत उसके जेल के रास्तों का मैप बन जाएगा। अंत में, यह मामला केवल एक अपराधी का नहीं है, बल्कि उस खोखलेपन का है जहाँ डिग्री तो आ गई, पर विवेक नहीं; अभिषेक मिश्रा अब अपनी इंजीनियरिंग का उपयोग जेल की काल कोठरी में समय की गणना करने में करेगा, जहाँ न कोई अनुयायी होगा और न ही कोई गंधर्व विवाह—सिर्फ उसके किए कर्मों का सन्नाटा होगा।





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