
प्रजा तंत्र में पार्टी निर्माण कितना सरल - उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव विशेष
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन इसकी एक दिलचस्प विशेषता यह है कि यहां अमेरिका या ब्रिटेन जैसी स्पष्ट दो-दलीय व्यवस्था नहीं है। यहां राष्ट्रीय स्तर से लेकर गांव की पंचायत तक सैकड़ों राजनीतिक दल सक्रिय हैं। कुछ दल राष्ट्रीय पहचान रखते हैं, कुछ क्षेत्रीय प्रभाव वाले हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनका अस्तित्व कागजों तक सीमित है।
प्रश्न यह है कि भारत में दो-दलीय व्यवस्था विकसित क्यों नहीं हो पाई?
इसका उत्तर भारत की सामाजिक और भौगोलिक विविधता में छिपा है। भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म, क्षेत्रीय आकांक्षाएं और स्थानीय मुद्दे इतने विविध हैं कि एक या दो दलों के लिए पूरे देश की राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तेलंगाना या महाराष्ट्र जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने समय-समय पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आज की राजनीति में एक ओर भाजपा जैसी मजबूत राष्ट्रीय पार्टी है, जिसने पिछले एक दशक में अपने संगठन, नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता के बल पर व्यापक जनाधार बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस है, जो कभी भारतीय राजनीति की धुरी हुआ करती थी, लेकिन अब कई राज्यों में अपने पुराने प्रभाव को पुनः प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रही है। इनके अलावा समाजवादी, वामपंथी, क्षेत्रीय और जाति-आधारित दल भी राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा हैं।
फिर भी समय-समय पर लोगों के मन में यह विचार जन्म लेता है कि क्या कोई बिल्कुल नया राजनीतिक विकल्प सामने आ सकता है?
इसी संदर्भ में यदि हम "कॉकरोच पार्टी" जैसी किसी काल्पनिक अवधारणा को देखें, जिसकी शुरुआत एक इंटरनेट मीम या मजाक के रूप में हुई हो, तो यह विचार पहली नजर में हास्यास्पद लग सकता है। लेकिन लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि कई बार मजाक, व्यंग्य और जन-असंतोष से भी गंभीर राजनीतिक आंदोलनों ने जन्म लिया है।
हालांकि किसी भी मीम को राजनीतिक दल में बदलना आसान नहीं होता। भारत में राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए केवल सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए संगठन बनाना पड़ता है, संविधान तैयार करना पड़ता है, पदाधिकारी नियुक्त करने पड़ते हैं और पार्टी का पंजीकरण कराना पड़ता है। इसके बाद असली चुनौती शुरू होती है—कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, वित्तीय संसाधन, जनसंपर्क, स्थानीय नेतृत्व और जनता का विश्वास।
यही वह चरण है जहां अधिकांश नए प्रयोग दम तोड़ देते हैं।
लेकिन कल्पना कीजिए कि "कॉकरोच पार्टी" वास्तव में अस्तित्व में आती है। उसका नाम ही उसके प्रतीकवाद को दर्शा सकता है। कॉकरोच वह जीव माना जाता है जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है। इस प्रतीक को यदि राजनीतिक रूप दिया जाए तो पार्टी स्वयं को आम आदमी, संघर्षशील वर्ग, बेरोजगार युवाओं, छोटे व्यापारियों और उन लोगों की आवाज बता सकती है जिन्हें लगता है कि मुख्यधारा की राजनीति उनकी समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं देती।
ऐसी पार्टी का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह केवल विरोध की राजनीति करती है या कोई ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत करती है। केवल यह कहना कि बाकी दल गलत हैं, किसी भी नए दल को स्थायी आधार नहीं दे सकता। जनता अंततः यह जानना चाहती है कि रोजगार कैसे बढ़ेगा, शिक्षा कैसे सुधरेगी, किसानों की आय कैसे बढ़ेगी, भ्रष्टाचार कैसे कम होगा और स्थानीय समस्याओं का समाधान कैसे होगा।
भारतीय राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष मतदाता व्यवहार है। लोकतंत्र का आदर्श यह कहता है कि मतदाता उम्मीदवारों और दलों का मूल्यांकन उनके काम, नीतियों और दृष्टिकोण के आधार पर करें। यही बात स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली नागरिक शास्त्र (Civics) की पुस्तकों में भी बताई जाती है। वहां मतदाताओं को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्रीय पहचान के बजाय नीतियों और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता दें।
लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है।
कई बार मतदाता अपने सामाजिक अनुभवों, स्थानीय परिस्थितियों, पारिवारिक परंपराओं, सामुदायिक प्रभावों, मीडिया संदेशों और भावनात्मक मुद्दों से प्रभावित होकर मतदान करते हैं। जाति, धर्म, क्षेत्र, स्थानीय पहचान, करिश्माई नेतृत्व और तात्कालिक घटनाएं भी चुनावी निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं। यह केवल भारत की समस्या नहीं है; दुनिया के लगभग सभी लोकतंत्रों में मतदाता व्यवहार अनेक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारकों से प्रभावित होता है।
यही कारण है कि कभी-कभी लोग उन मुद्दों पर कम और उन पहचानों पर अधिक मतदान करते दिखाई देते हैं जो उन्हें अपने आसपास के समाज से प्राप्त होती हैं।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मतदाता लगातार अधिक जागरूक हों, राजनीतिक दलों से कठिन प्रश्न पूछें और केवल नारों या भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि नीतियों, कार्यों और भविष्य की योजनाओं के आधार पर निर्णय लें।
शायद इसी कारण भारत में नए दलों और नए विचारों के लिए हमेशा स्थान बना रहता है। कोई "कॉकरोच पार्टी" वास्तव में कभी अस्तित्व में आए या न आए, लेकिन उसका विचार एक महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर उठाता है—क्या भारतीय मतदाता भविष्य में पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सुशासन जैसे मुद्दों को चुनावी बहस का केंद्र बना पाएंगे?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल के पास नहीं, बल्कि करोड़ों मतदाताओं के पास है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां नागरिक केवल मतदाता बनकर नहीं रहते, बल्कि चाहें तो स्वयं राजनीतिक विकल्प भी खड़ा कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति या समूह किसी नए विचार के साथ राजनीति में आना चाहता है, तो उसके लिए रास्ते खुले हैं। एक राजनीतिक दल बनाने के लिए कुछ लोगों को साथ लेकर पार्टी का गठन करना होता है, उसका संविधान तैयार करना होता है, पदाधिकारियों का चयन करना होता है और फिर चुनाव आयोग में पंजीकरण के लिए आवेदन करना होता है। इसके बाद असली परीक्षा शुरू होती है—जनता का विश्वास जीतने की।
शायद यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। यहां किसी स्थापित दल का विरोध करने के लिए केवल शिकायत करना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। यदि किसी नागरिक को लगता है कि मौजूदा राजनीतिक दल उसकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे, तो वह अपने विचारों को संगठन का रूप देकर जनता के बीच जा सकता है। जनता उसे स्वीकार भी कर सकती है और अस्वीकार भी। अंतिम निर्णय किसी नेता, दल या विचारधारा का नहीं, बल्कि मतदाता का होता है।
इसलिए चाहे वह कोई पुराना दल हो, कोई नया आंदोलन हो या फिर किसी मीम से जन्मी काल्पनिक "कॉकरोच पार्टी" ही क्यों न हो, लोकतंत्र में उसकी सफलता का आधार अंततः जनता का भरोसा, संगठन की मजबूती और जनहित के मुद्दों पर उसकी विश्वसनीयता ही होगी। लोकतंत्र में दरवाजे सबके लिए खुले हैं, लेकिन भीतर वही टिक पाता है जो जनता के मन में जगह बना सके।
अंकित अवस्थी





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