कैसे एक जिद ने शत्रुघ्न सिन्हा को 'शॉटगन' बना दिया
।बॉलीवुड में कुछ कलाकार अपनी खूबसूरती से पहचाने जाते हैं, कुछ अभिनय से और कुछ अपने व्यक्तित्व से। शत्रुघ्न सिन्हा उन चुनिंदा अभिनेताओं में हैं जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, बेबाक अंदाज और आत्मविश्वास के दम पर यह साबित कर दिया कि सफलता के लिए पारंपरिक 'हीरो जैसा चेहरा' होना जरूरी नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस बेटे को उसके पिता डॉक्टर बनाना चाहते थे, वह खुद मजाक में कहा करता था, "मैं तो कंपाउंडर बनने के लायक भी नहीं था, डॉक्टर कैसे बनता?"
पिता का सपना और बेटे की अलग राह
शत्रुघ्न सिन्हा के पिता भुवनेश्वरी प्रसाद सिन्हा अनुशासनप्रिय और शिक्षित व्यक्ति थे। लंबे समय तक संतान न होने के बाद उन्होंने धार्मिक संकल्प लिया। बाद में उनके घर चार पुत्रों का जन्म हुआ और उन्होंने रामायण के पात्रों से प्रेरित होकर उनके नाम राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न रखे।
चारों भाइयों में सबसे छोटे शत्रुघ्न के लिए पिता की इच्छा साफ थी—परिवार के बेटे डॉक्टर और वैज्ञानिक बनें। बड़े भाइयों ने पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, लेकिन शत्रुघ्न का मन किताबों से ज्यादा मंच, अभिनय और मिमिक्री में लगता था। स्कूल-कॉलेज के दिनों में वे मशहूर अभिनेताओं की नकल उतारकर दोस्तों का मनोरंजन करते थे और तभी उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें फिल्मों में जाना है।
घर छोड़कर पुणे का सफर
एक दिन उनकी नजर फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे के अभिनय पाठ्यक्रम के विज्ञापन पर पड़ी। उन्होंने बिना देर किए आवेदन कर दिया। असली मुश्किल घरवालों को मनाने की थी।
जब उन्होंने पिता को अपने फैसले के बारे में बताया तो घर में तीखी नाराजगी हुई। परिवार नहीं चाहता था कि उनका बेटा फिल्मों की दुनिया में जाए। लेकिन शत्रुघ्न ने अपने सपने से समझौता नहीं किया और विरोध के बावजूद पुणे पहुंच गए।
रोशन तनेजा ने पहचानी प्रतिभा
एफटीआईआई में प्रवेश आसान नहीं था। इंटरव्यू और ऑडिशन की कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। उस समय चयन समिति में अभिनय गुरु प्रोफेसर रोशन तनेजा भी मौजूद थे।
कहा जाता है कि जहां कुछ लोग उनके चेहरे-मोहरे को लेकर असमंजस में थे, वहीं रोशन तनेजा उनकी प्रभावशाली आवाज और संवाद बोलने के अंदाज से प्रभावित हुए। उन्होंने उनमें भविष्य का बड़ा अभिनेता देखा और चयन कर लिया।
एफटीआईआई में तनेजा उनके मार्गदर्शक बने। प्रशिक्षण के दौरान शत्रुघ्न ने संस्थान की कई छात्र फिल्मों में अभिनय किया। इनमें एक लघु फिल्म Angry Young Man भी थी, जिसमें जया भादुड़ी और डैनी डेन्जोंगपा भी थे। बाद में 'एंग्री यंग मैन' की पहचान अमिताभ बच्चन के नाम से अमर हुई।
चेहरे का निशान हटाना चाहते थे
पढ़ाई पूरी कर वे मुंबई पहुंचे, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उन्हें हमेशा लगता था कि उनके चेहरे पर बचपन का कट का निशान उन्हें हीरो बनने से रोक देगा। एक समय तो उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी कराने का भी मन बना लिया था।
इसी दौरान उनकी मुलाकात देव आनंद से हुई। देव आनंद ने उन्हें सलाह दी कि अपने चेहरे के निशान को मिटाने की कोशिश मत करो, यही तुम्हारी अलग पहचान बनेगा। यह बात शत्रुघ्न सिन्हा के आत्मविश्वास को नई दिशा दे गई।
विलेन बनकर छा गए
मुंबई में शुरुआती दिनों में काम मिलना आसान नहीं था। फिल्मों के सेट पर उन्होंने क्लैप बॉय तक का काम किया ताकि फिल्मकारों की नजर उन पर पड़े। आखिरकार देव आनंद ने प्रेम पुजारी में उन्हें छोटा-सा मौका दिया।
मुख्य भूमिका नहीं मिली तो उन्होंने खलनायक के किरदार स्वीकार किए। प्यार ही प्यार, रामपुर का लक्ष्मण जैसी फिल्मों में उनकी दमदार मौजूदगी ने दर्शकों का ध्यान खींचा। वे ऐसे विलेन बने जिनके संवादों पर सिनेमाघरों में तालियां बजने लगीं।
जब 'कालीचरण' ने बदल दी किस्मत
1976 में निर्देशक सुभाष घई ने उनमें छिपे नायक को पहचाना और कालीचरण के लिए चुना। निर्माता पहले राजेश खन्ना को लेना चाहते थे, लेकिन तारीखें न मिलने पर योजना बदल गई। सुभाष घई ने पूरा भरोसा जताया कि यह किरदार शत्रुघ्न सिन्हा ही निभा सकते हैं।
एक दिलचस्प किस्सा भी मशहूर है। कहानी सुनाने के लिए सुभाष घई देर रात उनके घर पहुंचे। दिनभर की थकान के कारण शत्रुघ्न स्क्रिप्ट सुनते-सुनते सो गए। अगली सुबह उन्होंने दोबारा पूरी कहानी सुनी और तुरंत फिल्म के लिए हामी भर दी।
फिल्म रिलीज हुई तो सुपरहिट साबित हुई। इसी फिल्म ने उन्हें खलनायक की छवि से निकालकर सफल नायक बना दिया।
'शॉटगन' की पहचान
इसके बाद विश्वनाथ, दोस्ताना, काला पत्थर, शान, नसीब जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के बड़े सितारों की कतार में ला खड़ा किया। उनकी दमदार आवाज, अलग संवाद शैली और बेबाक व्यक्तित्व ने उन्हें 'शॉटगन' का लोकप्रिय उपनाम दिलाया।
एक आदत जो भारी पड़ी
जहां अभिनय की तारीफ होती थी, वहीं उनकी एक आदत अक्सर आलोचना का कारण बनती थी—सेट पर देर से पहुंचना। वे कई बार घंटों लेट आते थे। उनकी आत्मकथा Anything But Khamosh में भी इसका जिक्र मिलता है।
एक घटना के अनुसार, अमिताभ बच्चन सुबह तय समय पर शूटिंग के लिए पहुंच गए थे, जबकि शत्रुघ्न कई घंटे बाद सेट पर आए। इससे दोनों के रिश्तों में लंबे समय तक दूरी बनी रही। बाद में शत्रुघ्न सिन्हा ने स्वीकार किया कि समय की पाबंदी उनकी कमजोरी थी, हालांकि वे मजाक में कहते थे, "लेट जरूर आता हूं, लेकिन शॉट एक ही टेक में पूरा कर देता हूं।"
प्रेरणा
शत्रुघ्न सिन्हा की कहानी बताती है कि कई बार हमारी सबसे बड़ी कमजोरी ही हमारी सबसे बड़ी पहचान बन जाती है। यदि उन्होंने अपने चेहरे का निशान मिटा दिया होता या परिवार के दबाव में डॉक्टर बनने की राह चुन ली होती, तो शायद भारतीय सिनेमा को उसका 'शॉटगन' कभी नहीं मिलता।
Ankit Awasthi





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