
यूसुफ़ खान ज़िबिस्को की अधूरी कहानी
हिंदी सिनेमा का इतिहास सिर्फ़ सुपरस्टारों की चमक से नहीं बना।
उसके पीछे हजारों ऐसे चेहरे भी हैं, जो स्क्रीन पर दो मिनट के लिए आए, दर्शकों को याद रह गए, मगर ज़िंदगी उन्हें कभी याद नहीं रख सकी।
यूसुफ़ खान ज़िबिस्को उन्हीं कलाकारों में से एक थे।
एक ऐसा आदमी, जिसने हीरो बनने का सपना लेकर फ़िल्म इंडस्ट्री में कदम रखा, मगर किस्मत ने उसे हमेशा दूसरे दरवाज़े पर खड़ा रखा।
वो परदे पर दिखते थे, लोग उन्हें पहचानते भी थे, लेकिन शायद ही कभी किसी ने उनका नाम याद रखा।
हीरो बनने निकला लड़का
1960 का दशक हिंदी सिनेमा में रोमांटिक नायकों का दौर था।
राजेश खन्ना का जादू चढ़ रहा था। धर्मेंद्र उभर रहे थे। शम्मी कपूर का अंदाज़ अलग था। ऐसे समय में इंडस्ट्री में जगह बनाना आसान नहीं था।
इसी दौर में यूसुफ़ अबोशर नाम का एक युवक फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष कर रहा था। लंबे कद, मजबूत शरीर और अलग चेहरे-मोहरे वाले यूसुफ़ को उम्मीद थी कि कभी न कभी कोई बड़ा मौका ज़रूर मिलेगा।
आख़िरकार 1969 में उन्हें जंगल की हसीना नाम की फिल्म में हीरो का रोल मिला।
फिल्म छोटी थी, प्रचार कमजोर था और रिलीज़ के बाद लगभग गुमनामी में चली गई।
लेकिन असली चोट फिल्म के फ्लॉप होने से ज़्यादा उस सपने पर लगी, जो यूसुफ़ अपने साथ लेकर आए थे।
उस दौर में एक फ्लॉप फिल्म कई बार अभिनेता का भविष्य तय कर देती थी।
यूसुफ़ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
नाम बदलने की मजबूरी
फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने वालों को अक्सर सबसे पहले अपना नाम बदलने की सलाह मिलती थी।
किसी को लगता नाम भारी है, किसी को लगता नाम बिकाऊ नहीं है, किसी को लगता उसमें “स्टार वाली बात” नहीं है।
यूसुफ़ से भी कहा गया कि नाम बदलो।
उन्होंने अपना नाम रखा — यश राज।
यह दिलचस्प विडंबना है कि जिस नाम में “यश” था, वही उन्हें कभी स्टारडम नहीं दे सका।
हीरो के रोल बंद हो चुके थे।
ऐसे में उन्होंने समझ लिया कि इंडस्ट्री में टिकना है तो जो मिल रहा है, वही करना होगा।
यहीं से शुरू हुआ उनका दूसरा संघर्ष।
विलेन का आदमी
1970 में आई तमिल फिल्म कालम वेल्लम में यूसुफ़ ने खलनायक की भूमिका निभाई।
फिल्म सफल रही। उनके एक्शन और स्क्रीन प्रेज़ेंस की चर्चा भी हुई।
लेकिन हिंदी सिनेमा में उस समय “मजबूत शरीर” वाले कलाकारों को अक्सर एक ही खांचे में डाल दिया जाता था — गुंडा, बॉक्सर, बॉडीगार्ड या विलेन का साथी।
यूसुफ़ भी उसी ढांचे में फंसते चले गए।
1971 की हातिम ताई जैसी बी-ग्रेड फिल्मों से लेकर छोटे-मोटे रोल्स तक, वो लगातार काम तो कर रहे थे, मगर पहचान अब भी दूर थी।
फिर आई बॉम्बे टू गोवा।
इस फिल्म में उनका “पेड्रो बॉक्सर” वाला किरदार छोटा था, लेकिन महमूद के साथ उनका फाइट सीन दर्शकों को याद रह गया।
यहीं से पहली बार लोगों ने नोटिस करना शुरू किया कि यह आदमी स्क्रीन पर आते ही अलग दिखता है।
“ज़िबिस्को” बनने की कहानी
1977 में अमर अकबर एंथोनी रिलीज़ हुई।
मनमोहन देसाई की यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में गिनी जाती है।
यूसुफ़ इसमें परवीन बाबी के बॉडीगार्ड बने थे। किरदार का नाम था — ज़िबिस्को।
असल में “ज़िबिस्को” उस दौर के मशहूर रेसलर स्टैन ज़िबिस्को से प्रेरित नाम था। यूसुफ़ की मजबूत कद-काठी देखकर यह नाम उन पर फिट बैठ गया।
विडंबना देखिए —
जिस कलाकार को इंडस्ट्री में पहचान नहीं मिल रही थी, उसे आखिरकार उसके असली नाम से नहीं, किरदार के नाम से पहचान मिली।
इसके बाद यूसुफ़ खान “ज़िबिस्को” बन गए।
अमिताभ के दौर का चेहरा
1970 और 80 का दशक अमिताभ बच्चन के “एंग्री यंग मैन” युग का समय था।
उस दौर की फिल्मों में बड़े विलेन के साथ कई छोटे गुर्गे भी होते थे, जिनकी स्क्रीन पर मौजूदगी कहानी में ताकत भरती थी।
ज़िबिस्को ऐसे ही चेहरों में शामिल हो गए।
उन्होंने मुकद्दर का सिकंदर, देस परदेस, नसीब, कर्ज़, प्रोफ़ेसर प्यारेलाल जैसी फिल्मों में काम किया।
वो अक्सर हीरो से मार खाने वाले आदमी बनते थे, मगर उनकी शारीरिक मौजूदगी इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शक उन्हें नोटिस कर लेते थे।
बाद में मिथुन चक्रवर्ती के दौर में भी उन्होंने डिस्को डांसर, बॉक्सर, घर एक मंदिर जैसी फिल्मों में काम किया।
वो कभी स्टार नहीं बने, मगर इंडस्ट्री के “ज़रूरी चेहरों” में शामिल हो गए थे।
संघर्ष जो कभी खत्म नहीं हुआ
यूसुफ़ खान की कहानी सिर्फ़ एक अभिनेता की कहानी नहीं है।
यह उस पूरी पीढ़ी की कहानी है, जो फिल्मों में दिखती तो थी, मगर फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में दर्ज नहीं हो सकी।
उनके पास शोहरत की झलक थी, मगर स्थायित्व नहीं।
काम था, मगर सुरक्षा नहीं।
पहचान थी, मगर सम्मान सीमित।
आज के समय में सहायक कलाकार सोशल मीडिया या इंटरव्यूज़ के ज़रिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा लेते हैं।
मगर उस दौर में अगर कोई स्टार नहीं था, तो धीरे-धीरे गुमनाम हो जाना तय था।
अचानक अंत
1985 में हैदराबाद में शूटिंग के दौरान उन्हें हार्ट अटैक आया।
सिर्फ़ 48 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।
यह एक ऐसा अंत था, जिस पर इंडस्ट्री ने ज़्यादा शोर नहीं किया।
कोई बड़ा शोक संदेश नहीं।
कोई लंबी श्रद्धांजलि नहीं।
बस कुछ लोगों ने सुना कि “ज़िबिस्को नहीं रहे।”
और जिंदगी आगे बढ़ गई।
उनकी कई फिल्में बाद में रिलीज़ हुईं, जैसे अक्सर संघर्षशील कलाकारों के साथ होता है —
आदमी चला जाता है, मगर स्क्रीन पर उसका चेहरा कुछ समय और चलता रहता है।
परिवार और अधूरी विरासत
उनके बेटे फ़राज़ खान ने भी अभिनय में हाथ आजमाया।
मेहंदी फिल्म में उनका काम लोगों को याद है।
मगर जैसे पिता का करियर अधूरा रह गया था, वैसे ही फ़राज़ भी बड़े स्टार नहीं बन सके।
2020 में फ़राज़ खान का निधन हो गया।
उनकी बेटी फाद्या, जिन्हें इंडस्ट्री में डिम्पी फाद्या कहा जाता है, अभिनय और थिएटर से जुड़ी रहीं।
जबकि सौतेले बेटे फ़हमान खान टीवी इंडस्ट्री का जाना-पहचाना नाम बने।
यह दिलचस्प है कि जिस आदमी को जिंदगी भर पहचान की तलाश रही, उसकी अगली पीढ़ियां अलग-अलग रूपों में उसी इंडस्ट्री में अपनी जगह खोजती रहीं।
यूसुफ़ खान ज़िबिस्को आखिर याद क्यों रहने चाहिए?
क्योंकि हिंदी सिनेमा सिर्फ़ राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान की कहानी नहीं है।
यह उन कलाकारों की भी कहानी है, जिन्होंने बिना शिकायत भीड़ का हिस्सा बनकर फिल्मों को जीवित रखा।
ज़िबिस्को उन चेहरों में से थे जिन्हें दर्शक देखकर कहते थे —
“अरे, ये आदमी कहीं देखा है…”
लेकिन शायद बहुत कम लोग उनका नाम जानते थे।
और शायद यही हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा सच भी है —
परदे पर दिख जाना और इतिहास में दर्ज हो जाना, दोनों अलग बातें हैं।
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