
अज्ञान के अंधकार के अनन्य अनुरागी
बादल सरोज
राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर हिमाचल प्रदेश के ऊना में जवाहर नवोदय विद्यालय स्कूल के बच्चों से बात करने गए भाजपा सांसद, पूर्व मंत्री अनुराग ठाकुर ने उनका भाषण सुनने के लिए जमा हुए बच्चों से एक सवाल पूछा कि अंतरिक्ष में यात्रा करने वाला पहला व्यक्ति कौन था? सारे बच्चों ने एक स्वर में जोर से जवाब दिया : यूरी गागारिन!! बच्चों की इस जानकारी को सराहने की बजाय, एक तरह से उन्हें गलत साबित करते हुए सांसद जी ने फरमाया कि "मुझे तो लगता है कि पहले अंतरिक्ष यात्री हनुमान जी थे।" बच्चों के पास चुप रहकर और एक-दूसरे की ओर देखने के सिवाय कोई चारा नहीं था। 'गोली मारो' फेम अनुराग ठाकुर यहीं तक नहीं रुके और आगे बढ़कर सारी ज्ञान-विज्ञान परम्परा को गोली मारते हुए फरमान दिया कि, “जब तक हमें अपनी हजारों वर्ष पुरानी परंपरा का ज्ञान और संस्कृति का ज्ञान नहीं होगा, तो जो अंग्रेजों ने हमें सिखाया है, वहीं तक सीमित होकर रह जाएंगे।“ अपनी मूर्खता की पिस्तौल की पूरी मैगज़ीन खाली करने के इरादे से वे बच्चों को पढ़ाने वालों की तरफ भी मुखातिब हुए और स्कूल के प्राचार्य और अध्यापकों से निर्देशात्मक अनुरोध कर दिया कि “वे भी यदि किताबों से निकलकर वेद और परंपराओं की ओर देखेंगे, तो कुछ नया देखने को मिलेगा।“ इसे सिर्फ एक व्यक्ति की बुद्धिहीनता, अज्ञानता या बेवकूफी या मूर्खता या ऐसे ही किसी एक शब्द में परिभाषित नहीं किया जा सकता। यह इनसे परे और बहुत आगे की बात है, क्योंकि यह सिर्फ अनुराग के बेतुके राग की बात नहीं है। यह अज्ञान के अन्धकार के साथ अनन्य अनुराग की महापरियोजना का अभिन्न अनुभाग है। इसलिए कि इस तरह का प्रलाप करने वाले वे न पहले हैं, न अकेले। वे उस जंजीर की एक कड़ी हैं, जिससे भारत के समाज के ज्ञान, तर्क, विवेक और समूचे मानव समाज के अब तक के हासिल विज्ञान को कसकर जकड़कर एक घुप्प अंधेरी गुफा में धकेलने की महापरियोजना, इन दिनों कुछ ज्यादा ही तेजी के साथ, चल रही है। उनके सहविचार, शाखा दीक्षित सखा और इन दिनों देश के कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो दिन बाद इसे और आगे बढ़ाते हुए दावा किया कि “राईट बंधुओं के हवाई जहाज बनाने की बात गलत है – उनसे हजारों वर्ष पहले ही पुष्पक विमान बनाया और उड़ाया जा चुका था।“ बात को और वजनदार बनाने के लिए उन्होंने यह भी दावा किया कि “ड्रोन और मिसाईलें भी न जाने कब से रही हैं, महाभारत की लड़ाई में इनके इस्तेमाल किये जाने के ‘प्रमाण’ होने की भी बात उन्होंने बताई। मजेदार विडम्बना यह है कि यह बात वे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) भोपाल से निकले वैज्ञानिक शिक्षा के नए विशेषज्ञों के दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे। उनके इस ‘ज्ञान’ को अगर इन नए-नए दीक्षांत विशेषज्ञों ने तनिक-सी भी गंभीरता से ले लिया, तो इस देश की नई पीढ़ी की विज्ञान शिक्षा का क्या हाल होगा, यह सोचकर ही सिहरन होती है। एक बार फिर दोहराने में हर्ज नहीं कि अनराग ठाकुर और शिवराज सिंह चौहान अपवाद नहीं है ; वे उस व्यवस्थित अभियान के नियम हैं, जिसमें ऊपर से नीचे – मोदी से लेकर उनकी पैदल सेना – तक पूरी की पूरी अक्षौहिणी सेना जुटी हुई है। प्रधानमन्त्री बनने के बाद 2014 में इस नव-अज्ञान की अजस्र धारा को प्रवाहित करने के लिए सारे तटबंधों को एक साथ खोलने का ‘शुभारम्भ’ स्वयं मोदी जी ने किया था। एक अस्पताल का उदघाटन करते हुए उन्होंने रहस्योदघाटन-सा करते हुए बताया था कि विश्व की सबसे पहली प्लास्टिक सर्जरी इधरिच हुई थी, जब गणेश जी के कटे सर की जगह हाथी का सर लगा दिया गया था। इसी भाषण में उन्होंने ठंड का भी खंडन करते हुए बताया कि देह को ठण्ड-वण्ड नहीं लगती, यह तो आभास है, जो बढती उम्र के साथ होता है। इसी मुहिम का झंडा थामे थामे बाद में उन्होंने पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित करते हुए कोरोना के वायरस को भगाने के लिए घंटे, घंटरियां, थाली-लोटा-बाल्टी बजाईं भी, बजवाई भीं। दिए से लेकर मोमबत्ती तक जलवाईं भी, जलायीं भी। उनके बाद तो जैसे सारे नदी-नाले हरहराकर बह निकले ; यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित दिनेश शर्मा ने खोजबीन कर बताया कि सीता मटके में से नहीं निकली थीं, वे दरअसल पहली टेस्टट्यूब बेबी थीं। त्रिपुरा के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने विज्ञान में विप्लव मचाते हुए दावा किया कि इंटरनेट तो इधर हजारों साल से है ; संजय युद्ध का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को इसी की मदद से सुनाया करते थे। मुम्बई के पुलिस कमिश्नर से मोदी की सरकार में मंत्री बने सत्यपाल सिंह ने विकासवाद के डार्विन के सिद्धांत को ही ठुकरा दिया, क्योंकि बकौल उनके, उन्होंने किसी बन्दर को आदमी बनते हुए देखाइच नहीं था। केंद्र सरकार में विज्ञान और प्रोद्योगिकी के मंत्री और खुद डॉक्टर रहे हर्षवर्धन ने बताया कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत वेदों में हैं। आईंस्टीन का E=mc² भी वेदों में था और यहाँ तक दावा कर मारा कि स्वयं स्टीफन हाकिंग ने इस बात को माना है। जब पत्रकारों ने इसका स्रोत पूछा, तो उन्होंने अत्यंत ढिठाई के साथ कहा कि “अपन ने तो बता दिया, अब स्रोत ढूंढना आपका काम है।“ अब तो कथा लिपे-लिपाये से आगे बढ़ चुकी है। कुनबे के एक और अनन्य, स्वामी चक्रपाणि ने चन्द्रमा को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने और चंद्रयान के जिस लैंडिंग पॉइंट का नामकरण मोदी जी ने शिवशक्ति पॉइंट घोषित किया था, उसे उस हिन्दू राष्ट्र की राजधानी भी बनाने की मांग कर दी। बात यही तक नहीं रुकी। इसरो के वैज्ञानिकों को भी इसी परियोजना में लगा दिया गया। इसके अध्यक्ष, जिनकी अगुआई में चंद्रयान-3 छोड़ा गया था, उन जनाब सोमनाथ जी ने दावा किया कि ‘साइंस माने विज्ञान के सिद्धांत वेदों से आये हैं। अलजेब्रा से लेकर एविएशन तक सब वेदों में ही है।‘ यह अलग बात है कि उन्होंने अलजेब्रा और एविएशन शब्दों का ही इस्तेमाल किया, इनके लिए वेदों वाले नाम नहीं बताये। अवैज्ञानिकता की दुम को सींग की तरह लहराते हुए इस हुजूम में कुछ माननीय जज भी शामिल हो गए और मोरों के आंसुओं में ही उसके बाप बनने की खोजबीन कर आये। यह सब उस देश में हो रहा है, जो उन कुछ देशों में से एक है, जिसके नागरिक होने के कर्तव्यों में वैज्ञानिक रुझान का होना शामिल है। इसके अनुच्छेद 51 (क) में दिए भारत के नागरिकों के 11 कर्तव्यों में से एक आठवां कर्तव्य है, जो प्रावधान करता है कि हर नागरिक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जिज्ञासा एवं सुधार की भावना का विकास करना होगा। ऐसे देश में संविधान की कसम खाकर सत्ता में बैठे लोगों द्वारा वैज्ञानिक नजरिये का इस तरह अपमान, यहाँ तक कि खुद विज्ञान का ही धिक्कार अनायास या अचानक नहीं है। यह उस हिन्दू राष्ट्र की झांकी है, जिसे इस कुनबे के हिसाब से अभी इस देश में लाना बाकी है। यही वजह है कि शिक्षा और ज्ञान की क्षमता को विकसित करने वाले सारे संस्थान इनके निशाने पर है ; सिर्फ जे एन यू ही नहीं, सभी विश्वविध्यालयो से इन्हें डर लगता है। यदि आज वे उन्हें हमेशा के लिए बंद नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें कुंद तो कर दे रहे हैं। उनके पाठ्यक्रम में पोंगापंथ, कर्मकांड, अंधविश्वास को शामिल कर देना चाहते है। आम अवाम की पहुँच से शिक्षा की संभावनाओं का बहिष्करण अब शिक्षा के अति-अभिजात्यीकरण तक आ गया है। कथित राष्ट्रीय गौरव बताकर कविताओं, कहानियों और मिथकों में कही गयी अवैज्ञानिकता को ही विज्ञान बताना इसी का हिस्सा है। जनता के दिमाग में जितना अन्धेरा होगा – विभाजन और नफरत की दीमक की बाँबियों को लहलहाना और कारपोरेट भेड़ियों को लूट के लिए निर्द्वंद छोड़ देना उतना ही आसान होगा। यह परियोजना शिक्षा भर में नहीं है, अर्थनीति से संस्कृति, सामाजिक जीवन से राजनीति तक में यह बरपी हुयी है। ज्यों-ज्यों जनता से अलगाव बढ़ता जा रहा है, त्यों-त्यों और अधिक तेजी से बरपाई जा रही है। अब तो उस धर्म के क्षेत्र में भी इसकी बहार आई हुई है, जिस हिन्दू धर्म के नाम पर कुनबे ने अपनी पूरी दूकान सजा कर रखी है। यूपी के इटावा में ओबीसी समुदाय से जुड़े कथावाचकों का मुंडन और चेहरे पर कालिख पोतने से होती हुई रामअभद्राचार्य के सिर्फ संस्कृत जानने वालों को ही धर्म के धंधे में आने की अनुमति देने तक जा पहुंची है। इसरो वाले सोमनाथ ने जब ज्ञान और बुद्धि के सोमनाथ का भंजन किया, तब यह भी कहा था कि ‘संस्कृत कम्प्यूटर और आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस के लिए बहुत मुफ़ीद है।‘ देश को बताई जा रही ये सारी प्रस्थापनाएं और अज्ञान की महिमा गाथाओं की असलियत इन्हें पता है, इसलिए इनमें से किसी की भी संतानें वेद और संस्कृत नहीं पढ़ रही। जो हनुमान को पहला अंतरिक्ष यात्री बता रहे थे, उनके बेटे देवभूमि माने जाने वाले हिमाचल के किसी गुरुकुल में नहीं पढ़ते। वेदों को पुष्पक से लेकर पुराणों में सारा विज्ञान बताने वाले शिवराज सिंह चौहान, जो खुद बार-बार स्वदेशी शिक्षा की वकालत करते अपना गला बैठाते रहते हैं, उनके बेटे कार्तिकेय चौहान ने वेदों का पारायण नहीं किया – वे कृष्ण की पाठशाला बताये जाने वाले उज्जैन के सांदीपनी आश्रम में नहीं पढ़ते ; वे जिन्हें विज्ञान के ज्ञान का अक्षय स्रोत बताते हैं, उन पुराणों में जिस समंदर को पार करके जाना धर्मच्युत हो जाना माना जाता है, ऐसे सात समन्दर पार करके अमेरिका की महँगी यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिलवानिया में पढ़कर आये हैं। उनके कुनबे में इस तरह के पाखंड का आम रिवाज है।
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के बेटे नीरज सिंह ने इंग्लॅण्ड की लीड्स यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है।
निर्मला सीतारमण की बेटी पराकला वांग्मयी ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में पढ़ाई की है।
सीजफायर सिद्ध एस. जयशंकर के बेटे ध्रुव जयशंकर ने अमरीका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से मास्टर्स इन सिक्योरिटी स्टडीज की डिग्री ली है।
हरदीप सिंह पुरी की बेटी ने ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सिटी से बीए किया है। कुनबे में शरणागत हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महा आर्यमन सिंधिया ने अमरीका की येल यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है।
ऐसे नाम यदि सुबह से गिनाना शुरू करेंगे, तो शाम हो जाएगी। यहाँ मसला कौन, कहाँ पढने जाता है, का नहीं है ; शिक्षा में कहीं से भी डिग्री लेना झूठी डिग्री छुपाये-छुपाये घूमने से तो लाख गुना अच्छी बात है। इन सबके बारे में बताने और कुछ नाम गिनाने का आशय सार रूप में सिर्फ इतना है कि जो बाकी देश को अँधेरे में धकेलने के लिए कमर कसे बैठे हैं, वे अपने घर-परिवार को उससे दूर ही रखना चाहते हैं, बाकियों का आज और आगामी कल धुंधला करने में जी जान लगा देते है, मगर अपना वर्तमान और भविष्य चमकीला ही रखना चाहते हैं। बड़ी समस्या अज्ञान के ये अनन्य अनुरागी नहीं हैं ; इस तरह के तिकड़मी लोग मानव समाज के विकास के हर चरण में रहे हैं। उन्होंने हर चंद कोशिश की है कि जो शासित और शोषित हैं, वे हमेशा ज्ञान और विवेक ही नहीं, बल्कि सामान्य शिक्षा और अक्षर ज्ञान से भी वंचित रहें। उन्होंने हर संभव-असंभव साजिशें रची, मगर अंततः वे नाकामयाब ही रहे। सवाल उठाने और असहमति दर्ज कराने वाले मानव समाज ने अपनी प्रश्नाकुलता को बनाए रखते हुए रौशनी और जगार बनाए रखी ; इन्हीं की वजह से चर्च से लेकर मनु तक के विरोध और क्रोध का मुकाबला करते, उन्हें पराजित करते हुए समाज आगे बढ़ा है। अन्धेरा स्थायी नहीं रहा – इन सारे जतनों से वह कुम्हलाया और आखिर में तिरोहित हुआ है। सवाल उठाने के जोखिम हैं – मगर चुप्प रहने के जोखिम उससे ज्यादा बड़े हैं। अनुराग ठाकुर की बकवास के समय नवोदय विद्यालय के प्राचार्य या एक भी शिक्षक ने, शिवराज सिंह के अज्ञान प्रक्षालन के समय एक भी फैकल्टी या डिग्री लेने वाले वैज्ञानिक शोधार्थी ने, मोदी के बोलते समय एक भी डॉक्टर ने यदि असहमति में हाथ उठाया होता, इंकार में सर हिलाया होता, तो एक झटके में उस अँधेरे को गायब किया जा सकता था, जिसे फैलाने का जाल बिछाया जा रहा था। यह इन शिक्षकों, शोधार्थियों, चिकित्सकों की भर्त्सना के इरादे से नहीं कहा जा रहा ; मुमकिन है कि उनकी विवशताएँ और मजबूरियाँ रही होंगी। यह एक सबक के रूप में दोहराया जा रहा है और वह यह है कि ज्ञान, विज्ञान, तर्क, विवेक को बचाने के लिए आगे आना पड़ेगा ; कभी संगठित जमात के रूप में, कभी जाग्रत और साहसी समूह के रूप में और यदि आवश्यकता पड़ी, तो अकेले व्यक्ति के रूप में भी ; अमावस को अमावस और पूर्णिमा को पूर्णिमा कहना ही होगा । राजा अगर निर्वस्त्र है, तो उसे निर्वस्त्र बताना ही पड़ेगा। मानव समाज इसी तरह विकसित हुआ है – ऐसे ही आगे बढेगा।
(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 094250-06716)
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