
जल संघर्ष: चेतावनी, विकल्प और नीति
यह कथन कि भविष्य के युद्ध पानी के लिए लड़े जाएंगे, लंबे समय तक अतिशयोक्ति माना जाता रहा है, लेकिन बदलती जलवायु, अनियंत्रित शहरीकरण और नीति-स्तरीय उदासीनता ने इसे धीरे-धीरे एक संभावित यथार्थ में बदल दिया है। भारत जैसे देश में, जहाँ सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और जहाँ आज भी कृषि, उद्योग और शहरी जीवन पानी पर ही टिके हैं, जल संकट केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा—यह सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। पानी की कमी अब केवल सूखे क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि महानगरों की जीवनरेखा पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही है।
भारत में जल संकट की विडंबना यह है कि समस्या पानी की अनुपलब्धता की नहीं, बल्कि उसके असमान वितरण और कुप्रबंधन की है। कुछ महीनों की अत्यधिक वर्षा और बाकी समय लंबा सूखा, भू-जल का अंधाधुंध दोहन, पारंपरिक जलस्रोतों का लोप और कृषि में जल-खपत आधारित नीतियाँ—ये सभी मिलकर एक ऐसा दबाव बनाते हैं, जो समाज के भीतर टकराव की जमीन तैयार करता है। जब किसान सिंचाई के लिए संघर्ष करता है और शहर पीने के पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर हो जाता है, तब जल संकट केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का रूप ले लेता है।
इसी बीच विज्ञान उम्मीद की किरण लेकर आता है—हवा से पानी निकालने की तकनीक, खारे पानी को मीठा करने की मशीनें, और अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण। हाल के वर्षों में भारत के कुछ शहरों में ऐसी तकनीकों का प्रयोग शुरू हुआ है, जो यह संकेत देता है कि समाधान संभव हैं। लेकिन यहाँ एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है—क्या यह तकनीक हर व्यक्ति के लिए सुलभ होगी? इतिहास बताता है कि जब कोई संसाधन तकनीक पर निर्भर हो जाता है, तो वह पहले संपन्न वर्ग तक पहुँचता है। यदि पानी भी बाजार की वस्तु बन गया, तो संकट समाप्त होने के बजाय और गहरा हो सकता है।
यहीं विज्ञान का दूसरा चेहरा सामने आता है। वही विज्ञान जो समाधान देता है, अनियंत्रित होने पर असमानता और टकराव को जन्म देता है। साइबर फ्रॉड और फेक न्यूज़ की तरह, जल तकनीक भी यदि नीति और नैतिक नियंत्रण के बिना आगे बढ़ी, तो वह समाज को जोड़ने के बजाय बाँट सकती है। इसलिए पानी के प्रश्न पर तकनीकी चमत्कारों से अधिक आवश्यक है नीतिगत विवेक—जहाँ विज्ञान सहायक बने, विकल्प नहीं।
सरकारों के सामने दिशा स्पष्ट होनी चाहिए। वर्षा जल संचयन को प्रतीकात्मक अभियान नहीं, अनिवार्य नागरिक आचरण बनाना होगा। कृषि नीति को भूगोल के अनुसार ढालना होगा, ताकि हर क्षेत्र पर एक-सी जल-खपत वाली फसलें न थोपी जाएँ। शहरों में झीलों, तालाबों और जलमार्गों का पुनर्जीवन केवल सौंदर्य परियोजना नहीं, बल्कि जल सुरक्षा रणनीति बने। तकनीक का उपयोग हो, लेकिन विकेन्द्रित और सस्ती व्यवस्था के रूप में, ताकि गांव और शहर दोनों लाभान्वित हों।
अंततः जल पर संघर्ष को टालने की जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं है। समाज को भी यह समझना होगा कि पानी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, सामूहिक विरासत है। जब तक उपभोग की संस्कृति पर नियंत्रण और संरक्षण की चेतना विकसित नहीं होगी, तब तक कोई मशीन, कोई नीति पर्याप्त नहीं होगी। जल युद्ध कोई तयशुदा भविष्य नहीं है, लेकिन यह चेतावनी अवश्य है—कि यदि अभी संतुलन नहीं साधा गया, तो आने वाला समय हमें कठोर प्रश्नों के सामने खड़ा कर देगा। पानी को बचाना आज पर्यावरण का नहीं, सभ्यता को बचाने का प्रश्न बन चुका है।
Ankit Awasthi





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