
भारत: क्रांतिकारी चेतना की निरंतर धारा और बलिदान की जीवित परंपरा
भारत आज जिस दौर में है उसमे एक नयी चेतना का संचार है, सपने है, राष्ट्र है, देशभक्ति है और एक अदम्य सहस है जो सीमाओं को लाँघ कर नित नए आकाश छु रहा है| हमने विज्ञान और विरासत सबको एक साथ संभाला है, ये हमे विश्व पटल पर एक ऐसे राष्ट्र के रूप में रखता है जो किसी पहचान का मोहताज नहीं है| हम एक तेज़ी से बढती हुई अर्थव्यवस्था है तो एक कोने में ग्रामीण भारत को भी साथ लेकर चलने वाले देश है, जिसमे ग्राम स्वराज है, परमार्थ है, चेतना है, ज्ञान है तो वही विज्ञान भी है |सबसे युवा लोकतंत्र होने का गौरव है तो साथ ही सबसे बड़े गणतंत्र का संकल्प भी है | अनेकता में एकता की झांकियां है तो एक तिरंगे के आघे सब न्योछावर करने वाले वीर भी है | ये सदियों में एकत्र हुई चेतना है जिसे शौर्य, सहस और बलिदानों ने सीचा है कुछ दिनों में आने वाला गणतंत्र दिवस अपने आप में भारत को एक नयी उर्जा से भर देगा |
भारत का इतिहास केवल राजवंशों, युद्धों और सत्ता परिवर्तन की कथा नहीं है; वह एक गहरी क्रांतिकारी चेतना की कहानी है, जो समय-समय पर अलग-अलग रूपों में प्रकट होती रही है। यहाँ क्रांति कभी केवल हथियार उठाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने विचार, शिक्षा, विज्ञान और सामाजिक सुधार के माध्यम से भी राष्ट्र की रक्षा और पुनर्निर्माण किया है। यही कारण है कि भारत को केवल एक प्राचीन सभ्यता नहीं, बल्कि एक वीर भूमि कहा जाता है—ऐसी भूमि जिसने बाहरी आक्रमणों, आंतरिक अन्याय और वैचारिक जड़ता—तीनों से जूझते हुए अपनी आत्मा को जीवित रखा।
औपनिवेशिक काल में चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता कोई याचना नहीं, बल्कि संकल्प का परिणाम होती है। आज़ाद का बलिदान केवल अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह नहीं था, वह उस मानसिक दासता के खिलाफ़ अंतिम प्रतिरोध था जो भय के सहारे शासन करती थी। उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि राष्ट्र की रक्षा केवल जीवित रहकर नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर प्राण अर्पित करके भी की जाती है। इसी परंपरा में भगत सिंह जैसे विचारक क्रांतिकारियों ने यह जोड़ा कि बंदूक से बड़ी ताकत विचार की होती है—एक ऐसी सोच जो आने वाली पीढ़ियों को प्रश्न पूछना सिखाए।
लेकिन भारत की क्रांतिकारी परंपरा केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रही। उन्नीसवीं सदी में सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक क्रांति की नींव रखी, जहाँ हथियार नहीं, शिक्षा माध्यम थी। उन्होंने उस भारत की रक्षा की जो भीतर से टूट रहा था—जाति, लैंगिक भेदभाव और अज्ञान के कारण। स्त्रियों और वंचित वर्गों को शिक्षित करना उस समय सत्ता के विरुद्ध सबसे बड़ा विद्रोह था। यह क्रांति खून से नहीं, चेतना से लड़ी गई, और इसका प्रभाव आज भी भारतीय समाज की प्रगतिशील धारा में दिखाई देता है।
आधुनिक भारत में यही क्रांतिकारी सोच विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के रूप में सामने आई। कलाम साहब ने राष्ट्र की सुरक्षा को केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक सोच और युवा शक्ति को उसका आधार बनाया। मिसाइल तकनीक से लेकर अंतरिक्ष कार्यक्रम तक, उन्होंने यह दिखाया कि ज्ञान भी एक रक्षा कवच हो सकता है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि क्रांति तब भी होती है जब प्रयोगशाला में बैठा व्यक्ति राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करता है।
भारत का इतिहास ऐसी अनगिनत गाथाओं से भरा है जहाँ हर युग में खतरे बदले, लेकिन उनका सामना करने वाली चेतना वही रही—स्वतंत्र, साहसी और नवोन्मेषी। विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत ने अपनी सांस्कृतिक पहचान नहीं खोई; औपनिवेशिक शोषण के बावजूद उसने लोकतंत्र चुना; और आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में भी वह अपने मूल्यों के साथ आगे बढ़ रहा है। यह सब संयोग नहीं, बल्कि उस निरंतर क्रांतिकारी सोच का परिणाम है जो इस भूमि की मिट्टी में रची-बसी है।
आज का भारत जब दुनिया के नक्शे पर एक सशक्त, आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में खड़ा दिखता है, तो उसके पीछे केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही बलिदान, सुधार और नवचिंतन की परंपरा है। भारत इसलिए वीर भूमि है क्योंकि उसने हर संकट में केवल प्रतिरोध नहीं किया, बल्कि खुद को बेहतर रूप में गढ़ा—और यही उसकी सबसे बड़ी क्रांति है, जो आज भी जारी है।
Ankit Awasthi





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