
गोरखपुर RTO में GVW बढ़ाने का खेल! फर्जी वज़न से मोटी कमाई - RTI में हुआ खुलासा
संतोष कुमार सिंह
लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर के सम्भागीय परिवहन कार्यालय (RTO) में ट्रकों का ग्रॉस व्हीकल वेट (GVW) नियमविरुद्ध तरीके से बढ़ाए जाने का बड़ा खुलासा हुआ है। RTI में सामने आए दस्तावेज़ बताते हैं कि कई वाहनों का अधिकृत भार सीमा वाहन निर्माता कंपनियों द्वारा तय मानकों से अलग कर RTO स्तर पर बढ़ा दी गई। यह वही GVW है जिसमें बदलाव का अधिकार केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार केवल निर्माता के पास होता है, न कि किसी RTO कार्यालय के पास। वाहन निर्माता कंपनी द्वारा तय वाहन भार सीमा में बदलाव कानूनन प्रतिबंधित है। मामला इतना संगीन है कि RTI में जब जवाब मांगा गया तो अधिकारियों ने इस गैरकानूनी काम को ‘विभाग के राजस्व हित’ में बताया, जो स्वयं में सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है—यदि यह राजस्व हित में था तो फिर पूरे प्रदेश में क्यों नहीं लागू हुआ? केवल कुछ ही ट्रकों पर ही यह नियम क्यों चलाया गया?
खुलासे के बाद विभाग में हड़कंप मचा है। शिकायत पहुंचने पर देवरिया RTO ने विवादित फाइलों का बढ़ाया गया GVW रद्द करते हुए उसे फिर पुराने भार पर बहाल किया। यह कार्रवाई स्वयं इस बात की पुष्टि करती है कि फाइलों में किया गया परिवर्तन नियमानुसार नहीं था।
सूत्रों के अनुसार यह मामला अब लखनऊ स्थित परिवहन मुख्यालय तक पहुंच चुका है और यदि शीर्ष स्तर से सख्त निर्देश जारी हुए तो संबंधित अधिकारियों पर कार्यवाही तय मानी जा रही है। शिकायतकर्ताओ का दावा है कि GVW बढ़ाने की हर फाइल के पीछे “विशेष लेन-देन” का खेल चलता रहा है, जिससे विभाग की छवि गम्भीर रूप से धूमिल हुई है।
जानकारी के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में गोरखपुर RTO के कुछ अधिकारियों ने कई 16-चक्का ट्रकों का GVW अपनी कलम से बढ़ा दिया। उदाहरणस्वरूप, 11 जून 2025 को तत्कालीन सम्भागीय निरीक्षक (प्राविधिक) सीमा गौतम ने वाहन UP53 KT 9546 का पंजीकरण के समय 49,000 किलो GVW दर्ज होने के बावजूद उसे बढ़ाकर 51,000 किलो कर दिया। इसी दिन UP53 KT 9547, 9548 व 9549 तीन और ट्रकों का वजन 49 टन से बढ़ाकर 51 टन कर दिया गया। सवाल केवल इतना नहीं कि वजन बढ़ाया गया, बल्कि यह कि वाहन निर्माता द्वारा तय क्षमता बदलने का अधिकार RTO के पास है ही नहीं, फिर यह ‘विशेष फाइलें’ पास कैसे हुईं और किस लाभ के एवज में?
RTI में इस कार्रवाई पर जवाब देते हुए सीमा गौतम ने लिखा कि “यह परिवर्तन विभागीय राजस्व हित में किया गया और व्यक्तिगत लाभ नहीं हुआ।” लेकिन जवाब से उल्टा और संदेह गहरा जाता है—यदि सच में राजस्व बढ़ रहा था तो फिर केवल कुछ चुनिंदा ट्रकों तक ही सुविधा क्यों सीमित रही? हजारों ट्रकों में यह लागू कर पूरे प्रदेश का राजस्व क्यों नहीं बढ़ाया गया?
इसके अलावा 30 अगस्त 2023 को तत्कालीन निरीक्षक राघव कुमार कुशवाहा द्वारा ट्रक UP53 FT 2349 का GVW 49 टन से बढ़ाकर 51 टन कर दिया गया। 1 सितम्बर 2023 को UP53 FT 2358 का वजन भी बढ़ा दिया गया। इसी प्रकार देवरिया के सहायक सम्भागीय परिवहन अधिकारी आशुतोष कुमार शुक्ला ने UP52 BT 2329 और UP52 BT 2330 दोनों ट्रकों का पंजीयन के समय दर्ज 47,500 किलो GVW बढ़ाकर 53,500 किलो तक कर दिया। यह सीमा परिवहन मंत्रालय द्वारा तय अधिकतम भार क्षमता से काफी अधिक है। यह भारी ओवरलोड सड़क सुरक्षा के लिए भी खतरा है और किसी दुर्घटना की स्थिति में सीधे आपराधिक जिम्मेदारी बनती है।
शिकायत होने के बाद लखनऊ मुख्यालय ने 22 जुलाई 2025 को इन ट्रकों का बढ़ाया गया GVW तुरंत रद्द करते हुए उसे पुनः 47,500 किलो पर वापस कर दिया। इससे यह साफ होता है कि परिवर्तन नियमों के विरुद्ध था और यदि मामला शांत रहता तो “राजस्व हित” के नाम पर यह खेल चलता रहता। शिकायत सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मचा है, और चर्चाएँ हैं कि आने वाले दिनों में जांच बैठ सकती है तथा दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई सम्भव है।
विशेषज्ञों का कहना है कि GVW का निर्णय केवल निर्माता कंपनी और केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम के मापदंड के आधार पर तय होता है। इसे किसी कार्यालय में बैठे अधिकारी मनमाने ढंग से नहीं बदल सकते। भारत सरकार द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार 2-एक्सल ट्रक की सीमा 18.5 टन, 3-एक्सल 28.5 टन, 4-एक्सल 35.5 टन तथा कठोर वाहन अधिकतम 49 टन तक निर्धारित किया गया है। इसके विपरीत, गोरखपुर RTO में 49 टन वाहन को कागज़ों में 53 टन तक भारी दिखा दिया गया, जो स्पष्ट तौर पर नियम विरुद्ध है।
परिवहन विभाग के भीतर इस खुलासे ने भ्रष्टाचार की पोल खोल दी है। ट्रक मालिकों के बीच पहले से चर्चा रही कि GVW बढ़ाने की एक “फिक्स रेट” व्यवस्था चलती है और अब दस्तावेजों से सामने आए आंकड़े इस शक को और मजबूत करते हैं। यदि इस मामले पर कड़ी जांच नहीं हुई तो सड़क पर ओवरलोड वाहन दुर्घटनाओं, पुल व सड़कों की क्षति और राज्य राजस्व दोनों के लिए खतरा बने रहेंगे।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि मुख्यालय इस मामले पर क्या कदम उठाता है। क्या दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही होगी या फाइलें फिर किसी कमरे में दबी रह जाएगी?





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