
मानव मन: वह अँधेरा कमरा जहाँ सबसे बड़े सच छिपे हैं
मानव इतिहास में शायद ही कोई चीज़ इतनी रहस्यमयी रही हो जितना मानव मन। सभ्यताएँ बनीं, युद्ध हुए, धर्म खड़े हुए और विज्ञान ने चाँद तक की यात्रा कर ली—लेकिन इंसान लंबे समय तक अपने ही मन की कार्यप्रणाली से अनजान रहा। बीसवीं सदी में हुए कुछ निर्णायक शोधों ने इस अज्ञान पर पहली बार सीधा प्रहार किया और यह स्पष्ट किया कि मन कोई दैवीय या अमूर्त सत्ता नहीं, बल्कि अनुभव, जैविकी और परिस्थितियों से गढ़ी गई एक जटिल संरचना है। फ्रायड द्वारा प्रस्तुत अवचेतन मन का विचार इस दिशा में पहला बड़ा झटका था, जिसने यह स्थापित किया कि हमारे निर्णय और व्यवहार चेतन तर्क से नहीं, बल्कि दबी इच्छाओं, स्मृतियों और भय से संचालित होते हैं। इसके बाद व्यवहारवाद ने यह दिखाया कि इंसान को समझने के लिए उसके आंतरिक विचारों से ज़्यादा उसके बाहरी व्यवहार को देखना उपयोगी हो सकता है, जिससे यह असहज सच्चाई सामने आई कि आदतें और प्रतिक्रियाएँ काफी हद तक प्रशिक्षण और नियंत्रण का परिणाम होती हैं।
फिर आई संज्ञानात्मक क्रांति, जिसने मानव मस्तिष्क को सूचना संसाधित करने वाली मशीन की तरह समझने की कोशिश की और यह उजागर किया कि हमारी याददाश्त, निर्णय और तर्क उतने भरोसेमंद नहीं जितना हम मानते हैं। यहीं से यह बोध पनपा कि मन वास्तविकता को जैसा है वैसा नहीं, बल्कि जैसा उसे सुविधाजनक लगता है वैसा गढ़ता है। न्यूरोसाइंस ने इस समझ को और कठोर बना दिया जब मस्तिष्क स्कैनिंग तकनीकों ने दिखाया कि विचार, भावनाएँ और नैतिक निर्णय विशुद्ध रूप से न्यूरॉन्स की गतिविधि हैं—और कई बार चेतना के जागने से पहले ही दिमाग निर्णय ले चुका होता है। सामाजिक मनोविज्ञान के प्रयोगों ने इस पूरी तस्वीर को और असहज बना दिया, यह दिखाते हुए कि सामान्य परिस्थितियों में नैतिक दिखने वाला इंसान भी सत्ता, डर और सामाजिक दबाव में अमानवीय व्यवहार कर सकता है। इससे “अच्छे” और “बुरे” व्यक्ति की पारंपरिक धारणा लगभग ढह गई।
हालिया शोधों ने हालांकि इस निराशाजनक समझ के बीच एक उम्मीद भी दी है। न्यूरोप्लास्टिसिटी और माइंडफुलनेस पर हुए अध्ययनों ने साबित किया है कि मन स्थिर नहीं है; वह अनुभव, अभ्यास और जागरूकता से बदला जा सकता है। यह विचार कि इंसान अपने ही मानसिक ढाँचे का शिकार है, अब पूरी तरह स्वीकार्य नहीं रहा। इन तमाम शोधों ने मिलकर मानव मन की कहानी को रोमांचक लेकिन असहज मोड़ पर ला खड़ा किया है—जहाँ यह साफ है कि हम जितना खुद को समझते हैं, उससे कहीं कम जानते हैं, लेकिन उतना जान लेने की क्षमता अब हमारे पास है। शायद यही आधुनिक युग की सबसे बड़ी मानसिक खोज है: मन कोई रहस्य नहीं जिसे पूजा जाए, बल्कि एक सच है जिसे समझा और बदला जा सकता है।
Ankit Awasthi





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