
क्या अमेरिका पर निर्भरता कम करने का समय आ गया है? बदलते विश्व व्यवस्था में आत्मनिर्भरता की नई बहस
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में जिस तेजी से बदलाव आए हैं, उसने एक पुराने सवाल को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है—क्या दुनिया को अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए? लंबे समय तक वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका आर्थिक, सैन्य और तकनीकी शक्ति का प्रमुख केंद्र रहा है। लेकिन नई भू-राजनीतिक परिस्थितियों, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी बदलावों के बीच कई देश अब अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इसी संदर्भ में आत्मनिर्भरता की अवधारणा फिर से वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन गई है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अमेरिका की भूमिका केंद्रीय रही। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से लेकर वैश्विक व्यापार प्रणाली तक, कई व्यवस्थाएं अमेरिकी प्रभाव के साथ विकसित हुईं। डॉलर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार की प्रमुख मुद्रा के रूप में स्वीकार किया गया और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में भी अमेरिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कारण कई दशकों तक दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था, तकनीक और रक्षा जरूरतें किसी न किसी रूप में अमेरिका से जुड़ी रहीं।
लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक संतुलन तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। चीन का आर्थिक उभार, क्षेत्रीय शक्तियों का मजबूत होना और तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने दुनिया को पहले की तुलना में अधिक बहुध्रुवीय बना दिया है। कई देश अब यह महसूस करने लगे हैं कि अत्यधिक निर्भरता किसी एक शक्ति पर होना दीर्घकाल में रणनीतिक जोखिम भी बन सकता है। इसलिए विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास तेज हुए हैं।
भारत ने भी इसी सोच के साथ आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में कई पहलें शुरू की हैं। इसका एक प्रमुख उदाहरण है Atmanirbhar Bharat, जिसके माध्यम से देश में विनिर्माण, तकनीक और रक्षा उत्पादन को मजबूत बनाने की कोशिश की जा रही है। इसका उद्देश्य केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाना ही नहीं बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को भी मजबूत करना है।
इसी तरह यूरोप के कई देशों ने भी रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी निर्भरता कम करने की नीति अपनानी शुरू की है। ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में स्थानीय क्षमताओं को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कोविड-19 महामारी और उसके बाद आई आपूर्ति संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक आपूर्ति प्रणाली में अत्यधिक निर्भरता कई बार आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकती है।
रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में भी कई देश अब अधिक स्वतंत्र रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। लंबे समय तक वैश्विक सुरक्षा ढांचे में North Atlantic Treaty Organization जैसी संस्थाओं की भूमिका प्रमुख रही है, लेकिन अब कई क्षेत्रीय शक्तियां अपने सुरक्षा ढांचे को भी मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रही हैं।
तकनीकी क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में कई देश अपनी स्वतंत्र क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं बल्कि तकनीकी संप्रभुता हासिल करना भी है।
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से परस्पर जुड़ी हुई है। ऐसे में किसी भी देश के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाना संभव नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ अलग-थलग पड़ना नहीं बल्कि अपनी रणनीतिक क्षमता को इतना मजबूत बनाना है कि किसी बाहरी दबाव से अर्थव्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित न हो।
यही कारण है कि आज कई देश “संतुलित वैश्वीकरण” की बात कर रहे हैं। इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग जारी रहे, लेकिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता भी मजबूत हो। यह सोच धीरे-धीरे एक नए वैश्विक आर्थिक ढांचे की ओर संकेत कर रही है, जिसे कई विश्लेषक “न्यू वर्ल्ड ऑर्डर” का हिस्सा मानते हैं।
इस बदलते परिदृश्य में भारत जैसे देशों के लिए अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। यदि घरेलू उद्योग, तकनीक और नवाचार को मजबूत किया जाता है तो यह देश को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका दिला सकता है। लेकिन इसके लिए दीर्घकालिक नीति, निवेश और कौशल विकास की भी आवश्यकता होगी।
अंततः सवाल केवल अमेरिका पर निर्भरता कम करने का नहीं है, बल्कि एक अधिक संतुलित और टिकाऊ वैश्विक व्यवस्था बनाने का है। आज की दुनिया में सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। ऐसे में जो देश अपनी आंतरिक क्षमता मजबूत करते हुए वैश्विक सहयोग को संतुलित ढंग से अपनाएंगे, वही आने वाले समय में नई विश्व व्यवस्था में अधिक प्रभावी भूमिका निभा पाएंगे।
Ankit Awasthi





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