
अमेरिका - दुनिया का स्वयंभू चौकीदार और उसके थके हुए जूते - व्यंग्य विशेष
अमेरिका बड़ा दयालु देश है। इतना दयालु कि उसे दुनिया के हर कोने की चिंता रहती है। पड़ोसी देश में नल में पानी आ रहा है या नहीं, इसकी चिंता भले न हो, लेकिन हजारों किलोमीटर दूर किसी देश में लोकतंत्र की तबीयत कैसी है, यह उसे रात भर सोने नहीं देता।
उसकी परेशानी यह है कि दुनिया के लगभग हर युद्ध में उसका दिल किसी न किसी तरह टूट जाता है। कहीं तेल मिल जाए तो मानवाधिकार याद आ जाते हैं, कहीं सामरिक महत्व दिख जाए तो स्वतंत्रता की रक्षा का भाव उमड़ पड़ता है। ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी पर लोकतंत्र की पूरी जिम्मेदारी उसी के कंधों पर है और बाकी देश केवल दर्शक हैं।
बीसवीं सदी से लेकर इक्कीसवीं सदी तक उसने युद्धों में इतनी भागीदारी की है कि इतिहास की किताबें कभी-कभी युद्धों का नहीं, अमेरिका के यात्रा-वृत्तांत का हिस्सा लगती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आम पर्यटक कैमरा लेकर जाता है और महाशक्ति विमानवाहक पोत लेकर।
अमेरिका की विदेश नीति उस अध्यापक जैसी लगती है जो पूरी कक्षा को अनुशासन का पाठ पढ़ाता है, लेकिन अपनी मेज पर रखी छड़ी के बारे में कोई सवाल पसंद नहीं करता। दुनिया को शांति का संदेश देते हुए उसके रक्षा बजट का आकार कई देशों की पूरी अर्थव्यवस्था से बड़ा दिखाई देता है। यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति रोज़ स्वास्थ्य पर भाषण दे और साथ में मिठाई की दुकान भी चलाए।
दिलचस्प बात यह है कि हर युग में उसका कोई न कोई "खलनायक" अवश्य रहा है। कभी साम्यवाद, कभी आतंकवाद, कभी कोई विद्रोही राष्ट्र, कभी कोई उभरती शक्ति। ऐसा प्रतीत होता है कि हॉलीवुड की तरह उसकी राजनीति को भी हर सीज़न में एक नया विलेन चाहिए। दर्शकों का मनोरंजन बना रहना चाहिए।
लेकिन समय बड़ा निष्ठुर होता है। वही अमेरिका, जो कभी दुनिया को एकध्रुवीय व्यवस्था का पाठ पढ़ाता था, आज स्वयं कई सवालों से घिरा दिखाई देता है। राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक तनाव, आर्थिक असमानता और वैश्विक प्रभाव को बनाए रखने की चुनौती—ये सब उसकी मेज पर रखी वे फाइलें हैं जिन्हें कैमरे के सामने कम खोला जाता है।
दुनिया भी अब पहले जैसी नहीं रही। कई देश अब विद्यार्थी की तरह सिर झुकाकर नोट्स नहीं लिखते, बल्कि अध्यापक से प्रश्न भी पूछने लगे हैं। और प्रश्न सत्ता को उतने ही असुविधाजनक लगते हैं जितने परीक्षा में कठिन सवाल विद्यार्थियों को।
विडंबना यह है कि जो देश दशकों तक दुनिया को दिशा देता रहा, वह आज स्वयं अपने रास्तों के चौराहे पर खड़ा दिखाई देता है। उसके पास अब भी शक्ति है, प्रभाव है, संसाधन हैं, लेकिन वह पुराना आत्मविश्वास नहीं दिखता जो शीत युद्ध के बाद दिखाई देता था। दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है और महाशक्तियों को यह बात उतनी ही कठिन लगती है जितनी किसी पुराने राजा को लोकतंत्र।
फिर भी अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना नहीं, उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, उसकी तकनीक भी नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह बार-बार गिरकर भी स्वयं को नया रूप देने की क्षमता रखता है। इतिहास गवाह है कि साम्राज्य अक्सर अपनी शक्ति से नहीं, अपने अहंकार से हारते हैं।
और शायद यही इस व्यंग्य का निष्कर्ष है—
दुनिया को बचाने निकला चौकीदार जब हर गली में सीटी बजाने लगे, तो एक दिन उसे अपने ही घर का टूटा हुआ दरवाज़ा भी दिखाई देने लगता है।
तब इतिहास मुस्कुराकर कहता है—
"दूसरों को आईना दिखाने वालों को कभी-कभी अपना चेहरा भी देख लेना चाहिए।"
Ankit Awasthi





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