
आज का इतिहास: शहादत, चेतना और संकल्प का दिन
भारत के इतिहास में 30 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को झकझोर देने वाला दिन है। इसी दिन देश ने अपने राष्ट्रपिता को खोया, लेकिन साथ ही अहिंसा, सत्य और नैतिक साहस की विरासत भी पाई, जो आज तक भारत की आत्मा में जीवित है।
महात्मा गांधी की शहादत: एक युग का अंत, विचारों की शुरुआत
30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिरला भवन में शाम की प्रार्थना सभा के दौरान महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए गहरा आघात थी। गांधी की मृत्यु के साथ एक शरीर भले ही चला गया, लेकिन उनके विचार—अहिंसा, सत्याग्रह और सामाजिक न्याय—आज भी वैश्विक राजनीति और आंदोलनों को दिशा देते हैं।
इसी कारण 30 जनवरी को भारत में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है और देशभर में दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।
दूरदर्शन की शुरुआत: भारत में प्रसारण युग की नींव
इतिहास के पन्नों में 30 जनवरी 1964 एक और अहम पड़ाव के रूप में दर्ज है। इसी दिन भारत में दूरदर्शन के माध्यम से टेलीविजन के प्रयोगात्मक प्रसारण की शुरुआत हुई। आगे चलकर यही माध्यम सूचना, शिक्षा और जनजागरण का सबसे सशक्त साधन बना और भारतीय मीडिया परिदृश्य की रीढ़ साबित हुआ।
वैश्विक संदर्भ: कानून और मानवाधिकार
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी 30 जनवरी उल्लेखनीय रहा है। 2003 में बेल्जियम ने इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी, जिससे चिकित्सा नैतिकता और मानवाधिकारों पर वैश्विक बहस को नई दिशा मिली।
इतिहास से वर्तमान तक
30 जनवरी हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल सत्ता या भूगोल से नहीं बनता, बल्कि मूल्यों से बनता है। गांधी की शहादत आज के भारत के लिए भी एक प्रश्न छोड़ जाती है—क्या हम अपने सार्वजनिक जीवन में सत्य, सहिष्णुता और अहिंसा को जगह दे पा रहे हैं?
निष्कर्षतः, आज का दिन अतीत को स्मरण करने के साथ-साथ भविष्य के लिए नैतिक संकल्प लेने का अवसर है। यही 30 जनवरी का वास्तविक संदेश है—विचार अमर होते हैं, भले ही शरीर नश्वर हो।
Ankit Awasthi





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