
गणतंत्र दिवस के बाद ‘घुसपैठिया’ बयानबाज़ी तेज, असम से लेकर अन्य राज्यों तक बढ़ा राजनीतिक और सामाजिक तनाव
लखनऊ। देश में गणतंत्र दिवस के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी और साम्प्रदायिक तनाव को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा द्वारा 27 जनवरी को तिनसुकिया ज़िले के डिगबोई में दिए गए भाषण के बाद विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने तीखी आपत्ति जताई है। आरोप है कि मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में एक विशेष समुदाय के विरुद्ध भड़काऊ बयान दिए और उन्हें सामाजिक-आर्थिक रूप से परेशान करने की अपील की।
मुख्यमंत्री के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह मुद्दा और गर्मा गया, जब 30 जनवरी को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने असम में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राज्य में “अवैध घुसपैठियों” की संख्या लाखों में होने का दावा किया और तीसरी बार भाजपा सरकार बनने पर सभी अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की बात कही। उन्होंने कुछ जिलों में कथित रूप से घुसपैठियों के बहुसंख्यक होने का भी दावा किया।
हालांकि, नागरिकता के मुद्दे पर पहले हो चुकी एनआरसी प्रक्रिया का हवाला देते हुए कई विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन दावों पर सवाल उठाए हैं। 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित एनआरसी की अंतिम सूची में लगभग 19.06 लाख लोग बाहर रह गए थे, जिनमें बड़ी संख्या गैर-मुस्लिम और विभिन्न समुदायों से जुड़े लोगों की बताई जाती रही है। स्वयं असम के मुख्यमंत्री ने 2024 में दिए एक बयान में यह स्वीकार किया था कि एनआरसी से बाहर रह गए लोगों में बड़ी संख्या गैर-मुस्लिमों की हो सकती है।
इसी बीच देश के अन्य हिस्सों से भी साम्प्रदायिक तनाव से जुड़ी घटनाएँ सामने आई हैं। उत्तराखंड के कोटद्वार, हिमाचल प्रदेश के नूरपुर और छत्तीसगढ़ के गरियाबंद ज़िले में अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े लोगों के साथ कथित दुर्व्यवहार और हिंसा की घटनाओं के वीडियो और रिपोर्ट्स सामने आई हैं। इन मामलों में पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक रवैये को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों को देखते हुए ‘घुसपैठिया’ और पहचान से जुड़े मुद्दों को चुनावी विमर्श के केंद्र में लाया जा रहा है। वहीं, विपक्ष का आरोप है कि इससे सामाजिक सौहार्द, संविधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुँच रहा है।
घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब देश में 26 जनवरी, 15 अगस्त और 2 अक्टूबर जैसे राष्ट्रीय दिवसों को आमतौर पर एकता और संविधान के मूल्यों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। मौजूदा हालात को लेकर नागरिक संगठनों ने शांति, कानून के शासन और संविधान की रक्षा की अपील की है।





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