गणेश चतुर्थी पर ऐसे करें गणपति की उपासना, जानें मूर्ति स्थापना से विसर्जन तक की विधि

लखनऊ। गणेश चतुर्थी सनातन परंपरा में भगवान श्री गणेश की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। सनातन संस्था द्वारा संकलित धार्मिक आलेख के अनुसार, गणेश चतुर्थी के अवसर पर श्री गणेश की उपासना करने से भक्त को गणेशतत्त्व का विशेष लाभ प्राप्त होने की मान्यता है। सुखकर्ता और विघ्नहर्ता भगवान गणेश की भावपूर्ण पूजा कर श्रद्धालु सुख-समृद्धि और विघ्नों के निवारण की प्रार्थना करते हैं।
सिद्धिविनायक व्रत का विशेष महत्व
गणेश चतुर्थी के व्रत को ‘सिद्धिविनायक व्रत’ भी कहा जाता है। संस्था के अनुसार, यह व्रत प्रत्येक परिवार में किया जाना चाहिए। यदि एक ही परिवार में भाई संयुक्त रूप से रहते हैं और उनका धन-कोष तथा रसोई साझा है, तो एक गणेशमूर्ति की स्थापना पर्याप्त मानी जाती है। वहीं अलग-अलग रसोई और आर्थिक व्यवस्था होने पर प्रत्येक घर में अलग गणेशमूर्ति स्थापित करने की परंपरा बताई गई है।
हर वर्ष नई गणेशमूर्ति स्थापित करने की मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, घर में पहले से गणपति की मूर्ति होने के बावजूद गणेश चतुर्थी के लिए नई मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। सनातन संस्था के अनुसार, चतुर्थी के दौरान गणेशतत्त्व की तरंगों के अधिक सक्रिय रहने की मान्यता है। इसलिए उत्सव के लिए स्थापित की गई मूर्ति का पूजा-अनुष्ठान के बाद विसर्जन किया जाता है।

कैसी होनी चाहिए गणेशमूर्ति?
गणेशमूर्ति के चयन को लेकर भी शास्त्रसम्मत परंपराओं का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार मूर्ति चिकनी मिट्टी से बनी, लगभग एक से डेढ़ फुट ऊंची, पीढ़े पर विराजमान और बाईं ओर सूंड वाली होनी चाहिए। मूर्ति को प्राकृतिक रंगों से रंगा जाना उचित बताया गया है।
संस्था के अनुसार प्लास्टर ऑफ पेरिस अथवा कागज से बनी मूर्तियों को शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता। साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी मिट्टी की मूर्ति को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
स्थापना और पूजा की परंपरा
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मिट्टी की गणेशमूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कर पूजा करने और उसी दिन विसर्जन करने की शास्त्रविधि का उल्लेख किया गया है। हालांकि समय के साथ गणेशोत्सव को डेढ़, पांच, सात अथवा दस दिनों तक मनाने की परंपरा भी विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित हुई है।
परंपरा के अनुसार गणपति विसर्जन पहले, दूसरे, तीसरे, छठे, सातवें अथवा दसवें दिन किया जाता है। परिवार में जिस अवधि तक गणपति को विराजमान रखने की परंपरा हो, उसके अनुसार उत्सव मनाया जा सकता है।
गणेशमूर्ति की स्थापना के लिए पूजा की चौकी पर चावल रखकर उसके ऊपर मूर्ति स्थापित करने की परंपरा बताई गई है। मान्यता है कि विधिपूर्वक पूजा-अर्चना के बाद मूर्ति तथा उसके नीचे रखे चावल चैतन्य से परिपूर्ण हो जाते हैं। इन चावलों को वर्षभर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी बताई गई है।
गणपति को घर लाने की विधि
धार्मिक परंपरा के अनुसार गणेशमूर्ति को स्थापना से एक दिन पहले घर लाना शुभ माना जाता है। मूर्ति को स्वच्छ वस्त्र से ढककर श्रद्धापूर्वक घर लाया जाता है। इस दौरान ‘गणपति बाप्पा मोरया’ का जयघोष और नामजप करने की परंपरा है।
घर पहुंचने पर आरती के बाद गणेशमूर्ति को सजाए गए मंडप में पूजा की चौकी पर अक्षत के ऊपर स्थापित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मूर्ति की स्थापना और दिशा का भी विशेष महत्व है। मूर्ति का मुख पश्चिम दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ माना गया है। गणेशमूर्ति का मुख दक्षिण दिशा की ओर न रखने की परंपरा भी बताई गई है।
सुबह-शाम करें पंचोपचार पूजा
गणपति के घर में विराजमान रहने तक प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल पंचोपचार पूजन करने की परंपरा है। इसके बाद आरती और मंत्रपुष्प का पाठ किया जाता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार भगवान गणेश को दूर्वा, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करते हैं।
विसर्जन से पहले होती है उत्तरपूजा
गणेशमूर्ति के विसर्जन से पहले उत्तरपूजा की जाती है। इसमें आचमन और संकल्प के बाद चंदन, अक्षत, पुष्प, हल्दी-कुंकुम, दूर्वा, धूप-दीप तथा नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद आरती और मंत्रपुष्पांजलि कर गणेशमूर्ति को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।
श्रद्धा के साथ करें गणपति विसर्जन
गणेशमूर्ति के विसर्जन के समय दही, पोहे, नारियल और मोदक आदि अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख किया गया है। विसर्जन स्थल पर आरती करने के बाद श्रद्धापूर्वक गणेशमूर्ति का विसर्जन किया जाता है।
गणेश चतुर्थी केवल उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि भगवान श्री गणेश की उपासना, श्रद्धा और भक्तिभाव को बढ़ाने का अवसर भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शास्त्रसम्मत विधि से की गई गणपति आराधना से विघ्न दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। श्रद्धालु भगवान श्री गणेश से परिवार और समाज के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
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