8 महीनों में 22 दोषियों को फांसी की सजा सुनाने वाले जज रवि कुमार दिवाकर से वापस ली गईं 97 फाइलें, गनर हटाने पर उठ चुके हैं सवाल
मुजफ्फरनगर। वाराणसी के चर्चित ज्ञानवापी प्रकरण का सर्वे आदेश देकर देशभर में सुर्खियों में आए और हाल के महीनों में सख्त फैसलों के लिए जाने जाने वाले अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3) रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर चर्चा में हैं। जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार सिंह के आदेश पर न्यायाधीश दिवाकर की अदालत से हत्या और अन्य जघन्य अपराधों से जुड़ी कुल 97 लंबित फाइलों को वापस मंगवा लिया गया है।
मंगलवार को जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, इन सभी लंबित मुकदमों की फाइलों को कानून के तहत त्वरित व उचित निस्तारण के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मुजफ्फरनगर की मुख्य अदालत में वापस ट्रांसफर किया गया है।
सख्त फैसलों से बटोरी थीं सुर्खियां: मुजफ्फरनगर में बीते 8 महीनों के कार्यकाल में न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने हत्या, लूट और जघन्य अपराध से जुड़ी 10 बड़ी फाइलों में सुनवाई करते हुए 22 दोषियों को मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई है। इससे पहले बरेली तैनाती के दौरान भी उन्होंने 13 दोषियों को फांसी की सजा दी थी।
सुरक्षा व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल: ज्ञानवापी मामले के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय और देश-विरोधी असामाजिक तत्वों से मिल रही धमकियों के बीच न्यायाधीश दिवाकर ने अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। उन्होंने यूपी के पुलिस महानिदेशक (DGP) को कड़ा पत्र लिखकर आरोप लगाया कि शासन व हाईकोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद उनकी सहमति और बिना पूर्व सूचना के उनके व्यक्तिगत गनर (कांस्टेबल रविंद्र सिंह ठकुरैला) को हटा दिया गया।
बिना सूचना गनर बदलने का विरोध: न्यायाधीश का कहना है कि जब सुरक्षा व्यवस्था व्यक्तिगत तौर पर उनकी संवेदनशीलता को देखते हुए तय की गई है, तो उन्हें अंधेरे में रखकर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती में मनमाना फेरबदल करना उनकी और उनके परिवार की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।
एक तरफ जहां जज द्वारा गनर हटाए जाने के मुद्दे पर शासन और पुलिस महकमे को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी, वहीं दूसरी तरफ उनकी अदालत से 97 गंभीर आपराधिक मुकदमों की फाइलों को जिला जज द्वारा वापस मंगाए जाने के बाद प्रशासनिक और न्यायिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
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