मेरठ में तत्कालीन SSP और SOG पर बर्बर यातना का आरोप, पुलिस बोली- 'स्कूटी से गिरकर हुए चोटिल'
मेरठ। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में पुलिस महकमे और किसान नेताओं के बीच भारी तनाव का माहौल बन गया है। किसान नेताओं का दावा है कि मेरठ के तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय ने दलित नेता मोहित जाटव और गुर्जर नेता दिग्विजय भाटी को अपने कार्यालय बुलाकर चैंबर का दरवाजा बंद किया और करीब डेढ़ घंटे तक खुद लातों, घूंसों तथा जूतों से मारपीट की।
किसान नेताओं का आरोप है कि इतने पर भी अत्याचार नहीं रुका। इसके बाद दोनों नेताओं को जिले की SOG (स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) के हवाले कर दिया गया, जहां इंस्पेक्टर अखिलेश गौड़ ने कथित तौर पर उनके पैर बंधवाकर उल्टा लटकवाया और तलवों, कमर तथा पीठ पर लाठियों व फट्टों से पिटाई की। पीड़ितों ने आरोप लगाया है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ आतंकियों जैसा सलूक किया गया। सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में दिग्विजय भाटी की आँख पर गंभीर सूजन और शरीर पर चोटों के निशान साफ़ दिखाई दे रहे हैं।
इस मामले के तूल पकड़ने के बाद तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय को मेरठ से हटाकर डीजीपी मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया है।
मेरठ पुलिस का आधिकारिक रुख
इन संगीन आरोपों के बीच मेरठ पुलिस (@meerutpolice) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर आधिकारिक बयान जारी कर सभी आरोपों को खारिज कर दिया है।
मेरठ पुलिस का बयान:
अवगत कराना है कि दिग्विजय सिंह भाटी पुत्र रघुराज सिंह (निवासी ग्राम व पोस्ट चमरौआ, थाना नखासा, जनपद सम्भल) तथा मोहित जाटव पुत्र सुरेश सिंह (निवासी ग्राम किनानगर, थाना भावनपुर, जनपद मेरठ) के विरुद्ध पूर्व से कई अभियोग पंजीकृत हैं तथा दोनों अपने-अपने थानों के हिस्ट्रीशीटर हैं।
दिनांक 19.08.2026 को दोनों व्यक्ति थाना सिविल लाइन्स पर अपने विरुद्ध पंजीकृत मु०अ०सं०-173/2026 के संबंध में पुलिस कार्यालय में वार्ता करने आए थे। वापस घर जाते समय स्कूटी फिसलने से दोनों गिरकर चोटिल हो गए थे। इस संबंध में दिग्विजय सिंह एवं मोहित जाटव द्वारा स्वयं थाना सिविल लाइन्स पर लिखित प्रार्थना-पत्र दिया गया था, जिसका उल्लेख जीडी सं०-53, समय 17:31 बजे पर अंकित है।
अतः दिग्विजय सिंह भाटी द्वारा वीडियो के माध्यम से लगाए जा रहे आरोप तथ्यहीन, असत्य एवं निराधार हैं।
उठते गंभीर सवाल
पुलिस के 'स्कूटी हादसे' वाले दावे के बावजूद किसान संगठन और पीड़ित पक्ष लगातार सवाल उठा रहे हैं:
क्या पुलिस कार्यालय और SOG परिसर के CCTV फुटेज सार्वजनिक किए जाएंगे?
दोनों नेताओं का निष्पक्ष मेडिकल परीक्षण कब और किस अस्पताल में कराया जाएगा?
क्या उच्चस्तरीय जांच कराकर मामले की सच्चाई सामने लाई जाएगी?
फिलहाल पुलिस और किसान नेताओं के दावों के बीच यह मामला हिरासत में यातना और अधिकारों के उल्लंघन का एक बड़ा मुद्दा बन गया है।
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