
कमलेश्वर: विचार, संवेदना और सवालों का लेखक
हिंदी साहित्य में कमलेश्वर का नाम आते ही एक ऐसे लेखक की छवि उभरती है, जिसने शब्दों को सिर्फ सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि समाज से सवाल पूछने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया। आज उन्हें याद करना दरअसल उस वैचारिक परंपरा को याद करना है, जो साहित्य को जीवन से जोड़ती है।
कमलेश्वर का जन्म 6 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में हुआ। उनका लेखन उस दौर में सामने आया जब देश आज़ादी के बाद नई पहचान गढ़ रहा था और समाज भीतर ही भीतर कई टूटनों से गुजर रहा था। यही टूटन, यही बेचैनी उनकी कहानियों और उपन्यासों की मूल भूमि बनी। वे ‘नयी कहानी आंदोलन’ के उन प्रमुख स्तंभों में रहे, जिन्होंने हिंदी कथा साहित्य को रोमांटिक कल्पनाओं से निकालकर आम आदमी की वास्तविक ज़िंदगी से जोड़ा।
कमलेश्वर की रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवेदनशील दृष्टि है। उनके पात्र नायक नहीं होते, वे हमारे आसपास के लोग होते हैं—संशय में घिरे, डरते हुए, समझौता करते हुए, लेकिन भीतर कहीं सवाल लिए हुए। उनकी कहानियों में रिश्तों की दरार, सत्ता की चालाकी और आदमी की मजबूरी बहुत सहज भाषा में सामने आती है।
उनका चर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ सिर्फ विभाजन की कहानी नहीं है, बल्कि यह धर्म, राजनीति और इतिहास के नाम पर इंसान को बांटने की मानसिकता पर तीखा प्रहार है। यह कृति बताती है कि सरहदें बदलने से सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि कई बार और गहरे हो जाते हैं। यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था।
कहानियों के साथ-साथ कमलेश्वर ने पत्रकारिता, संपादन और फिल्म लेखन में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने साहित्य को सीमित दायरे में कैद नहीं रखा, बल्कि सिनेमा और टेलीविजन के माध्यम से उसे जन–जन तक पहुंचाया। उनकी लेखनी में संवाद की ताकत थी—सीधी, असरदार और सोचने पर मजबूर करने वाली।
कमलेश्वर का लेखन किसी एक विचारधारा का प्रचार नहीं करता, बल्कि पाठक को खुद सोचने की आज़ादी देता है। शायद यही वजह है कि वे सत्ता के भी प्रिय नहीं रहे और विरोध से भी नहीं डरे। उन्होंने लिखा, क्योंकि लिखना उनके लिए ज़रूरी था—समय को समझने और समझाने के लिए।
27 जनवरी 2007 को उनके निधन के साथ एक लेखक भले चला गया हो, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी जीवित हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य का काम मनोरंजन भर नहीं, बल्कि समाज के आईने में सच दिखाना भी है। कमलेश्वर इसी सच के लेखक थे—और रहेंगे।
Ankit Awasthi





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