
कहानी - नीली चप्पल
बरसात गए अभी दो ही महीने हुए थे, मगर नाले के किनारे की मिट्टी अब भी जगह-जगह गीली पड़ी रहती थी। उसी नाले के पास, बिजली के खंभे के नीचे, नीले तिरपाल और टेढ़ी टीन की छत वाली एक झोपड़ी थी। हवा चलती तो टीन “ठक-ठक” बजती, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सूखी खांसी खांस रहा हो।
वहीं शबाना रहती थी।
सुबह फजिर की अजान के पहले ही उसकी आंख खुल जाती। सबसे पहले वह मिट्टी के चूल्हे में पिछली रात की बची राख कुरेदती, फिर दो-तीन लकड़ियां डालकर आग सुलगाती। धुएं से पूरी झोपड़ी भर जाती। बच्चे खांसने लगते।
“अम्मी… आंख जल रही…”
सबसे छोटा फैजान आंख मलते हुए कहता।
शबाना हंस पड़ती —
“चल हट, बड़ा नवाब पैदा हुआ है।”
उसकी हंसी में भी थकान रहती थी।
सलीम तब तक बाहर खाट पर बैठकर बीड़ी सुलगा चुका होता। उसका रंग इतना सांवला था कि सुबह के अंधेरे में बस बीड़ी का लाल सिरा ही चमकता दिखता।
सड़क किनारे उसकी पंचर की छोटी-सी दुकान थी। दुकान क्या, बस फटी हुई टायरों की ढेरी, एक लोहे की बाल्टी, हवा भरने की मशीन और पुरानी रबर के टुकड़े। सुबह-सुबह साइकिल वाले, रिक्शेवाले, दूधवाले वहीं रुकते।
सलीम हर आदमी से ऐसे बात करता जैसे बरसों का जानकार हो।
गरीब आदमी का यही धन होता है — बोलचाल।
शबाना दो सूखी रोटियां कपड़े में बांधती, बच्चों के सिर पर हाथ फेरती और काम पर निकल जाती।
पहले वह साहब लोगों के कुत्ते घुमाती। बड़े-बड़े रोएंदार कुत्ते — कोई अंग्रेजी नाम वाला, कोई छोटे बछड़े जितना बड़ा। उन कुत्तों के गले में चमड़े के पट्टे चमकते रहते।
एक दिन उसने मजाक में सलीम से कहा था —
“इन कुत्तों का साबुन हमारे बच्चों से अच्छा है।”
सलीम हंसा था —
“तो किसी दिन हमें भी नहला देना उसी साबुन से।”
दोनों देर तक हंसते रहे थे।
गरीबी में हंसी भी बड़ी सस्ती चीज होती है, बिना वजह आ जाती है।
कुत्ते टहलाने के बाद शबाना बर्तन मांजने जाती।
ठंडे पानी में हाथ डुबो-डुबोकर उसकी उंगलियां सफेद पड़ जातीं। कई घरों में उसे अलग गिलास में पानी दिया जाता। कहीं-कहीं लोग उसका नाम भी ठीक से नहीं लेते।
“ए बर्तन वाली…”
मगर वह सब सुनकर भी चुप रहती।
गरीबी आदमी को सबसे पहले जवाब देना भूलना सिखाती है।
दोपहर तक लौटते-लौटते उसका दुपट्टा पसीने और धूल से भर जाता। रास्ते में वह सब्जी मंडी के पीछे बैठी बूढ़ी औरत से आधे दाम में मुरझाई सब्जियां खरीदती।
झोपड़ी में चार बच्चे थे।
तीन बड़े और सबसे छोटा फैजान।
फैजान बड़ा चंचल था।
नाक हमेशा बहती रहती। पैर में कभी चप्पल रहती, कभी नहीं। पूरे दिन सड़क पर भागता रहता। कभी पतंग के पीछे, कभी पिल्लों के पीछे।
उसे गाड़ियों से बड़ा शौक था।
जब कोई बड़ी चमचमाती कार गुजरती तो आंखें फाड़कर देखता।
“अम्मी, हम भी लेंगे ऐसी?”
शबाना हंस देती —
“हां, पहले तू पढ़-लिख ले।”
हालांकि उसे खुद मालूम था कि वह सपना कितना दूर है।
उस शाम हवा बहुत गर्म थी। सड़क से धूल उड़ रही थी। दूर कहीं शादी वाले पंडाल में लाउडस्पीकर बज रहा था।
सलीम एक बाइक का पंचर जोड़ रहा था। माथे से पसीना टपककर आंखों में जा रहा था।
शबाना पास के बंगले से लौट रही थी। हाथ में बची हुई दो रोटियां और थोड़ी सब्जी थी जो मालकिन ने दया में दे दी थी।
फैजान सड़क किनारे प्लास्टिक के टूटे पहिए को डंडे से घुमाते हुए भाग रहा था। वह इतनी जोर से हंस रहा था कि उसकी हंसी ट्रकों के शोर में भी सुनाई दे रही थी।
तभी मोड़ से सफेद कार तेजी से आई।
एक पल।
बस एक पल।
पहिया दूर लुढ़कता चला गया।
फैजान सड़क पर पड़ा था। उसकी छोटी नीली चप्पल हवा में उछलकर नाले के पास जा गिरी।
भीड़ जुट गई।
किसी ने कहा — “अरे उठाओ!”
किसी ने ड्राइवर को गाली दी।
किसी ने मोबाइल निकाल लिया।
लेकिन शबाना जैसे पत्थर हो गई थी।
वह दौड़ती हुई आई, घुटनों के बल बैठी और बच्चे को गोद में उठा लिया।
“फैजू… ओ फैजू…”
उसकी आवाज ऐसी थी कि पास बैठे आवारा कुत्ते तक सिहर गए।
सलीम वहीं सड़क पर बैठ गया। उसके हाथ अब भी काले गोंद से सने थे। वह बार-बार अपने हाथ देख रहा था, जैसे सोच रहा हो कि इन हाथों से दुनिया भर के पंचर जोड़ लिए, मगर अपनी जिंदगी का यह छेद नहीं भर पाया।
उस रात झोपड़ी में चूल्हा नहीं जला।
फैजान की नीली चप्पल दरवाजे पर पड़ी रही।
दिन बीतने लगे, मगर शबाना की आंखों के नीचे काले गड्ढे बढ़ते गए। वह काम पर जाती तो अचानक किसी बच्चे की आवाज सुनकर ठिठक जाती। कुत्ते घुमाते वक्त सड़क को घूरती रहती।
अब वह हंसती नहीं थी।
कई बार रात को उठकर बाहर बैठ जाती। दूर सड़क पर भागती गाड़ियों की रोशनी को देर तक देखती रहती।
एक रात उसने सलीम से पूछा —
“इतनी जल्दी क्यों भागती हैं गाड़ियां?”
सलीम के पास जवाब नहीं था।
धीरे-धीरे शबाना ने खाना छोड़ दिया। शरीर सूखकर कांटा हो गया।
बरसात की पहली रात थी। टीन की छत पर बूंदें पड़ रही थीं। बाकी बच्चे सो चुके थे।
शबाना ने फैजान की वही नीली चप्पल सीने से लगाई और बहुत देर तक उसे सहलाती रही।
सुबह जब सलीम उठा तो उसने देखा —
शबाना बिल्कुल शांत पड़ी थी।
ऐसी शांति, जो सिर्फ मर जाने के बाद आती है।
बाहर सड़क पर फिर वही शोर था।
दूधवाले जा रहे थे। बसें भाग रही थीं। लोग दफ्तर पहुंचने की जल्दी में थे।
दुनिया चल रही थी।
बस नाले किनारे वाली उस झोपड़ी में अब चूल्हे का धुआं नहीं उठता था।
अंकित अवस्थी





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