
आओ विकास करें : ग्रामीण पलायन का बहुआयामी प्रभाव
देश में हर दूसरा ग्रामीण काम धंधे के कारण अपने गांव से दूर रहने को विवश है यह राष्ट्रीय सर्वेक्षण का निष्कर्ष केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि भारत के सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक ताने बाने में आ रहे गहरे परिवर्तन का द्योतक है। जब 55.50 प्रतिशत ग्रामीणों के पास अपने गांव में आजीविका का साधन नहीं है और 41.74 प्रतिशत लोग दिनभर में दो सौ रुपये से भी कम कमा पाते हैं तो यह स्थिति केवल गरीबी का प्रश्न नहीं रह जाती। यह राष्ट्रीय चरित्र अंतरराष्ट्रीय साख नैतिक दायित्व कूटनीतिक क्षमता और संवैधानिक मूल्यों की कसौटी बन जाती है। सर्वेक्षण के अनुसार 26 राज्यों के 213 जिलों की 400 ग्राम पंचायतों में 7,790 लोगों से बात कर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि रोजगार के अभाव में पलायन एक विवशता है स्वेच्छा नहीं। इस विवशता के प्रभाव अत्यंत व्यापक और दूरगामी हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर यह पलायन खाद्य सुरक्षा को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। जब 9.93 प्रतिशत लोग ही खेती से आय प्राप्त कर रहे हैं और युवा वर्ग 15 से 24 वर्ष की आयु के 18 से 28 प्रतिशत लोग गांव छोड़ चुके हैं तो कृषि उत्पादन पर संकट स्वाभाविक है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषक का खेत से विमुख होना राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के लिए खतरे की घंटी है। यह स्थिति जनसांख्यिकीय असंतुलन को जन्म देती है। शहरों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता है जिससे शहरी अवसंरचना आवास जल मल निकासी और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा जाती हैं। गांव वीरान होते हैं और शहर झुग्गियों में बदलते हैं। यह राष्ट्रीय विकास के संतुलित मॉडल के विरुद्ध है और क्षेत्रीय असमानता को गहराता है। राष्ट्रीय एकता के सूत्र भी कमजोर पड़ते हैं जब एक बड़ा वर्ग अपने मूल से कटकर महानगरों में पहचान के संकट से जूझता है।
अंतरराष्ट्रीय पटल पर यह आँकड़ा भारत की विकास गाथा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन गुणवत्तापूर्ण रोजगार और असमानता में कमी प्रमुख लक्ष्य हैं। जब देश की आधी से अधिक ग्रामीण आबादी जीविका के लिए प्रवास को मजबूर है तो वैश्विक मंचों पर भारत की छवि प्रभावित होती है। जी20 जैसे समूहों में जब भारत विश्वगुरु और आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करता है तो ऐसी आंतरिक विसंगतियां उसकी नैतिक शक्ति को क्षीण करती हैं। विदेशी निवेशक भी किसी देश में सामाजिक स्थिरता और ग्रामीण समृद्धि को देखकर ही दीर्घकालिक निवेश का निर्णय लेते हैं। श्रमिकों का बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र में कम मजदूरी पर कार्य करना अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के अनुरूप नहीं है जिससे व्यापारिक समझौतों में भारत की सौदेबाजी क्षमता प्रभावित हो सकती है।
नैतिक दृष्टिकोण से यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी जहाँ गाँव आत्मनिर्भर इकाई हों। आज जब गांव रोजगार देने में असमर्थ हैं तो यह गांधीवादी दर्शन का पराभव है। अंत्योदय का सिद्धांत कहता है कि विकास की किरण अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। परन्तु जब 55.50 प्रतिशत लोग अपने घर से दूर हैं और 41.74 प्रतिशत दो सौ रुपये से कम में दिन काट रहे हैं तो स्पष्ट है कि अंतिम जन तक विकास नहीं पहुँचा। यह समाज के सामूहिक विवेक पर प्रश्न है कि हमने ऐसी व्यवस्था क्यों बनाई जहाँ अन्नदाता को ही अन्न के लिए भटकना पड़े। यह नैतिक पतन का संकेत है कि हम नागरिक को उसके जन्मस्थान पर सम्मानजनक जीवन नहीं दे पा रहे।
कूटनीतिक क्षेत्र में ग्रामीण संकट की अनुगूँज सुनाई देती है। प्रवासी श्रमिकों की समस्या केवल घरेलू नहीं है। खाड़ी देशों में भारतीय श्रमिकों की स्थिति को लेकर भारत सरकार सदैव संवेदनशील रहती है। यदि अपने ही देश में श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी तो विदेशों में उनके अधिकारों के लिए तर्कपूर्ण ढंग से पक्ष रखना कठिन होगा। सॉफ्ट पावर के रूप में भारत की ग्रामीण संस्कृति लोक कलाएँ और ज्ञान परंपराएँ विश्व में प्रसिद्ध हैं। परन्तु जब गांव उजड़ेंगे तो यह सांस्कृतिक कूटनीति का आधार ही समाप्त हो जाएगा। योग आयुर्वेद और ग्राम आधारित कुटीर उद्योगों की ब्रांडिंग तभी सार्थक है जब गांव जीवित हों।
सामाजिक ताना बाना इस पलायन से सबसे अधिक टूटता है। परिवार विखंडित होते हैं। पुरुष शहरों में चले जाते हैं और महिलाएं बच्चों व वृद्धों के साथ गांव में अकेली रह जाती हैं। इससे महिलाओं पर कृषि और घर दोनों का भार आता है जिसे नारीकरण कृषि कहते हैं। बच्चों की शिक्षा बाधित होती है क्योंकि पिता की अनुपस्थिति और माता की व्यस्तता में संरक्षण कम हो जाता है। वृद्धजन अकेलेपन और देखभाल के अभाव से ग्रस्त होते हैं। सामाजिक सुरक्षा का पारंपरिक तंत्र जो संयुक्त परिवार और ग्राम समुदाय पर आधारित था वह बिखर रहा है। दिहाड़ी मजदूर और वंचित समुदायों पर किया गया यह सर्वे दर्शाता है कि सामाजिक न्याय का लक्ष्य अभी दूर है। जातिगत और क्षेत्रीय विषमता और गहरी होती है जब संसाधन विहीन वर्ग ही पलायन को मजबूर होता है।
आर्थिक प्रभाव स्पष्ट हैं। लुईस का द्वैध अर्थव्यवस्था मॉडल कहता है कि अतिरिक्त ग्रामीण श्रमिक शहरी औद्योगिक क्षेत्र में खप जाते हैं। परन्तु भारत में शहरी क्षेत्र उतने रोजगार पैदा नहीं कर पा रहा जितने प्रवासी आ रहे हैं। परिणामस्वरूप शहरी बेरोजगारी और छद्म बेरोजगारी बढ़ती है। श्रम की आपूर्ति अधिक होने से मजदूरी दरें नीचे रहती हैं जैसा आँकड़ा बताता है कि 41.74 प्रतिशत लोग दो सौ से कम कमाते हैं। यह न्यूनतम मजदूरी कानून के क्रियान्वयन पर भी प्रश्न है। गांवों में क्रय शक्ति घटने से ग्रामीण बाजार सिकुड़ते हैं जिससे समग्र मांग प्रभावित होती है। प्रेषण अर्थव्यवस्था यानी शहरों से गांव भेजा गया पैसा कुछ राहत देता है परन्तु यह स्थानीय उत्पादन का विकल्प नहीं है। दीर्घकाल में यह मानव पूंजी का ह्रास है क्योंकि सबसे ऊर्जावान युवा वर्ग गांव छोड़ रहा है।
वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से यह पलायन जलवायु परिवर्तन और संसाधन वितरण से जुड़ा है। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर गिरने अनियमित वर्षा और भूमि की उर्वरता घटने से खेती अलाभकारी हुई है। यह पर्यावरणीय पलायन का रूप ले रहा है। भौगोलिक रूप से कुछ राज्य जैसे बिहार उत्तर प्रदेश ओडिशा पलायन के स्रोत हैं और महाराष्ट्र दिल्ली गुजरात गंतव्य हैं। इससे संसाधनों पर क्षेत्रीय दबाव बढ़ता है। गांवों के खाली होने से जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान का भी लोप हो रहा है। वैज्ञानिक शोध के लिए ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन आवश्यक है जो जनशून्य होते गांवों में संभव नहीं होगा।
मनोवैज्ञानिक प्रभाव गहरे हैं। अपनी मिट्टी से उजड़ने का दुख पहचान का संकट और शहरी एकाकीपन प्रवासी श्रमिकों में अवसाद चिंता और तनाव को जन्म देता है। कोविड काल में हमने यह देखा कि अनिश्चितता में श्रमिक हजारों किलोमीटर पैदल चलने को विवश हुआ। यह सामूहिक मानसिक आघात था। बच्चों में असुरक्षा की भावना घर करती है। गांव में बचे लोगों में भी परित्यक्त होने का भाव आता है। यह राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य पर बोझ है।
धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष पर भी प्रभाव पड़ता है। भारत में ग्राम देवता लोक परंपराएँ मेले त्योहार सामुदायिक जीवन के केंद्र थे। पलायन से ये परंपराएँ क्षीण हो रही हैं। जब समुदाय ही नहीं बचेगा तो सामूहिक पूजा और संस्कार कौन करेगा। आध्यात्मिक दृष्टि से उपनिषदों ने ग्राम्य जीवन को शांति का स्रोत माना है। भागदौड़ भरा शहरी जीवन व्यक्ति को उसके आंतरिक स्व से दूर करता है। मंदिर वीरान होना केवल ईंट पत्थर का प्रश्न नहीं बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता का टूटना है।
संवैधानिक दृष्टि से यह अनुच्छेद 19 जो आवागमन की स्वतंत्रता देता है और अनुच्छेद 21 जो जीवन के अधिकार की बात करता है उनके बीच द्वंद्व को दर्शाता है। पलायन एक अधिकार है परन्तु विवशता में किया गया पलायन क्या सचमुच स्वतंत्रता है। राज्य के नीति निदेशक तत्व अनुच्छेद 39 में कहते हैं कि जीविका के पर्याप्त साधन सभी नागरिकों को मिलें। अनुच्छेद 43 ग्राम पंचायतों को कुटीर उद्योगों के विकास का दायित्व देता है। ये सर्वेक्षण दर्शाता है कि इन संवैधानिक वादों और जमीनी हकीकत में अंतर है। मनरेगा जैसी योजनाओं का 5.54 प्रतिशत लोगों तक ही पहुँचना कार्यान्वयन की खामियों को उजागर करता है।
अंततः अंतिम जन पर इसका सर्वाधिक प्रभाव है। दिहाड़ी श्रमिक भूमिहीन मजदूर वंचित समुदाय ही सबसे पहले और सबसे अधिक पलायन करते हैं। उनके पास न खेत है न कौशल न पूंजी। उनके लिए शहर भी स्वागत योग्य नहीं। वे फुटपाथ पर सोते हैं ठेकेदार के शोषण के शिकार होते हैं और किसी भी आपदा में सबसे पहले प्रभावित होते हैं। अंत्योदय का स्वप्न तब तक अधूरा है जब तक गांव में ही सम्मानजनक काम न मिले। यह सर्वेक्षण चेतावनी है कि यदि हमने ग्राम को केंद्र में रखकर नीतियां नहीं बनाई तो विकास का महल रेत पर खड़ा होगा। गांव का उजड़ना केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं बल्कि सभ्यता के एक स्रोत का सूखना है। इस पर तत्काल नीतिगत कृषि आधारित उद्योग कौशल विकास स्थानीय बाजार और सामाजिक सुरक्षा के ठोस कदम अनिवार्य हैं अन्यथा यह संकट राष्ट्रीय चरित्र को दीर्घकालिक क्षति पहुँचाएगा।





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