बीजेपी का डिजिटल वॉर रूम अब बदलेगा अंदाज, म्हस्के के साथ Gen-Z पर फोकस, मालवीय मॉडल से आगे बढ़ने की तैयारी

संतोष कुमार सिंह/अनूप कुमार शर्मा
लखनऊ/वाराणसी । भारतीय जनता पार्टी ने अपनी डिजिटल टीम में बड़ा बदलाव किया है, लेकिन इसे केवल चेहरे बदलने की कवायद मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। अमित मालवीय के लंबे कार्यकाल के बाद दीपक म्हस्के को सोशल मीडिया की कमान सौंपना बीजेपी के डिजिटल संचार में अगली पीढ़ी के प्लेटफॉर्म और कंटेंट मॉडल की ओर बढ़ने का संकेत देता है। नई टीम के सामने चुनौती सिर्फ पार्टी का संदेश सोशल मीडिया तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि उस युवा दर्शक तक पहुंचने की है जो पारंपरिक राजनीतिक कंटेंट से ज्यादा रील, शॉर्ट वीडियो और तेज विजुअल नैरेटिव देखता है।
17 अगस्त को बीजेपी ने राष्ट्रीय संगठन में बदलाव करते हुए दीपक म्हस्के को सोशल मीडिया कन्वीनर बनाया। उनके साथ प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट और अरुण यादव को सोशल मीडिया को-कन्वीनर की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं अनिल बलूनी को पार्टी की मीडिया और कम्युनिकेशन रणनीति का जिम्मा सौंपा गया है।

मालवीय के दौर के बाद सबसे बड़ा सवाल—अब डिजिटल राजनीति का अगला फॉर्मूला क्या?
अमित मालवीय 2015 से बीजेपी के राष्ट्रीय आईटी सेल का चेहरा रहे हैं। उनके कार्यकाल में बीजेपी का डिजिटल नेटवर्क देश की सबसे चर्चित राजनीतिक सोशल मीडिया मशीनरियों में शामिल हुआ। नई व्यवस्था में मालवीय की जगह म्हस्के का आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी अब डिजिटल स्पेस को केवल ट्विटर/X पर राजनीतिक बहस और त्वरित प्रतिक्रिया के माध्यम के तौर पर नहीं देख रही।
म्हस्के ने पद संभालने के बाद खुद संकेत दिया है कि Instagram और Gen-Z तक पहुंच उनकी प्राथमिकताओं में रहेगी। शॉर्ट वीडियो और रील के जरिए सरकार की नीतियों और पार्टी के संदेश को युवा वर्ग तक पहुंचाने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है।
यानी बीजेपी का अगला डिजिटल प्रयोग मोटे तौर पर तीन स्तरों पर दिखाई दे सकता है—कौन सा कंटेंट बनाया जाए, किस प्लेटफॉर्म पर बनाया जाए और किस आयु वर्ग तक उसे पहुंचाया जाए।

X से Instagram तक, बदल रहा है बीजेपी का डिजिटल फोकस
राजनीतिक संचार का डिजिटल भूगोल तेजी से बदला है। एक समय X पर नेताओं की पोस्ट, हैशटैग और राजनीतिक जवाब सोशल मीडिया कैंपेन का मुख्य हथियार हुआ करते थे। लेकिन युवा मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अब Instagram Reels और दूसरे शॉर्ट-वीडियो फॉर्मेट पर ज्यादा समय बिताता है।
यही वजह है कि नई टीम में Gen-Z और शॉर्ट-फॉर्म वीडियो को प्राथमिकता देना महज तकनीकी बदलाव नहीं है। यह बीजेपी के संदेश को पेश करने के तरीके में बदलाव की कोशिश भी है।
म्हस्के ने कहा है कि पार्टी Gen-Z के लिए विशेष रणनीति तैयार करेगी और सही तथा सकारात्मक जानकारी इस वर्ग तक पहुंचाने पर जोर रहेगा।
डेटा से तय होगा किसे, क्या और कैसे दिखाना है
नई डिजिटल रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा डेटा है। चुनावी राजनीति में डेटा का इस्तेमाल नया नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के साथ उसका संयोजन लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
म्हस्के की पृष्ठभूमि भी इस लिहाज से दिलचस्प है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने पार्टी की आईटी और सोशल मीडिया गतिविधियों में करीब 15 साल काम किया है और बिहार, छत्तीसगढ़ तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के चुनावी डिजिटल अभियानों में भूमिका निभाई है।
इस अनुभव का इस्तेमाल अब राष्ट्रीय स्तर पर यह समझने में किया जा सकता है कि किस इलाके, आयु वर्ग और सामाजिक समूह के लिए किस तरह का राजनीतिक कंटेंट ज्यादा प्रभावी है।
सिर्फ प्रचार नहीं, ‘नैरेटिव’ का मुकाबला भी एजेंडे में
नई टीम के सामने तीसरी बड़ी चुनौती विपक्षी हमलों और गलत सूचनाओं का जवाब देना है। म्हस्के ने साफ कहा है कि पार्टी का फोकस विपक्ष की ओर से फैलाए जाने वाले कथित फेक नैरेटिव का मुकाबला करने पर रहेगा। उन्होंने AI के जरिए बनाए या बदले गए रील्स और कंटेंट को भी एक चुनौती के तौर पर रेखांकित किया है।
इसके अलावा उन्होंने विदेशी दुष्प्रचार और फर्जी खबरों का मुकाबला करने की प्राथमिकता भी बताई है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में बीजेपी की डिजिटल टीम के लिए कंटेंट बनाना जितना महत्वपूर्ण होगा, उतना ही महत्वपूर्ण कंटेंट की विश्वसनीयता जांचना, गलत सूचना का जवाब देना और तेजी से प्रतिक्रिया देना भी होगा।

जंतर-मंतर जैसे मौकों से पार्टी ने क्या सबक लिया?
आपके इनपुट में जंतर-मंतर के प्रदर्शन को लेकर पार्टी के डिजिटल रिस्पांस पर सवाल उठने और उससे संगठन में सबक लेने की बात कही गई है। इसे सीधे स्थापित तथ्य की तरह लिखने के बजाय इसे पार्टी के भीतर के रणनीतिक आकलन के रूप में रखना ज्यादा सुरक्षित और पत्रकारिता की दृष्टि से मजबूत होगा।
सोशल मीडिया की राजनीति में किसी घटना पर शुरुआती घंटों में पार्टी का नैरेटिव कमजोर रह जाना बाद में बड़े नुकसान में बदल सकता है। खासकर जब विपक्ष या विरोध प्रदर्शन से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हों।
नई व्यवस्था संभवतः इसी तरह की परिस्थितियों में तेज कंटेंट रिस्पांस, प्लेटफॉर्म-विशिष्ट संदेश और केंद्रीय तथा राज्य आईटी टीमों के बेहतर तालमेल पर जोर देगी।
केंद्रीय टीम के साथ राज्यों की IT सेल भी होंगी अहम
बीजेपी की डिजिटल ताकत केवल दिल्ली में बैठी राष्ट्रीय टीम से नहीं बनती। राज्यों की आईटी और सोशल मीडिया इकाइयां ही स्थानीय मुद्दों, भाषाई कंटेंट और क्षेत्रीय राजनीतिक माहौल को समझती हैं।
इसलिए नई रणनीति की असली परीक्षा तब होगी जब राष्ट्रीय टीम और राज्य इकाइयां एक ही मुद्दे पर स्थानीय भाषा और स्थानीय संदर्भ के साथ एकीकृत डिजिटल अभियान चलाएंगी।
यानी दिल्ली से तैयार संदेश को सीधे हर राज्य में कॉपी करने के बजाय उसके स्थानीय संस्करण तैयार करने की जरूरत होगी।
म्हस्के के सामने सबसे बड़ी चुनौती
म्हस्के को अब ऐसी डिजिटल मशीनरी तैयार करनी होगी जो एक साथ कई मोर्चों पर काम कर सके—Gen-Z तक पहुंच, Instagram और Reels पर पकड़, डेटा आधारित कंटेंट, फेक न्यूज का जवाब, AI-generated misinformation की पहचान और राज्यों की आईटी टीमों के साथ बेहतर समन्वय।
मालवीय के दौर में बीजेपी ने डिजिटल राजनीति को आक्रामक और संगठित रूप से इस्तेमाल करने की जो पहचान बनाई, उसके बाद म्हस्के के सामने चुनौती उस विरासत को खत्म करना नहीं बल्कि उसे नए प्लेटफॉर्म और नई पीढ़ी के हिसाब से अपग्रेड करना है।
इसलिए बीजेपी में हुआ यह बदलाव सिर्फ ‘मालवीय आउट, म्हस्के इन’ की कहानी नहीं है। असली कहानी यह है कि बीजेपी अब डिजिटल राजनीति के अगले चरण में रील, डेटा और Gen-Z नैरेटिव को कितना प्रभावी हथियार बना पाती है।
BJP की नई डिजिटल टीम
सोशल मीडिया कन्वीनर: दीपक म्हस्के
सोशल मीडिया को-कन्वीनर: प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट, अरुण यादव
मीडिया/कम्युनिकेशन रणनीति: अनिल बलूनी
मुख्य डिजिटल फोकस: Instagram, Reels और Gen-Z
रणनीतिक जोर: डेटा आधारित कंटेंट और प्लेटफॉर्म-विशिष्ट संदेश
चुनौती: फेक न्यूज, AI-generated misinformation और विरोधी नैरेटिव का जवाब
बड़ा लक्ष्य: राष्ट्रीय टीम और राज्यों की IT/Social Media इकाइयों के बीच बेहतर तालमेल
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