
रेत पे उठी प्यास सी - गंगा दशेहरा विशेष
कविता भी दुख से कई बार जन्म लेती है, हताशा से, ऐसे ही बेचैन मन को चैन देने के लिए आज कुछ पंक्तियां निकल आई, पढ़े और देखे कितनी मिलती है आम जन मानस से और उसके संघर्ष से क्योंकि कविता बोध कराती है।
शाम को बैठा जो घर से निकलने,
धूप लगी दरवाजे पे टहलने,
फिर कुछ आराम किया,
नदी से कुछ काम लिया।
नहाया, धोया, विश्राम किया,
सुख और दुख सब भिगोया,
गमछा ओढ़ कर आराम किया।
संघर्ष है दिन भी, संघर्ष है रात भी,
गरीब के जीवन में कहा रही है, अब आस भी।
महंगाई बनी है रोज़ की साथी,
जैसे बिन ब्याही बारात सी,
कमजोर इंसान के हौसले की दाद सी,
कौन जाने कब आये बरसात भी।
हवा भी हो चली है बदहवास सी।
अभी आएगी बरसात सी,
गड्ढों में पड़े विकास सी,
नर्म कलेजा रख कर कौन निकलता है घर से,
सबको ही है कुछ पाने की आस सी।
कई बार लगता है कुछ बचा लूं,
ये शब्द है कोई साँस नहीं।
मेरे घर के एक कोने में रहता हूं,
अब बूढ़े मां बाप भी नहीं रखते आस कोई।
तन्हाई से रोज होती है मुलाक़ात सी,
अपनी कहा हुई है जाने वाली सांस भी।
चलो एक दिन कुछ सपने बो ले,
कौन सा दिमाग में है कोई कपास ही।
छोटे शहरों में रहते है सपने भी छोटे से,
उनको देखा तो उनकी आंखें भी थी उदास सी।
आंगन में अब नहीं बचा कोई पेड़,
वो ले गई सब जगह, हताश सी,
इंसान बना है जब से मजदूर,
उसे बस रहती है पैसे की तलाश सी।
चलिए खत्म करते है कविता की ये लड़ी,
आगे देखिए जिंदगी गर्म है, रेत पे उठी प्यास सी।
रचना - अंकित अवस्थी





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