धर्म नाम से नहीं, आचरण से पहचाना जाता है: पं. पूरन मिश्र जी महाराज

धर्म किसी अखाड़े, मठ, पंथ या समुदाय की सीमाओं में बंधा विषय नहीं है। धर्म जीवन को धारण करने वाली उस व्यवस्था का नाम है, जो सत्य, करुणा, संयम, धैर्य और कर्तव्य के माध्यम से मनुष्य को सही जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। धर्म की वास्तविक पहचान किसी व्यक्ति की वेशभूषा, जाति या पंथ से नहीं, बल्कि उसके आचरण से होती है।
धर्म को लेकर समाज में अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर धर्म क्या है और किसी व्यक्ति को धार्मिक कैसे माना जाए? इसी विषय पर अपने विचार रखते हुए पं. पूरन मिश्र जी महाराज ने कहा कि धर्म को किसी एक अखाड़े, मठ, पंथ, समुदाय या व्यक्ति की स्वीकृति-अस्वीकृति से सीमित नहीं किया जा सकता। धर्म एक व्यापक और सनातन धारणा है।
उन्होंने कहा कि धर्म जीवन है, धर्म शांति है और धर्म प्रत्येक जीव को जीने का अधिकार देने वाली व्यवस्था है। प्रकृति में जड़ और चेतन, मनुष्य और अन्य जीव-जंतुओं के जीवन को धारण करने वाले कुछ नियम होते हैं। इन्हीं नियमों को धर्म, विधान या कर्तव्य के रूप में समझा जा सकता है।
पंथ और धर्म में अंतर समझना जरूरी
पं. पूरन मिश्र जी महाराज के अनुसार पंथ और धर्म को एक ही मान लेना उचित नहीं है। पंथ किसी विशेष मार्ग, परंपरा या समुदाय की व्यवस्था हो सकता है, जबकि धर्म उससे कहीं व्यापक अवधारणा है।
समाज में अलग-अलग समुदायों ने अपने जीवन-मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए अपने स्मृति-ग्रंथ, विधान और परंपराएं विकसित कीं। कोई हिंदू है, कोई मुस्लिम, कोई सिख, कोई बौद्ध, कोई जैन, कोई पारसी या ईसाई। कोई गुरु-मार्ग को मानता है तो कोई किसी विशेष पंथ या ग्रंथ को अपना मार्गदर्शक मानता है। लेकिन किसी पंथ से जुड़ना अपने आप में धर्म के सभी गुणों का प्रमाण नहीं है।
उन्होंने कहा कि जब कोई पंथ धर्म के मूल सिद्धांतों के अनुरूप चलता है, तब वह धर्म का सहायक बनता है। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति या पंथ का आचरण धर्म के मूल गुणों के विपरीत है, तो केवल उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर उसे धर्मसम्मत नहीं कहा जा सकता।
धार्मिक व्यक्ति की पहचान क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसी व्यक्ति के धार्मिक होने की पहचान कैसे की जाए? क्या उसके कपड़ों से, माथे के तिलक से, हाथ में माला से या उसके द्वारा लिए जाने वाले किसी विशेष नाम से?
पं. पूरन मिश्र जी महाराज के अनुसार इसका उत्तर है—नहीं।
धर्म व्यक्ति के आचरण में दिखाई देना चाहिए। किसी व्यक्ति का जन्म किस परिवार में हुआ, वह किस समुदाय से आता है या किस पंथ को मानता है, यह उसकी सामाजिक और धार्मिक पहचान हो सकती है। लेकिन उसका वास्तविक चरित्र उसके व्यवहार से सामने आता है।
उन्होंने धार्मिक व्यक्ति के कुछ प्रमुख गुणों को रेखांकित किया।
सत्य
धार्मिक व्यक्ति के आचरण में सबसे पहले सत्य दिखाई देना चाहिए। उसके शब्द और कर्म में बड़ा अंतर नहीं होना चाहिए। वह पाखंड से दूर रहे और जो कहे, उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करे।
अहिंसा और करुणा
धर्म का एक महत्वपूर्ण लक्षण करुणा है। व्यक्ति के भीतर जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता, प्रेम, दया और सेवा का भाव होना चाहिए। किसी दूसरे के जीवन और अधिकारों के प्रति सम्मान रखना भी धार्मिक आचरण का हिस्सा है।
इन्द्रिय-निग्रह
मनुष्य अपनी इच्छाओं और इन्द्रियों का गुलाम न बने। अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना और विवेक के अनुसार निर्णय लेना भी धर्म के महत्वपूर्ण गुणों में शामिल है।
अस्तेय
जो वस्तु या अधिकार व्यक्ति का नहीं है, उसे प्राप्त करने की इच्छा न रखना अस्तेय का भाव है। दूसरे व्यक्ति की संपत्ति, अधिकार और मेहनत का सम्मान करना धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
धैर्य
विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति अपना विवेक और मर्यादा न छोड़े। सुख मिलने पर अहंकार में न डूबे और दुख आने पर अपना संतुलन न खोए। परिस्थितियों के बीच संयम बनाए रखना धर्म के लक्षणों में शामिल है।
श्रद्धा
धार्मिक व्यक्ति के भीतर सत्य, सदाचार, गुरुजन, श्रेष्ठ परंपराओं और जीवन-मूल्यों के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा केवल किसी धार्मिक कर्मकांड तक सीमित न होकर जीवन के प्रति सम्मान और विश्वास का भाव भी है।
ईश्वर में विश्वास
ईश्वर में विश्वास का अर्थ केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। इसके साथ कर्म और उत्तरदायित्व की भावना भी जुड़ी है। व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि संसार केवल उसके निजी स्वार्थ के लिए नहीं है और उसके कर्मों का भी उत्तरदायित्व है।
धर्म को पहचानना हो तो आचरण देखिए
पं. पूरन मिश्र जी महाराज ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए धार्मिक नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि वह किसी विशेष पंथ या समुदाय से जुड़ा हुआ है। धर्म नाम से नहीं, आचरण से प्रकट होता है।
मनुष्य का जन्म, उसकी जाति, समुदाय या पंथ उसकी पहचान हो सकते हैं, लेकिन उसके भीतर सत्य कितना है, करुणा कितनी है, संयम कितना है, धैर्य कितना है और श्रद्धा कितनी है—यही उसके धार्मिक आचरण की वास्तविक परीक्षा है।
उनके अनुसार पंथ मनुष्य को एक मार्ग देता है, लेकिन धर्म उसे जीवन जीने का विवेक देता है।
इसीलिए धर्म को समझने और पहचानने के लिए व्यक्ति का परिचय पूछने के बजाय उसके व्यवहार और आचरण को देखना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में सत्य, करुणा, संयम, धैर्य, श्रद्धा और कर्तव्य की भावना दिखाई देती है, तो यही उसके धार्मिक होने की वास्तविक पहचान है।
अंततः धर्म किसी नाम, पहचान या बाहरी प्रतीक का विषय मात्र नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले आचरण और मूल्यों का विषय है।
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