यूपी की भूमिहीन महिला श्रमिकों की हकीकत : खेत में सबसे ज्यादा मेहनत, अधिकार और मजदूरी सबसे कम

सिर्फ 7.6% महिलाओं के नाम कृषि भूमि, 85% महिला श्रमशक्ति खेतों में सक्रिय, भूमिहीन महिलाओं के लिए अलग कल्याणकारी प्रकोष्ठ की मांग
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में खेतों में सबसे अधिक मेहनत करने वाली भूमिहीन महिला श्रमिकों के पास जमीन, मजदूरी और निर्णय लेने के अधिकार की स्थिति अब भी बेहद कमजोर है। सामाजिक समरसता मंच, अवध प्रांत की ओर से शुक्रवार को विश्व संवाद केंद्र, जियामऊ में आयोजित प्रेसवार्ता में जारी शोध-प्रतिवेदन में भूमिहीन किसान महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की तस्वीर सामने रखी गई।
यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक के. श्याम प्रसाद के मार्गदर्शन में किया है। शोध प्रतिवेदन में भूमि स्वामित्व, महिला श्रम, मजदूरी, गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कई पहलुओं को सामने रखा गया है।
7.6 प्रतिशत महिलाओं के नाम ही कृषि भूमि
शोध के अनुसार उत्तर प्रदेश में केवल 7.6 प्रतिशत महिलाओं के नाम कृषि भूमि दर्ज है। बड़ी संख्या में महिलाएं अपने परिवार की जमीन पर खेती-किसानी से जुड़ी होने के बावजूद भूमि की मालिक नहीं हैं। इसके चलते कृषि कार्य में उनके योगदान के बावजूद संपत्ति और निर्णय लेने के अधिकार में उनकी हिस्सेदारी सीमित बनी हुई है।

शोध में दावा किया गया है कि प्रदेश की करीब 85 प्रतिशत महिला श्रमशक्ति खेतों में काम करती है, लेकिन बड़ी संख्या में महिलाओं के श्रम को औपचारिक मजदूरी नहीं मिलती। पिछले एक वर्ष में काम करने वाली महिलाओं में 18 प्रतिशत से भी कम को नकद मजदूरी मिलने की बात रिपोर्ट में कही गई है। बड़ी संख्या में महिलाओं को अनाज या अन्य वस्तुओं के रूप में मेहनताना मिलने का उल्लेख किया गया है।
बुंदेलखंड और अनुसूचित जाति की महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित
प्रतिवेदन के अनुसार मध्य, पूर्वी और दक्षिणी उत्तर प्रदेश के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों में गरीबी की दर 73.4 प्रतिशत से 89.8 प्रतिशत तक है। रिपोर्ट में बुंदेलखंड क्षेत्र और अनुसूचित जाति समुदाय की महिलाओं को आर्थिक संकट से सबसे अधिक प्रभावित वर्गों में बताया गया है।

शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति भी चिंता का विषय बताई गई है। रिपोर्ट में महिला साक्षरता दर करीब 66 प्रतिशत, जबकि पुरुषों की साक्षरता 82 प्रतिशत बताई गई है। इसके अलावा एनीमिया और बाल कुपोषण की स्थिति को भी गंभीर समस्या के रूप में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक केवल 16 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध है।
भूमिहीन महिला को अन्नदाता की मान्यता जरूरी
शोधकर्ता डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने कहा कि भूमिहीन किसान महिला को केवल खेत में काम करने वाली श्रमिक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे ‘अन्नदाता’ के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब तक भूमिहीन महिला को भूमि, मजदूरी और निर्णय प्रक्रिया में उसका उचित अधिकार नहीं मिलता, तब तक ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण अधूरा रहेगा। उनके अनुसार ऐसा भारत बनना चाहिए, जहां खेत की मेड़ पर खड़ी उस महिला की भी नीति-निर्धारण में उतनी ही प्रभावी आवाज हो, जिसके नाम एक इंच जमीन नहीं है।
भूमिहीन महिलाओं के लिए अलग कल्याणकारी प्रकोष्ठ की मांग
प्रेसवार्ता में सरकार के सामने कई मांगें भी रखी गईं। सामाजिक समरसता मंच ने अनुसूचित जाति एवं वंचित वर्गों की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ गठित करने की मांग की।
इसके अलावा मनरेगा में भूमिहीन महिला श्रमिकों को प्राथमिकता के आधार पर वर्षभर रोजगार देने, समान काम के बदले समान मजदूरी सुनिश्चित करने और मजदूरी का तत्काल नकद भुगतान कराने की मांग की गई।
मंच ने भूमिहीन महिला श्रमिकों की पहचान के लिए ‘खेतमजदूर कार्ड’ जारी करने और इसके माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) की व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया। भूमिहीन परिवारों को बिना भूमि गिरवी रखे विशेष ऋण और बीमा सुविधा उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई।

किसान और भूमिहीन महिला एक-दूसरे की सहयात्री
सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक के. श्याम प्रसाद ने कहा कि किसान परिवार की महिला हो या भूमिहीन खेत मजदूर परिवार की महिला, दोनों एक ही खेत, एक ही परिश्रम और एक ही सपने की साझेदार हैं।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत की इन दोनों महिला शक्तियों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सहयात्री मानकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता का अर्थ यही है कि गांव की हर महिला, चाहे वह भूमि की मालकिन हो या भूमिहीन खेत मजदूर, एक-दूसरे के साथ खड़ी हो।
मंच ने कहा कि भूमिहीन महिला श्रमिकों की समस्याओं का समाधान किसी एक विभाग या योजना तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर काम करना होगा। सरकार को नीति बनानी होगी और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका लाभ वास्तविक जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचे।
प्रेसवार्ता में सामाजिक समरसता गतिविधि के प्रांत प्रमुख राजकिशोर, शोध सहयोगी अविशा रवि तथा सामाजिक समरसता गतिविधि की प्रांतीय टोली के सदस्य बृजनंदन राजू सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।
लेखक के बारे में
Santosh Kumar Singh
श्री सिंह ‘विजुअल लाइव’ मासिक पत्रिका एवं न्यूज पोर्टल के संपादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्ष 2004 से उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी सेवाएं देते हुए पत्रकारिता का लंबा अनुभव अर्जित किया है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, राष्ट्रीय स्वरूप और भारत प्रतिदिन सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए उन्होंने रिपोर्टिंग की है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लखनऊ आगमन से लेकर राजनीति, प्रशासन, जनसरोकार और शहर की महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। श्री सिंह की विशेष रुचि खोजी पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल में है। इंटरनेट आधारित शोध, सूचना के स्रोतों की पड़ताल और खबर की बारीकियों तक पहुंचने की उनकी कार्यशैली उन्हें अलग पहचान देती है। बदलते मीडिया परिदृश्य में वे तथ्यपरक, विश्वसनीय और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं। पत्रकारिता के साथ उन्हें संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनका मानना है कि एक पत्रकार के लिए जिज्ञासा, निरंतर सीखने की प्रवृत्ति और तथ्यों के प्रति ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। Santosh Kumar Singh की सभी खबरें देखें →
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