बोधगया मंदिर विवाद: बुद्ध की विरासत पर हिंदू-बौद्धों के बीच एकजुटता की अपील
कुंवर अशोक सिंह राजपूत
बुद्ध वंदना बुद्ध सभी के वंदनीय हैं
उस समय के भारत देश में ईसा पूर्व 563 में जन्मे सिद्धार्थ ने बोधगया में तपस्या करके ईसा पूर्व 528 में ज्ञान प्राप्त किया और तथागत बुद्ध बने। बौद्ध धर्म का जन्म भारत देश में हुआ और यह पूरे विश्व में फैल गया।
अहिंसा, करुणा, मैत्री, समता जैसे महान गुण बौद्ध धर्म के कारण हमारे देश में सभी को प्राप्त हुए। इसलिए 12वीं शताब्दी के महान भक्ति कवि जयदेव ने बुद्ध को विष्णु के 9वें अवतार के रूप में स्तुति की। इसलिए अनेक हिंदुओं के घरों और कार्यालयों में बुद्ध की प्रतिमाएँ दिखाई देती हैं। ये सभी बौद्ध तो नहीं हैं!
इसका कारण =
अच्छे विचारों को चारों दिशाओं से स्वीकार करना चाहिए — ऐसा हमारे ऋग्वेद में कहा गया है। भारत देश में अनेक धर्मों का जन्म हुआ।
किसी भी पद्धति से ईश्वर की आराधना करने पर सभी को मुक्ति प्राप्त होती है, ऐसा हमारे ऋषियों ने कहा है। इसलिए एक ही मंदिर में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हमें दर्शन देती हैं। विदेशों में जन्मे धर्मों में यह व्यापक दृष्टि नहीं है।
हमारा धर्म ही सत्य है,
अन्य धर्म नरक के मार्ग हैं — यह उनका विश्वास और उनकी व्यवहार शैली है।
बुद्धगया का इतिहास =
सिद्धार्थ ने बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया। बाद के समय में अशोक ने वहाँ बुद्ध मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद अनेक हिंदू राजाओं ने मंदिर के सौंदर्यीकरण में सहयोग किया। बोधगया में 8वीं शताब्दी में बोधगया शंकरमठ की शुरुआत हुई। तब से लेकर आज तक शंकरमठ के पीठाधिपतियों की परंपरा की सूची उपलब्ध है।
विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी (भक्तियार खिलजी) ने 12वीं शताब्दी में भारत पर आक्रमण करके बोधगया के बुद्ध मंदिर और नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया। 1590 से शंकरमठ और बोधगया मंदिर के इतिहास का विवरण फिर से ज्ञात होता है।
1726वीं शताब्दी में शंकरमठ को उसकी संपत्तियाँ वापस प्राप्त हुईं।
1811 में अंग्रेज अधिकारी हेमिल्टन बुकानन ने उस समय के गया शंकरमठ के बारे में विस्तार से अपनी पुस्तक में लिखा।
1891वीं शताब्दी में अंग्रेज अधिकारी अलेक्जेंडर कनिंघम ने खुदाई करके प्राचीन बौद्ध मंदिर को खोजा और पुनः नए मंदिर का निर्माण कराया। उस समय गर्भगृह में बुद्ध की मूर्ति नहीं थी। कनिंघम के अनुरोध पर शंकरमठ में मौजूद बुद्ध की मूर्ति उस समय के शंकर पीठाधिपति ने कनिंघम को प्रदान की। वही मूर्ति आज भी गया बुद्ध मंदिर में है। बौद्ध मंदिर के निर्माण में गया शंकरमठ ने हर प्रकार से सहयोग किया।
तब से गया बुद्ध मंदिर गया शंकरमठ के अधीन है।
विवाद की शुरुआत
1891 में श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु अनागारिक धर्मपाल द्वारा श्रीलंका से लाई गई बुद्ध की मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित करने का प्रयास किए जाने के साथ विवाद शुरू हुआ। इन विवरणों का उल्लेख 1893 में जिला कलेक्टर G. A. ग्रियर्सन द्वारा लिखित A Brief History of Bodh Gaya में विस्तार से किया गया है।
इस मंदिर को बौद्धों को सौंपने की मांग को लेकर कुछ बौद्ध अंग्रेजी उच्च न्यायालय में गए। गया महंत बनाम अनागारिक धर्मपाल के बीच हुए न्यायिक विवाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 22-08-1895 को निर्णय दिया कि बोधगया मंदिर गया शंकरमठ का है। इससे संबंधित अनेक रिकॉर्ड उपलब्ध हैं।
बहन निवेदिता का मत
1904 में स्वामी विवेकानंद के समाधि लेने के बाद उनकी शिष्या बहन निवेदिता, रवींद्रनाथ ठाकुर, डॉ. सी. वी. रमन और प्रसिद्ध इतिहासकार मजूमदार के साथ बोधगया आईं और सभी स्थानों का दर्शन किया।
उस समय कुछ विदेशी बौद्ध बोधगया को अंतरराष्ट्रीय केंद्र (संपत्ति) बनाने की मांग कर रहे थे। अक्टूबर में उन्होंने एक लेख लिखते हुए कहा, “रामकृष्ण परमहंस ने नए धर्म की शुरुआत नहीं की, बल्कि सनातन धर्म पर जमी मैल को हटाया। उसी प्रकार बुद्ध ने नए धर्म की शुरुआत नहीं की, बल्कि सनातन धर्म में मौजूद कुरीतियों का निर्मूलन किया।”
गांधीजी की मध्यस्थता
1922 में गया में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के अवसर पर श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु अनागारिक धर्मपाल ने गांधीजी से शिकायत करके इस बुद्ध मंदिर को बौद्धों को सौंपने की मांग की।
इस समस्या के समाधान के लिए गांधीजी ने निम्नलिखित सात सदस्यों की समिति बनाई।
वे थे = गया शंकरमठ के पीठाधिपति, अनागारिक धर्मपाल, बाबू राजेंद्र प्रसाद, राहुल सांकृत्यायन, स्वामी दयानंद, बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद और के. पी. जायसवाल।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद माननीय राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद द्वारा शंकर पीठाधिपति को समझाने के बाद 1953 में बिहार विधानसभा ने BTMC कानून बनाया। इस कानून के अनुसार बोधगया मंदिर की प्रबंधन समिति में हिंदू जिला कलेक्टर अध्यक्ष होते हैं तथा 8 सदस्यों में 4 बौद्ध और 4 हिंदू होते हैं। यही समिति तब से गया बौद्ध मंदिर का संचालन कर रही है।
आज इस मंदिर में दर्शन करने वालों में 70% लोग हिंदू ही हैं! हिंदू भक्तों तथा देश-विदेश के बौद्धों को अब तक वहाँ किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई है।
फिर से सामने आया विवाद
कुछ बौद्धों ने बोधगया मंदिर का प्रबंधन केवल बौद्धों को सौंपने की मांग को लेकर विवाद शुरू कर दिया है।
बुद्ध केवल बौद्धों के ही नहीं, हिंदुओं के लिए भी वंदनीय हैं! कुछ विदेशी शक्तियों के प्रभाव में कुछ बौद्ध हिंदुओं और बौद्धों के बीच विवाद पैदा करने के लिए षड्यंत्र कर रहे हैं। हमें सभी को एकजुट होकर रहना चाहिए।
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