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जनसंख्या से आगे समाज की बदलती कहानी - विमर्श

Published By Ankit Awasthi·19 Sept 2026 07:01 PM (IST)
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जनसंख्या से आगे समाज की बदलती कहानी - विमर्श

भारत में कम बच्चे पैदा होने की कहानी को लंबे समय तक केवल जनसंख्या नियंत्रण के चश्मे से देखा गया। कभी इसे विकास की सफलता कहा गया, कभी गरीबी कम करने की जरूरत से जोड़ा गया और कभी बढ़ती आबादी को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया गया। लेकिन अब भारत उस मोड़ पर पहुंच रहा है जहां सवाल उलटने लगा है—अगर लोग अपनी इच्छा से ही कम बच्चे पैदा करने लगें तो क्या होगा? प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की नई रिपोर्ट ने इसी बदलती तस्वीर की ओर ध्यान खींचा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर यानी Total Fertility Rate 1.9 हो चुकी है, जो 2.1 के replacement level से नीचे है। उत्तर प्रदेश और बिहार को अलग कर दें तो यही दर लगभग 1.6 रह जाती है। 2001 में भारत में करीब 2.93 करोड़ बच्चे पैदा हुए थे, जो 2023 में घटकर लगभग 2.32 करोड़ रह गए। यानी करीब दो दशकों में सालाना जन्मों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत कमी आई है।

यह आंकड़ा पहली नजर में शायद राहत जैसा लगे। आखिर कम आबादी का मतलब कम दबाव, कम संसाधन और शायद बेहतर जीवन भी माना जा सकता है। लेकिन जनसंख्या का गणित इतना सीधा नहीं होता। आज पैदा होने वाला बच्चा कल का विद्यार्थी, कर्मचारी, उपभोक्ता, करदाता और परिवार का सदस्य होगा। जब बच्चों की संख्या लगातार घटती है तो कुछ दशक बाद इसका असर स्कूलों से लेकर रोजगार बाजार, पेंशन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और बुजुर्गों की देखभाल तक पहुंचता है। EAC-PM की रिपोर्ट का मूल सवाल भी यही है कि जिस समय भारत की कुछ राज्य अर्थव्यवस्थाएं तेजी से ageing की तरफ बढ़ रही हैं, उस समय दशकों पुरानी population-control सोच को क्या उसी रूप में जारी रखना चाहिए। रिपोर्ट कम fertility वाले राज्यों में नसबंदी के वित्तीय प्रोत्साहनों और दो-बच्चे की सीमा जैसे उपायों पर पुनर्विचार की बात करती है, हालांकि यह family planning या लोगों की reproductive choice के खिलाफ नहीं है।

लेकिन यहां एक जरूरी सवाल छूट जाता है—लोग बच्चे कम क्यों कर रहे हैं? केवल इसलिए नहीं कि सरकार ने उन्हें कम बच्चे पैदा करने की सीख दी थी। भारत के शहरों और कस्बों में परिवार की पूरी अर्थव्यवस्था बदल चुकी है। पहले बच्चे के जन्म को परिवार की आर्थिक संरचना में एक स्वाभाविक विस्तार माना जाता था; आज वह एक दीर्घकालीन financial commitment बन गया है। महानगरों में घर का किराया या EMI, निजी स्कूल, tuition, coaching, healthcare, transport, childcare, extracurricular activities और भविष्य की higher education—इन सबको जोड़कर माता-पिता अक्सर बच्चे को केवल आज की जरूरत नहीं, अगले 20-25 साल की आर्थिक जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं। छोटे शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। वहां खर्च महानगरों जितना नहीं हो सकता, लेकिन बेहतर स्कूल, कोचिंग, डॉक्टर, डिजिटल सुविधाएं और higher education की आकांक्षा परिवार के बजट को लगातार ऊपर ले जाती है।

सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि शिक्षा का खर्च परिवारों के लिए वास्तविक दबाव है। 2025 के Comprehensive Modular Survey on Education में शहरी परिवारों के लिए स्कूल शिक्षा की course fees पर औसत वार्षिक खर्च करीब ₹15,143 बताया गया, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह करीब ₹3,979 था। इसके अलावा लगभग 27 प्रतिशत विद्यार्थियों ने private coaching लेने या ले चुके होने की जानकारी दी और शहरों में coaching पर खर्च भी ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक पाया गया। यह केवल स्कूल की फीस है; इसमें बच्चे की पूरी परवरिश, higher education, healthcare, housing और दूसरे दीर्घकालीन खर्च शामिल नहीं हैं।

इसीलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि बच्चा पैदा करने की लागत केवल अस्पताल में delivery का खर्च नहीं है; यह उस सामाजिक जीवन की कीमत है जिसे आज का माता-पिता अपने बच्चे को देना चाहता है। एक मध्यमवर्गीय परिवार अक्सर सिर्फ यह नहीं सोचता कि बच्चा पाल लेंगे या नहीं। वह सोचता है कि क्या हम उसे अच्छे स्कूल में पढ़ा पाएंगे, क्या उसे शहर के दूसरे बच्चों के बराबर अवसर दे पाएंगे, क्या उसकी higher education का खर्च उठा पाएंगे, क्या जरूरत पड़ने पर विदेश या बड़े शहर में पढ़ा पाएंगे, क्या उसके लिए सुरक्षित घर और बेहतर healthcare उपलब्ध करा पाएंगे। यही aspiration धीरे-धीरे “एक बच्चा काफी है” या “दो से ज्यादा नहीं” जैसी सोच को मजबूत करती है। उच्च आय वाले परिवारों में यदि शिक्षा, housing, childcare और अवसरों को मिलाकर पूरे जीवन-चक्र का खर्च देखा जाए तो यह राशि कई लाख से करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है; लेकिन इसका कोई एक सार्वभौमिक भारतीय आंकड़ा नहीं है, क्योंकि परिवार, शहर, स्कूल और जीवनशैली के अनुसार खर्च में भारी अंतर है।

बदलती fertility को सिर्फ पैसे से जोड़ना भी गलत होगा। पैसा एक बड़ा factor है, लेकिन समाज की संरचना भी बदल गई है। संयुक्त परिवार टूटकर nuclear family में बदल रहे हैं। पहले बच्चे की देखभाल में दादा-दादी, चाचा-चाची और दूसरे रिश्तेदारों की भूमिका स्वाभाविक रूप से शामिल होती थी। आज पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हों तो बच्चे की देखभाल के लिए daycare, nanny, domestic help या महंगे childcare विकल्प की जरूरत पड़ सकती है। UNDP और Dalberg की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार कम आय वाले शहरी परिवारों की लगभग 60-70 लाख महिलाओं को आज quality और affordable childcare की जरूरत है, जबकि मौजूदा public और private व्यवस्था इस मांग के 10 प्रतिशत से भी कम को पूरा करती है। यानी childcare केवल परिवार की निजी समस्या नहीं, बल्कि labour market और महिला रोजगार से जुड़ा सार्वजनिक मुद्दा भी है।

इसके साथ रोजगार की अनिश्चितता जुड़ती है। आज की युवा पीढ़ी में शिक्षा का विस्तार हुआ है, लेकिन education और secure employment के बीच दूरी भी दिखाई देती है। 19 सितंबर 2026 को जारी नए district-level labour data में भी देश के करीब 250 जिलों में 15-29 वर्ष के 25 प्रतिशत से अधिक युवा employment, education या training—इन तीनों में से किसी में नहीं थे। यह आंकड़ा हर जिले की पूरी कहानी नहीं बताता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि युवा आबादी का एक हिस्सा आर्थिक रूप से productive system से जुड़ नहीं पा रहा। ऐसे माहौल में विवाह और बच्चे दोनों कई युवाओं के लिए केवल सामाजिक नहीं, आर्थिक निर्णय भी बन जाते हैं।

फिर आता है स्वतंत्र जीवन का बदलता विचार। आज का युवा पहले की तुलना में ज्यादा समय तक education, career और personal stability पर ध्यान देता है। नौकरी के लिए शहर बदलना, अकेले रहना, विदेश जाना, career switch करना, अपने लिए घर या financial security बनाना—ये सब जीवन के सामान्य हिस्से बन रहे हैं। दुनिया भर में उभरे नए relationship trends, individualism, delayed marriage और personal autonomy के विचार भी भारतीय युवाओं तक सोशल मीडिया, streaming platforms, global workplaces और digital culture के जरिए पहुंच रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं कि भारत पश्चिमी समाज की हूबहू नकल कर रहा है; बल्कि भारतीय युवा अब परिवार, विवाह और parenthood को लेकर पहले की तुलना में अधिक विकल्पों और विचारों के संपर्क में है।

विवाह स्वयं भी बदल रहा है। पहले विवाह अक्सर परिवारों के बीच सामाजिक गठबंधन था; आज कम से कम शहरी और शिक्षित वर्ग के एक हिस्से में compatibility, career, आर्थिक स्थिरता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और emotional expectations भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। इसका एक परिणाम विवाह में देरी है, और जब विवाह देर से होता है तो naturally पहला बच्चा भी देर से होता है। देर से शुरू हुआ परिवार अक्सर छोटा परिवार चुनता है। भारत के आधिकारिक demographic आंकड़े भी उम्र और विवाह के fertility से संबंध को दिखाते हैं।

इस कहानी में जाति और धर्म का angle भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे सरल निष्कर्ष में बदलना खतरनाक होगा। भारत में विवाह अभी भी बड़ी हद तक caste और community networks से प्रभावित है। कई परिवारों में अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह आज भी सामाजिक स्वीकृति, परिवार की सहमति और सामुदायिक दबाव की जटिलताओं से गुजरता है। दूसरी ओर educated और urban युवाओं का एक वर्ग partner selection में caste और community से बाहर जाने की कोशिश भी कर रहा है। लेकिन जब suitable partner मिलने में कठिनाई बढ़ती है, विवाह देर से होता है या विवाह ही नहीं होता, तो fertility पर उसका स्वाभाविक प्रभाव पड़ता है। यह केवल धर्म या जाति की समस्या नहीं है; यह बदलते social networks, partner choice, gender expectations और family structures का सम्मिलित परिणाम है।

यहीं भारत की demographic कहानी की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। एक तरफ समाज लंबे समय से population control को विकास की शर्त मानता रहा, दूसरी तरफ उसी समाज ने धीरे-धीरे ऐसी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां पैदा कर दीं जिनमें युवा खुद ही छोटे परिवार की ओर जाने लगे। शिक्षा बढ़ी, महिलाओं की aspirations बढ़ीं, शहर महंगे हुए, घर छोटा हुआ, नौकरी अधिक competitive हुई, childcare मुश्किल हुआ, संयुक्त परिवार कमजोर हुए और marriage market में expectations बढ़ीं। इन सबके बीच बच्चा अब केवल “परिवार का अगला सदस्य” नहीं रहा; वह एक ऐसे भविष्य की परियोजना बन गया है जिस पर माता-पिता भारी समय, पैसा और emotional investment करने को तैयार होते हैं।

यही कारण है कि fertility को केवल “लोग बच्चे पैदा नहीं करना चाहते” कहकर समझना भी अधूरा है। कई लोग शायद दूसरा या तीसरा बच्चा चाहते हों, लेकिन आर्थिक, career और childcare constraints उन्हें रोकते हैं। दुनिया के कई देशों में यही फर्क “desired fertility” और “actual fertility” की बहस में सामने आता है। भारत में भी आने वाले वर्षों की policy को यह देखना होगा कि लोग वास्तव में कितने बच्चे चाहते हैं और किन परिस्थितियों के कारण वे उससे कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। हाल की भारतीय बहस में भी demographers ने rising living costs, delayed marriage, higher education, बदलती aspirations और urbanisation को fertility decline से जोड़ा है।

इसलिए EAC-PM की रिपोर्ट को केवल “अब सरकार ज्यादा बच्चे पैदा करने को कहेगी” जैसी खबर में बदल देना इस पूरे मुद्दे को छोटा कर देगा। असली सवाल यह है कि क्या भारत ऐसा समाज बन सकता है जहां बच्चा पैदा करना किसी परिवार के लिए आर्थिक आत्मघाती फैसला न लगे। अगर एक दंपती बच्चा चाहता है तो क्या affordable housing मिलेगी? क्या maternity और paternity support पर्याप्त होगा? क्या childcare उपलब्ध होगा? क्या महिला को मां बनने के बाद career छोड़ने की मजबूरी कम होगी? क्या स्कूल और higher education की लागत इतनी होगी कि परिवार उसे वहन कर सके? क्या नौकरी इतनी स्थिर होगी कि युवा 30 की उम्र में परिवार शुरू करने से न डरे?

और यहां सरकार के साथ-साथ समाज की भूमिका भी आती है। हम एक तरफ युवा से कहते हैं कि शादी करो, परिवार बढ़ाओ और समाज की परंपरा बचाओ; दूसरी तरफ उसी युवा के सामने housing की कीमत, बेरोजगारी, competitive education, लंबे working hours और childcare की लगभग निजी जिम्मेदारी रख देते हैं। हम चाहते हैं कि महिलाएं मां भी बनें और career में भी आगे बढ़ें, लेकिन घर और बच्चों की देखभाल का असमान बोझ अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। हम संयुक्त परिवार के टूटने पर चिंता करते हैं, लेकिन nuclear family में बुजुर्गों और बच्चों की देखभाल की नई व्यवस्था बनाने में उतनी गति नहीं दिखाते।

इसलिए भारत का आने वाला demographic संकट केवल “कम जन्म” का संकट नहीं होगा। यह कम जन्म + ageing + childcare + रोजगार + विवाह + housing + महिलाओं की workforce participation + सामाजिक संबंधों का संयुक्त सवाल होगा। आज जिस बच्चे को परिवार आर्थिक बोझ समझकर टाल रहा है, कल उसी बच्चे की कमी labour market में दिखाई दे सकती है। जिस महिला को childcare की सुविधा न मिलने के कारण career और motherhood के बीच चुनाव करना पड़ता है, उसका फैसला केवल निजी नहीं है; उसका असर देश की workforce पर भी पड़ता है। और जिस युवा को स्थिर रोजगार नहीं मिलता, उसका देर से विवाह या छोटा परिवार चुनना केवल व्यक्तिगत preference नहीं, बदलती अर्थव्यवस्था की प्रतिक्रिया भी हो सकती है।

भारत को अब इस विषय पर पुराने “जनसंख्या ज्यादा है” वाले विमर्श से आगे बढ़ना होगा। न लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए नैतिक दबाव चाहिए और न कम बच्चे पैदा करने के लिए सरकारी दबाव। जरूरत इस बात की है कि जिस व्यक्ति या दंपती को जितना परिवार चाहिए, वह उसे सुरक्षित, सम्मानजनक और आर्थिक रूप से संभव परिस्थितियों में बना सके। यही reproductive choice का वास्तविक अर्थ है।

भारत की जनसंख्या का भविष्य किसी एक सरकारी आदेश से तय नहीं होगा। वह लाखों छोटे-छोटे फैसलों से बनेगा—किस उम्र में शादी करनी है, नौकरी के लिए शहर बदलना है या नहीं, घर खरीदना है या किराये पर रहना है, दोनों पति-पत्नी काम करेंगे या नहीं, पहला बच्चा कब होगा, दूसरा होगा या नहीं, बच्चे को किस स्कूल में पढ़ाना है और उसकी पूरी जिंदगी पर कितना खर्च करना है। इन फैसलों के पीछे सरकार की नीतियां हैं, लेकिन उतने ही गहरे स्तर पर समाज की बदलती आकांक्षाएं और रिश्तों की बदलती संरचना भी है।

इसलिए आज जरूरत “बच्चे कम हो रहे हैं” पर चिंता करने भर की नहीं, बल्कि यह समझने की है कि क्यों हो रहे हैं और क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जिसमें परिवार बढ़ाना लोगों की मजबूरी नहीं, लेकिन असंभव आर्थिक परियोजना भी न हो। भारत की demographic कहानी अब population control की कहानी से आगे निकल चुकी है। यह उस समाज की कहानी है जहां लोग पहले से ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, ज्यादा स्वतंत्र रहना चाहते हैं, बेहतर जीवन चाहते हैं, अपने बच्चों को ज्यादा देना चाहते हैं—और शायद इसी वजह से बच्चों की संख्या कम कर रहे हैं।

आने वाले दो दशकों में भारत के सामने असली चुनौती यह नहीं होगी कि उसके पास कितने लोग हैं। चुनौती यह होगी कि उसके पास कितने युवा होंगे, कितने काम करने वाले हाथ होंगे, कितनी महिलाओं को काम करने का अवसर मिलेगा, कितने बुजुर्गों की देखभाल कौन करेगा और कितने परिवार आर्थिक सुरक्षा के साथ बच्चे पैदा करने में सक्षम होंगे।

यानी भारत की जनसंख्या पर अगली बहस “ज्यादा बच्चे या कम बच्चे” की नहीं होनी चाहिए। बहस यह होनी चाहिए—ऐसा भारत कैसे बने जहां बच्चा पैदा करना न सामाजिक आदेश हो, न आर्थिक जोखिम; बल्कि एक स्वतंत्र इच्छा हो जिसे पूरा करने के लिए समाज और व्यवस्था दोनों साथ खड़े हों।

लेखक के बारे में

Ankit Awasthi

श्री अवस्थी स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं कंटेंट राइटर हैं। पिछले करीब छह वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय श्री अवस्थी ने न्यूज़ट्रैक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया है। समाचार एवं फीचर लेखन के अलावा डिजिटल कंटेंट, SEO और ऑनलाइन मीडिया प्रोडक्शन में भी उनका अनुभव रहा है। राजनीति विज्ञान में परास्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा MBA (IT) की शिक्षा प्राप्त श्री अवस्थी की विशेष रुचि समसामयिक राजनीति, सामाजिक बदलाव, शासन-व्यवस्था और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर तथ्यपरक एवं खोजपरक लेखन में है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों के माध्यम से किसी विषय की बारीक पड़ताल कर उसके विभिन्न पहलुओं को सामने लाना उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। श्री अवस्थी एक पुस्तक के लेखक भी हैं और लेखन के माध्यम से समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को समझने और उन पर विमर्श विकसित करने में सक्रिय हैं। पत्रकारिता के साथ डिजिटल मार्केटिंग, वेब कंटेंट और लीड जनरेशन के क्षेत्र में भी उन्होंने कार्य किया है। काम के अलावा उन्हें अध्ययन, संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनसे ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। Ankit Awasthi की सभी खबरें देखें →

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