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युगपुरुष श्रद्धेय अशोक सिंहल जी का जन्मशताब्दी वर्ष

Published By News DeskAuthor: नरेन्‍द्र मोदी, भारत के माननीय प्रधानमंत्री·27 Sept 2026 02:10 PM (IST)
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युगपुरुष श्रद्धेय अशोक सिंहल जी का जन्मशताब्दी वर्ष

एक बहुत सुंदर सुभाषित है, “वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।” इसका मतलब है कि पेड़ कभी अपने फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल अपने पास नहीं रखती। इसी तरह, संत स्वभाव के लोग भी स्वयं को प्राथमिकता ना देते हुए, सदैव दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं, अपना जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं। सदियों से हमारे ऋषियों ने हमें यही सिखाया है कि मानवता के कल्याण के लिए समर्पित जीवन का महत्व व्यक्तिगत उपलब्धियों से कहीं अधिक होता है। श्रद्धेय अशोक सिंघल जी का जीवन इस भावना का पुण्य उदाहरण है।

27 सितंबर से हम स्वर्गीय अशोक सिंघल जी का जन्म-शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं। यह एक महान विभूति के सम्मान का सुअवसर है। उन्होंने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और दशकों तक समर्पित भाव से समाज एवं संगठन के कार्यों को आगे बढ़ाया।

यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मुझे स्वर्गीय अशोक जी के साथ लंबे समय तक कार्य करने, उनसे सीखने, उनसे संवाद करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला। मुझे 1981 का एक प्रसंग याद आता है। उस समय मैं एक युवा कार्यकर्ता के तौर पर संगठन की ओर से मिली जिम्मेदारियां निभा रहा था। तब मुझे अशोक जी का हाथ से लिखा एक पत्र मिला। उन्होंने पत्र में आने वाले एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी थी और मुझे कुछ जिम्मेदारियां सौंपी थीं। उस समय अशोक सिंघल जी से पत्र पाना, मेरे लिए बहुत विशेष और यादगार क्षण बन गया था।

मैंने उन्हें कई दशकों तक दिन-रात काम करते देखा। वे देश के दूर-दराज के क्षेत्रों की लंबी और कई बार कठिन यात्राएं किया करते थे। गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में जाना उन्हें विशेष रूप से प्रिय था। वे लगातार इस पर चिंतन करते थे कि समाज के वंचित और अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के लिए और क्या किया जा सकता है। जब भी देश में कहीं प्राकृतिक आपदा आती, तो अशोक सिंघल जी सबसे पहले वहां पहुंचने वालों में होते या फिर प्रभावित लोगों की सहायता के लिए कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन देते। वर्ष 2001 में कच्छ में आए भूकंप के बाद उनके साथ का मेरा अनुभव अविस्मरणीय बन गया।

आदरणीय अशोक जी अत्यंत प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार से थे। उनके पिता श्री महावीर जी की एक प्रशासक के रूप में पहचान थी। उनके एक भाई श्री बी.पी. सिंघल जी पुलिस अधिकारी बने और बाद में संसद सदस्य भी रहे। दूसरे भाई श्री वी.पी. सिंघल जी त्रिपुरा के तब मुख्य सचिव बने, जब यह नया राज्य बना था। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी कॉमर्स और कृषि के क्षेत्र में सफलता हासिल की। लेकिन शुरू से ही अशोक जी का झुकाव बिल्कुल अलग दिशा में था। बहुत कम उम्र में ही उनके व्यवहार में दूसरों के प्रति करुणा और सेवा की अद्भुत भावना दिखने लगी थी। वे चाहते थे कि भारत का पुनरुत्थान हो और मां भारती की संतान गौरवशाली उपलब्धियां हासिल करें। प्रयागराज में पले-बढ़े अशोक जी कई घंटे संगम के तट पर बैठा करते थे। नदी के प्रति उनका स्वाभाविक आकर्षण था। वहां आने वाले साधु-संत और श्रद्धालुओं से भी उनकी बहुत आत्मीयता थी। इससे भारत के सांस्कृतिक लोकाचार की उनकी समझ और समृद्ध हुई। समाज के लिए कुछ करने का उनका संकल्प भी और दृढ़ हुआ। दूसरों के लिए जीने की यही ललक उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ले आई। उनको जो भी जिम्मेदारी मिली, उसे उन्होंने पूरे उत्साह, अनुशसन और कर्तव्यभाव से निभाया।

श्री अशोक सिंघल जी ने अपने निरंतर प्रयास और अथक परिश्रम से अनेक संस्थाओं और आंदोलनों को मजबूत किया। अपनी ओजस्वी वाणी और अभिव्यक्ति की अद्भुत शैली से वे पूरी सभा को मंत्रमुग्ध कर देते थे। अपने साथी कार्यकर्ताओं के प्रति वे अत्यधिक स्नेह रखते थे। जो भी उनके संपर्क में आता, वह उनकी सादगी से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। संत समाज के साथ उनके संबंध बहुत प्रगाढ़ थे। देशभर के साधु-संतों के बीच भी उनका काफी सम्मान था। संतगण उनके परामर्श को महत्व देते थे और उनकी बातों को पूरे आदरभाव से सुनते थे।

मेरी स्मृति में ऐसी दो घटनाएं उभर रही हैं, जिनसे श्री अशोक सिंघल जी के विराट व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। पहली घटना 1993 की है। विश्व हिंदू परिषद ने स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित किया था। विदेश में ऐसे भव्य सम्मेलन का विजन, उसकी प्लानिंग और विभिन्न समूहों को एक मंच पर लाने का भगीरथ प्रयास श्री अशोक जी के अद्वितीय संगठनात्मक कौशल का परिचायक था।

दूसरी घटना वर्ष 2000 की है, जब त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन हुआ था। उस समय मैं भी वहीं था। मैंने प्रत्यक्ष देखा कि अशोक सिंघल जी की उपस्थिति ने अन्य प्रतिनिधियों में कितना उत्साह भर दिया था। मेरे संबोधन के बाद उन्होंने जिस तरह मेरी सराहना की, वो मेरे लिए बहुत भावुक कर देने वाला अनुभव था। मैंने एक बार फिर अनुभव किया कि उनका प्रोत्साहन किस तरह हर कार्यकर्ता को नई ऊर्जा से भर देता था।

राम जन्मभूमि आंदोलन में श्री अशोक सिंघल जी की ऐतिहासिक भूमिका का स्मरण किए बिना उनका कोई भी उल्लेख अधूरा है। वर्ष 1991 की बोट क्लब रैली में दिए गए उनके ओजस्वी संबोधन को कौन भूल सकता है? या आंदोलन के चरम पर लहूलुहान और घायल अवस्था में अशोक जी की वह ऐतिहासिक तस्वीर भला किसकी स्मृति से मिट सकती है? आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर है, तो इसके पीछे अशोक जी जैसी विभूतियों का निस्वार्थ समर्पण है, जिन्होंने इसे संभव बनाने के प्रयास में स्वयं को पूरी तरह खपा दिया। आज यदि अशोक जी हमारे बीच होते तो अयोध्या में राम मंदिर को देखकर वो सबसे अधिक भावुक एवं प्रसन्न होते।

स्वर्गीय अशोक सिंघल जी के विचार बहुत सुलझे हुए थे। वे स्पष्ट रूप से मानते थे कि समाज में समरसता के साथ ही भाईचारे का संदेश मजबूत होना चाहिए। उन्होंने सामाजिक एकता और समानता के लिए निरंतर कार्य किया। उनका साफ मत था कि समाज में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति समान गरिमा व सम्मान का अधिकारी है। यही वजह थी कि उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट रखने को लेकर अपने विचार को स्पष्ट रूप से रखा। उन्होंने ही कहा था कि यह पुनीत कार्य बिहार के वीएचपी कार्यकर्ता और वंचित वर्ग से आने वाले श्री कामेश्वर चौपाल जी के हाथों से हो। काशी में एक धर्म संसद के दौरान उन्होंने डोम राजा को सम्मानित करने का फैसला किया और कई सामुदायिक अभियानों में उनके साथ मिलकर काम किया।

राष्ट्र-निर्माण के साथ ही श्री अशोक सिंघल जी के दो ऐसे प्रिय क्षेत्र थे, जो उनके हृदय के अत्यंत निकट थे। शिक्षा (विशेषकर वैदिक शिक्षा) और संगीत, इन दोनों से उनका गहरा लगाव था। वाराणसी के सांसद के रूप में मुझे इस बात पर अत्यंत गर्व की अनुभूति होती है कि जहां का मैं प्रतिनिधित्व करता हूं, उस शाश्वत काशी ने श्री अशोक सिंघल जी के जीवन में एक अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बीएचयू से शिक्षा प्राप्त की थी और वे एक मेधावी छात्र के रूप में जाने जाते थे। वे एकल विद्यालय की पहल से भी गहराई से जुड़े थे, जिसने दूर-दराज के गांवों, खासकर जनजातीय समुदायों तक बुनियादी शिक्षा पहुंचाने का कार्य किया। वे जितने गहरे अध्येता और उत्साही पाठक थे, उतने ही अच्छे श्रोता भी थे। वे युवा कार्यकर्ताओं को सदैव पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते थे।

आदरणीय अशोक जी को निकट से जानने वालों को पता है कि वे कितना सुंदर गाते थे। मुझे नागपुर की उन बैठकों की याद आती है, जिसमें वे 'एकल गीत' गाया करते थे। उनका गायन सभी को मंत्रमुग्ध कर देता था और पूरी बैठक में नई ऊर्जा भर जाती थी। वर्ष 2015 में उनके 90वें जन्मदिवस समारोह का एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने ‘हे मातृभूमि मेरी, हे पितृभूमि मेरी’ गाकर सभी को चौंका दिया था।

स्वर्गीय अशोक सिंघल जी ने अपने जीवन में हर क्षण इस महान राष्ट्र के उत्कर्ष का ही स्वप्न देखा था। उनके आदर्शों से आज भी हमें ये प्रेरणा मिलती है। उनकी जन्मशती के इस पावन अवसर पर हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिक से अधिक युवा उनके विराट व्यक्तित्व और महानता से परिचित हों। आइए, हम अपने राष्ट्र और देशवासियों के लिए अशोक सिंघल जी के सपनों को साकार करने के संकल्प को एक बार फिर दोहराएं।

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