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लखनऊ: BJP ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रभारियों की लिस्ट जारी की। उत्तर प्रदेश के प्रभारी बनाए गए विनोद तावड़े। यूपी में 4 सह-प्रभारी भी नियुक्त किए गए। जगदीश पटेल, मेधा कुलकर्णी, डॉ. प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा बने सह-प्रभारी। पंजाब के प्रभारी डॉ. सतीश पूनिया, सह-प्रभारी अलका गुर्जर बनीं। राजस्थान के प्रभारी संजय भाटिया बनाए गए। राजस्थान में कविता पाटीदार और कुलजीत चहल सह-प्रभारी बने। महाराष्ट्र के प्रभारी बैजयंत जय पांडा बनाए गए। महाराष्ट्र में अमित मालवीय, सदानंद शेट तनावाडे और कमलजीत सहरावत सह-प्रभारी। बिहार के प्रभारी हरीश द्विवेदी, संगीता यादव और रोहन गुप्ता सह-प्रभारी। छत्तीसगढ़ की प्रभारी स्मृति ईरानी, सिद्धार्थ शम्भू सह-प्रभारी बनाए गए। विधानसभा चुनाव से पहले BJP ने राज्यों के प्रभारियों और सह-प्रभारियों की नई टीम तय की। लखनऊ। राज्यसभा चुनाव के बाद बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा फिर खतरे में पड़ जाएगा। बसपा की स्थापना वर्ष 1984 में कांशीराम ने की थी। पार्टी को वर्ष 1997 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था। हालांकि चुनाव आयोग ने पिछले साल बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बरकरार रखा था। अब अगले वर्ष होने वाले यूपी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बसपा के राष्ट्रीय पार्टी होने का भविष्य तय कर सकते हैं। मौसम का हाल : यूपी-बिहार से बंगाल तक बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की चेतावनी; ओडिशा, आंध्र-तेलंगाना में स्कूल बंद। बंगाल की खाड़ी का डिप्रेशन डीप डिप्रेशन में बदल गया है और 23 सितंबर की रात उत्तर आंध्र प्रदेश-दक्षिण ओडिशा तट को पार कर सकता है। ओडिशा में भारी बारिश के चलते ODRAF टीमें तैनात की गई हैं। समुद्र में मछुआरों के जाने पर रोक और पुरी में समुद्र स्नान पर प्रतिबंध लगाया गया है। वहीं तेलंगाना के कई जिलों में 23-24 सितंबर को बेहद भारी बारिश का अलर्ट है। लखनऊ। सीएम आज करेंगे भारत टैक्सी योजना का शुभारंभ। मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना का भी शुभारंभ। CM आवास पर सुबह 9:30 बजे से कार्यक्रम। लखनऊ में होगा भारत टैक्सी योजना का शुभारंभ। कृषक समृद्धि योजना के ई-पोर्टल की लॉन्चिंग। भारत टैक्सी योजना में यात्रियों को मिलेंगी सुविधाएं। कृषक समृद्धि योजना में 6% प्रभावी ब्याज दर। किसानों को 6 लाख तक ऋण का प्रावधान। 5 साल में 5 लाख किसानों को लाभ का लक्ष्य। पात्र किसानों के लिए 384 करोड़ की योजना। गोरखपुर। सीएम योगी आदित्यनाथ आज गोरखपुर आएंगे। राजकीय महिला शरणालय का करेंगे लोकार्पण। कोविड प्रभावित बच्चों को लैपटॉप करेंगे वितरित। सीएम बाल सेवा योजना के लाभार्थियों को लैपटॉप। गोरखपुर के चरगांवा में 3.30 बजे होगा कार्यक्रम। कार्यक्रम में लाभार्थियों को बांटे जाएंगे लैपटॉप। लखनऊ। बसपा के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक आज। मायावती की अध्यक्षता में होगी राष्ट्रीय बैठक। आज BSP मुख्यालय में 11 बजे होगी बैठक। यूपी, उत्तराखंड, पंजाब चुनाव पर होगा मंथन। New Delhi... सहारनपुर PNB करेंसी चेस्ट मामले में कार्रवाई। मामले में NIA ने नितु को गिरफ्तार किया। उत्तराखंड के हरिद्वार का निवासी नितु। गिरफ्तार आरोपी आदेश चौधरी का करीबी सहयोगी। मामले में अब तक 4 लोगों की हुई है गिरफ्तारी। अमित कुमार, आदेश चौधरी, मुकेश कुमार, राजेंद्र अरेस्ट। अन्य आरोपियों की तलाश में जांच जारी- NIA... लखनऊ। 11वें आयुर्वेद दिवस पर आज होंगे विभिन्न कार्यक्रम। इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में होगा कार्यक्रम का शुभारंभ। सुबह 11 बजे मरकरी हॉल में होगा आयोजन। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य होंगे मुख्य अतिथि। आयुष राज्यमंत्री दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ की मौजूदगी। आयुर्वेद दिवस की थीम-स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद। जनपदों और चिकित्सकों को सम्मानित किया जाएगा। New Delhi... नेशनल हेराल्ड केस मामले से जुड़ी खबर। सोनिया-राहुल का दिल्ली HC में ED पर जवाब। ED के केस को “कानून का दुरुपयोग” बताया। कहा यह देश का ऐसा ED मामला है। ‘जो प्राइवेट शिकायत के आधार पर दर्ज हुआ। ED की रिविजन याचिका खारिज करने की मांग। आजमगढ़ में बच्चों को बंधक बनाने वाला आरोपी पुलिस मुठभेड़ में घायल। बेटे को गोली मारने पर पुलिस ने की जवाबी कार्रवाई, सभी बच्चे सुरक्षित। लखनऊ: BJP ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रभारियों की लिस्ट जारी की। उत्तर प्रदेश के प्रभारी बनाए गए विनोद तावड़े। यूपी में 4 सह-प्रभारी भी नियुक्त किए गए। जगदीश पटेल, मेधा कुलकर्णी, डॉ. प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा बने सह-प्रभारी। पंजाब के प्रभारी डॉ. सतीश पूनिया, सह-प्रभारी अलका गुर्जर बनीं। राजस्थान के प्रभारी संजय भाटिया बनाए गए। राजस्थान में कविता पाटीदार और कुलजीत चहल सह-प्रभारी बने। महाराष्ट्र के प्रभारी बैजयंत जय पांडा बनाए गए। महाराष्ट्र में अमित मालवीय, सदानंद शेट तनावाडे और कमलजीत सहरावत सह-प्रभारी। बिहार के प्रभारी हरीश द्विवेदी, संगीता यादव और रोहन गुप्ता सह-प्रभारी। छत्तीसगढ़ की प्रभारी स्मृति ईरानी, सिद्धार्थ शम्भू सह-प्रभारी बनाए गए। विधानसभा चुनाव से पहले BJP ने राज्यों के प्रभारियों और सह-प्रभारियों की नई टीम तय की। लखनऊ। राज्यसभा चुनाव के बाद बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा फिर खतरे में पड़ जाएगा। बसपा की स्थापना वर्ष 1984 में कांशीराम ने की थी। पार्टी को वर्ष 1997 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था। हालांकि चुनाव आयोग ने पिछले साल बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बरकरार रखा था। अब अगले वर्ष होने वाले यूपी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बसपा के राष्ट्रीय पार्टी होने का भविष्य तय कर सकते हैं। मौसम का हाल : यूपी-बिहार से बंगाल तक बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की चेतावनी; 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जन औषधि - क्या ये एक असफल योजना है ?

By Ankit Awasthi·24 Sept 202685
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जन औषधि - क्या ये एक असफल योजना है ?

भारत जैसे देश में जहां करोड़ों परिवारों के लिए बीमारी का सबसे बड़ा डर बीमारी से ज्यादा उसके इलाज का खर्च है, वहां सस्ती दवाओं की व्यवस्था किसी सरकारी योजना से कहीं बड़ा सामाजिक काम है।

इसी सोच के साथ प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना शुरू की गई थी—ताकि महंगी ब्रांडेड दवाओं के बजाय समान सक्रिय घटक वाली कम कीमत की generic medicines लोगों को उपलब्ध कराई जा सकें।

आज देश में 19 हजार से अधिक जन औषधि केंद्र काम कर रहे हैं और योजना के product basket में लगभग 2,100 दवाएं तथा 300 surgical items शामिल हैं। सरकार के अनुसार इन दवाओं की कीमतें कई मामलों में बाजार की branded medicines से 50 से 80 प्रतिशत तक कम हैं।

लेकिन जैसे-जैसे जन औषधि का विस्तार हुआ, एक दूसरा सवाल भी समाज में सुनाई देने लगा—

क्या सस्ती दवा उतनी ही असरदार है?

यह सवाल किसी मरीज के मन में पैदा होना अपने आप में गंभीर बात है।

क्योंकि दवा के मामले में भरोसा टूट जाए तो सस्ती कीमत भी मरीज को आकर्षित नहीं कर सकती।

सबसे पहले एक भ्रम दूर करना जरूरी है

जन औषधि की दवा को केवल इसलिए घटिया मान लेना कि वह generic है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।

Generic medicine का अर्थ “कम गुणवत्ता वाली दवा” नहीं होता। उसका अर्थ है कि दवा किसी proprietary brand name के बजाय उसके approved generic name से बेची जा रही है।

PMBI स्वयं कहता है कि जन औषधि की दवाओं की potency और therapeutic value branded medicines के बराबर है। योजना के अनुसार प्रत्येक batch को NABL-accredited laboratories में test कराया जाता है और दवाएं WHO-GMP certified manufacturers से खरीदी जाती हैं।

यानी सरकारी व्यवस्था का दावा स्पष्ट है—

दवा सस्ती है, लेकिन मानक कम नहीं हैं।

फिर सवाल यह है कि मरीजों और कई बार डॉक्टरों के बीच संदेह क्यों दिखाई देता है?

दवा की कीमत और उसकी गुणवत्ता को एक समझ लेना भी गलत है

भारत में लंबे समय से एक मनोवैज्ञानिक धारणा रही है—

महंगी दवा = अच्छी दवा।

सस्ती दवा = शायद कमजोर दवा।

यह धारणा हमेशा सही नहीं है।

एक branded medicine की कीमत में केवल active ingredient का खर्च नहीं होता। उसमें brand promotion, marketing, distribution, packaging और अन्य व्यावसायिक लागतें भी शामिल हो सकती हैं।

इसीलिए एक ही active ingredient वाली दो दवाओं की कीमतों में बड़ा अंतर होना अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि महंगी वाली ज्यादा असरदार है।

2026 में प्रकाशित एक स्वतंत्र comparative study में 22 medicine types और 8 therapeutic categories की 131 samples की जांच की गई। अध्ययन में generic medicines औसतन branded equivalents से 48.6 प्रतिशत सस्ती मिलीं और अध्ययनकर्ताओं ने परीक्षण किए गए generics को pharmaceutical equivalent पाया। इसी अध्ययन में Jan Aushadhi outlets कई medicine categories में सबसे कम कीमत वाले विकल्प पाए गए।

इस तरह उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य यह नहीं कहते कि “generic मतलब बेअसर।”

लेकिन कहानी यहीं खत्म भी नहीं होती।

क्योंकि हर generic को एक ही कसौटी से देखना पर्याप्त नहीं

Generic दवा का उद्देश्य branded medicine के समान therapeutic effect देना है, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए manufacturing quality, active ingredient की मात्रा, dissolution, stability, bioequivalence और storage जैसे कई स्तर महत्वपूर्ण हैं।

और यहां स्वतंत्र research के परिणाम हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं।

उदाहरण के लिए भारत में प्रकाशित एक छोटे bioequivalence अध्ययन में generic और branded amoxicillin के बीच अपेक्षित bioequivalence नहीं मिली। लेकिन यह अध्ययन केवल 12 स्वस्थ volunteers पर था और एक विशेष दवा formulation से संबंधित था। इसलिए इससे यह निष्कर्ष निकालना भी गलत होगा कि भारत की सभी generic medicines या जन औषधि की सभी दवाएं बेअसर हैं।

यही वैज्ञानिक ईमानदारी है।

एक खराब sample से पूरी व्यवस्था को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन एक खराब sample को देखकर जांच की जरूरत को भी नकारा नहीं जा सकता।

असली सवाल है—सरकार अपना quality assurance जनता को दिखाती कितनी है?

जन औषधि की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम कीमत है।

लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था में कम कीमत के साथ विश्वास की सार्वजनिक गारंटी भी होनी चाहिए।

सरकार कहती है कि हर batch NABL-approved laboratories में test होता है।

बहुत अच्छी बात है।

लेकिन आम मरीज यह कैसे जान पाएगा कि उसके हाथ में मौजूद दवा किस batch की है, उसकी quality testing कब हुई, किस laboratory में हुई और उसका test result क्या था?

यहीं transparency की गुंजाइश पैदा होती है।

यदि हर महत्वपूर्ण दवा के batch-level quality testing records को आसानी से searchable बनाया जाए, complaints और adverse events का public dashboard हो, failed batches और recalls की जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध हो और मरीज QR code से दवा की basic quality information देख सके, तो generic medicines को लेकर भरोसा और मजबूत किया जा सकता है।

सरकारी व्यवस्था में complaint mechanism मौजूद है और PMBI अपनी वेबसाइट पर शिकायत के लिए toll-free number और email भी देता है।

लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में शिकायत की सुविधा होना और शिकायत के परिणाम को सार्वजनिक रूप से दिखाना—दो अलग बातें हैं।

मरीज की जेब बचाना जरूरी है, लेकिन उसकी बीमारी के साथ प्रयोग नहीं

जन औषधि का सबसे बड़ा सामाजिक उद्देश्य out-of-pocket medical expenditure कम करना है।

यह भारत जैसे देश में बेहद महत्वपूर्ण है।

कैंसर, diabetes, hypertension, heart disease जैसी chronic illnesses में मरीज को दवा महीनों नहीं बल्कि कई बार वर्षों तक लेनी पड़ती है।

अगर एक मरीज को branded medicine के बजाय समान therapeutic value वाली generic medicine आधी या उससे भी कम कीमत में मिल जाए तो परिवार की आर्थिक स्थिति पर उसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

एक अध्ययन में Jan Aushadhi generic antidiabetic medicines को अधिकांश अध्ययन किए गए मरीजों में cost-effective पाया गया और branded medicines की अधिक कीमत को उनकी effectiveness के अनुपात में उचित नहीं पाया गया।

इसलिए जन औषधि को खारिज करना केवल इसलिए उचित नहीं होगा कि वह सस्ती है।

लेकिन दूसरी तरफ मरीज की शिकायत को भी यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि “सरकारी दवा है, इसलिए अच्छी ही होगी।”

दवा की गुणवत्ता राजनीतिक विश्वास से नहीं, वैज्ञानिक परीक्षण से तय होनी चाहिए।

डॉक्टरों का भरोसा भी उतना ही जरूरी

जन औषधि की सफलता केवल दुकानों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए।

अगर मरीज डॉक्टर के पास जाता है और डॉक्टर branded medicine लिखता है, फिर मरीज जन औषधि केंद्र से उसी molecule की generic medicine लेता है, तो मरीज के मन में कई सवाल उठ सकते हैं—

क्या दोनों वास्तव में समान हैं?

क्या dose वही है?

क्या absorption वही होगा?

क्या formulation में फर्क है?

क्या मेरी बीमारी में substitution उचित है?

इन सवालों का स्पष्ट उत्तर pharmacist और doctor को देना चाहिए।

जन औषधि की सफलता के लिए जरूरी है कि doctors, pharmacists और patients तीनों को generic medicines के बारे में पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारी मिले।

क्योंकि सस्ती दवा का सबसे बड़ा प्रचार विज्ञापन नहीं, डॉक्टर का भरोसा होगा।

यहां सरकार को एक कदम आगे जाना चाहिए

अगर सरकार वास्तव में यह चाहती है कि भारत में generic medicines को branded medicines का विश्वसनीय विकल्प माना जाए, तो उसे केवल “हमारी दवा अच्छी है” कहने से आगे जाना चाहिए।

क्यों न जन औषधि के लिए एक सार्वजनिक Quality Transparency Portal बनाया जाए?

हर दवा के लिए—

  • manufacturer का नाम,

  • batch number,

  • manufacturing date,

  • expiry date,

  • quality testing laboratory,

  • test date,

  • relevant quality parameters,

  • failed batch/recall history,

  • patient complaint data

जैसी जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है।

इससे सरकार की जिम्मेदारी बढ़ेगी, लेकिन जनता का भरोसा भी बढ़ेगा।

और यही किसी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना की वास्तविक परीक्षा है।

जन औषधि केंद्र की समस्या सिर्फ दवा की गुणवत्ता नहीं

कई बार मरीज को जिस दवा की जरूरत है वह केंद्र पर उपलब्ध ही नहीं होती।

सरकारी योजना के लिए availability भी quality जितनी महत्वपूर्ण है।

एक गरीब मरीज डॉक्टर से prescription लेकर जन औषधि केंद्र पहुंचा और उसे दवा नहीं मिली, तो उसके सामने दो विकल्प बचते हैं—दूसरी दुकान से महंगी दवा खरीदना या उपचार टालना।

इसलिए जन औषधि का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितने केंद्र खुल गए।

पूछना चाहिए—

कितने केंद्रों पर prescribed medicines नियमित रूप से उपलब्ध हैं?

कितने केंद्रों पर प्रशिक्षित pharmacist मौजूद है?

कितनी शिकायतों का समाधान हुआ?

कितने batches reject हुए?

कितने adverse drug reactions report हुए?

कितनी बार stock-out हुआ?

इन सवालों के सार्वजनिक आंकड़े योजना की वास्तविक तस्वीर ज्यादा साफ दिखाएंगे।

सस्ती दवा गरीब की मजबूरी नहीं, अधिकार होनी चाहिए

भारत में healthcare का एक बड़ा संकट यह है कि गरीब आदमी बीमारी से पहले उसके खर्च से डरता है।

वह डॉक्टर के पास देर से जाता है।

दवा आधी लेता है।

कई बार prescription में लिखी महंगी दवा खरीदने की क्षमता नहीं होती।

फिर बीमारी गंभीर होती है और खर्च और बढ़ जाता है।

जन औषधि इस चक्र को तोड़ सकती है।

लेकिन इसके लिए समाज को generic medicine को “गरीबों की दवा” कहकर छोटा करना बंद करना होगा।

अगर वही molecule, वही therapeutic objective और विश्वसनीय quality assurance उपलब्ध है तो दवा का चुनाव केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसका packet कितना चमकदार है।

स्वास्थ्य बाजार में ब्रांड की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण molecule की गुणवत्ता है।

सवाल जन औषधि का नहीं, भरोसे का है

जन औषधि की दवाएं बेअसर हैं—यह एक व्यापक तथ्य के रूप में उपलब्ध साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होता।

उलटे सरकारी quality-control व्यवस्था और हालिया स्वतंत्र comparative research ऐसे evidence देते हैं जो quality-assured generics के पक्ष में जाते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए।

दवा ऐसी वस्तु नहीं है जिसमें जनता से कहा जाए—

“हमने जांच कर ली है, आप बस भरोसा कीजिए।”

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भरोसा भी evidence के साथ बनना चाहिए।

जन औषधि केंद्रों की संख्या बढ़ाना अच्छी शुरुआत है।

सस्ती दवा उपलब्ध कराना उससे भी जरूरी कदम है।

लेकिन अगला चरण होना चाहिए—

सस्ती + गुणवत्तापूर्ण + उपलब्ध + पारदर्शी + चिकित्सकीय रूप से विश्वसनीय दवा।

क्योंकि गरीब आदमी को सस्ती दवा चाहिए, लेकिन सस्ती होने के कारण कम भरोसे वाली दवा नहीं।

उसे वही चीज चाहिए जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत एक मरीज को होती है—

दवा सस्ती हो सकती है, लेकिन उसके असर पर उसका भरोसा महंगा नहीं होना चाहिए।

लेखक के बारे में

Ankit Awasthi

श्री अवस्थी स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं कंटेंट राइटर हैं। पिछले करीब छह वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय श्री अवस्थी ने न्यूज़ट्रैक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया है। समाचार एवं फीचर लेखन के अलावा डिजिटल कंटेंट, SEO और ऑनलाइन मीडिया प्रोडक्शन में भी उनका अनुभव रहा है। राजनीति विज्ञान में परास्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा MBA (IT) की शिक्षा प्राप्त श्री अवस्थी की विशेष रुचि समसामयिक राजनीति, सामाजिक बदलाव, शासन-व्यवस्था और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर तथ्यपरक एवं खोजपरक लेखन में है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों के माध्यम से किसी विषय की बारीक पड़ताल कर उसके विभिन्न पहलुओं को सामने लाना उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। श्री अवस्थी एक पुस्तक के लेखक भी हैं और लेखन के माध्यम से समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को समझने और उन पर विमर्श विकसित करने में सक्रिय हैं। पत्रकारिता के साथ डिजिटल मार्केटिंग, वेब कंटेंट और लीड जनरेशन के क्षेत्र में भी उन्होंने कार्य किया है। काम के अलावा उन्हें अध्ययन, संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनसे ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। Ankit Awasthi की सभी खबरें देखें

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