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NEP. और Skill India: किताबों में बदलता भारत और रोजगार की जमीन का सवाल

Published By Ankit Awasthi·16 Sept 2026 05:41 PM (IST)
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NEP. और Skill India: किताबों में बदलता भारत और रोजगार की जमीन का सवाल

भारत की शिक्षा व्यवस्था इस समय केवल पाठ्यक्रम बदलने के दौर से नहीं गुजर रही है। असली बदलाव इससे कहीं बड़ा है—यह तय करने की प्रक्रिया चल रही है कि आने वाली पीढ़ी भारत को किस नजर से देखेगी और बदलते भारत में अपनी जगह किस तरह बनाएगी। नई शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय भाषाओं, भारतीय ज्ञान परंपराओं, बहुविषयक शिक्षा, आलोचनात्मक चिंतन और कौशल आधारित सीखने पर जोर दिया है। सरकार ने इसके बाद पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों में सांस्कृतिक rootedness तथा Indian Knowledge Systems को शामिल करने की दिशा में काम आगे बढ़ाया है। स्वयं शिक्षा मंत्रालय के अनुसार NEP की तैयारी में राज्यों, शिक्षा विशेषज्ञों, सांसदों और अन्य हितधारकों से व्यापक परामर्श हुआ था और करीब दो लाख सुझाव प्राप्त हुए थे, जिसके बाद नीति को 29 जुलाई 2020 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी।

इसीलिए NEP को सीधे किसी एक संगठन की नीति बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। RSS की भूमिका पर बहस का अधिक सटीक सवाल यह है कि क्या RSS से जुड़े शिक्षा संगठनों और विचारों की शिक्षा नीति तथा पाठ्यक्रम निर्माण में भूमिका या प्रभाव बढ़ा है, और यदि बढ़ा है तो उसका स्वरूप क्या है? RSS से जुड़े शिक्षा संगठनों की शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रियता रही है। दूसरी ओर, अगस्त 2026 में कक्षा 11 और 12 की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के लिए गठित NCERT की 20 सदस्यीय समिति में चार सदस्यों के RSS से संबंध होने की मीडिया रिपोर्ट सामने आई। यह तथ्य अपने आप में न तो पाठ्यपुस्तक को पक्षपाती साबित करता है और न ही यह प्रमाणित करता है कि समिति का पूरा काम किसी एक संगठन के निर्देश पर हो रहा है। असली कसौटी अभी किताब की सामग्री, विशेषज्ञों के चयन की विविधता, स्रोतों का इस्तेमाल और विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई गई आलोचनात्मक दृष्टि होगी।

यही सावधानी इस बहस को ज्यादा गंभीर बनाती है। भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में जगह देने पर आपत्ति अपने आप में कोई तार्किक निष्कर्ष नहीं हो सकती। भारत की बौद्धिक विरासत बहुत विस्तृत है—वेदांत, बौद्ध और जैन दर्शन, भक्ति और सूफी परंपराएं, लोक और आदिवासी ज्ञान, शास्त्रीय भाषाएं, आधुनिक विज्ञान, सामाजिक सुधार आंदोलनों और संविधान की आधुनिक लोकतांत्रिक दृष्टि तक। स्वयं NEP में भारतीय भाषाओं और पारंपरिक तथा स्थानीय ज्ञान के संरक्षण की बात है, साथ ही नीति आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान और inquiry-based learning को भी महत्व देती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि पाठ्यक्रम में भारतीयता क्यों आई; प्रश्न यह होना चाहिए कि भारतीयता को परिभाषित करते समय भारत की विविधता कितनी दिखाई देती है।

किसी व्यक्ति का RSS या ABVP से जुड़ा होना भी अपने आप में उसके अकादमिक काम को पक्षपाती सिद्ध नहीं करता। उसी तरह किसी विशेषज्ञ का किसी दूसरे वैचारिक समूह से जुड़ा होना उसे अपने आप निष्पक्ष नहीं बना देता। शिक्षा व्यवस्था में असली कसौटी इससे आगे है—क्या अलग-अलग दृष्टिकोणों को जगह मिलती है, क्या विवादित ऐतिहासिक प्रश्नों के कई पक्ष विद्यार्थियों के सामने रखे जाते हैं, क्या तथ्य और व्याख्या के बीच अंतर समझाया जाता है और क्या विद्यार्थी शिक्षक या किताब द्वारा दिए गए निष्कर्ष से असहमत होने की बौद्धिक स्वतंत्रता रखता है। राजनीति विज्ञान की किताब में यही बात और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वहां लोकतंत्र, संविधान, सत्ता, नागरिक अधिकार, असहमति और राजनीतिक विचारों का अध्ययन होता है।

यहीं भविष्य का वह कोण सामने आता है जिसे नजरअंदाज करना आसान है। खतरा यह नहीं कि किसी एक दिन अचानक शिक्षा व्यवस्था किसी एक संगठन के हाथ में चली जाएगी। ज्यादा वास्तविक चिंता यह है कि यदि लंबे समय तक पाठ्यक्रम तैयार करने वाली संस्थाओं में वैचारिक विविधता घटती गई और किसी एक दृष्टिकोण की उपस्थिति लगातार बढ़ती गई, तो आने वाली पीढ़ी को इतिहास और समाज को देखने के लिए उपलब्ध खिड़कियां भी धीरे-धीरे कम हो सकती हैं। दूसरी तरफ यदि हर सरकार सत्ता में आने के बाद पाठ्यपुस्तकों को अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के अनुसार बदलने लगे, तो शिक्षा ज्ञान का स्थिर आधार बनने के बजाय राजनीतिक संघर्ष का मैदान बन सकती है। दोनों स्थितियों में नुकसान विद्यार्थी का है। क्योंकि लोकतांत्रिक शिक्षा का लक्ष्य यह नहीं कि बच्चे को बताया जाए कि क्या सोचना है, बल्कि यह है कि उसे इतना सक्षम बनाया जाए कि वह किसी भी विचार के बारे में खुद सोच सके।

लेकिन भारत की शिक्षा की कहानी केवल किताबों की कहानी नहीं है। इसका दूसरा और कहीं अधिक कठोर पक्ष रोजगार है। अगर हम नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास, संस्कृति, ज्ञान परंपरा और आधुनिक भारत की नई कल्पना से परिचित करा रहे हैं, तो उसी पीढ़ी को बदलती अर्थव्यवस्था में अपने लिए जगह बनाने की क्षमता भी देनी होगी। यहीं Skill India का सवाल सामने आता है।

2015 में शुरू हुई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और व्यापक Skill India Mission ने बड़े पैमाने पर युवाओं को प्रशिक्षण और प्रमाणन देने की कोशिश की। PMKVY के चार चरणों में व्यवस्था धीरे-धीरे short-term certification से demand-driven और industry-linked skilling की दिशा में बदली है। सरकार के अनुसार मार्च 2026 तक PMKVY 4.0 में 27 लाख से अधिक उम्मीदवार प्रशिक्षित किए जा चुके थे और AI, robotics, drones, green jobs तथा Industry 4.0 जैसे क्षेत्रों में नए job roles जोड़े गए थे। सरकार का दावा है कि मौजूदा चरण में जिला स्तर पर skill-gap और industry demand को ध्यान में रखने की कोशिश भी की जा रही है।

लेकिन यहीं आंकड़ों का दूसरा पक्ष भी सामने आता है। CAG की PMKVY पर 2025 की performance audit में पहले तीन चरणों के STT/SP components के 56.14 लाख certified candidates में 23.18 लाख placed candidates दर्ज किए गए—कुल मिलाकर 41.29 प्रतिशत। PMKVY 1.0 में यह अनुपात 16.74 प्रतिशत, PMKVY 2.0 में 51.08 प्रतिशत और PMKVY 3.0 में 13.47 प्रतिशत रहा। CAG ने कुछ राज्यों में employer mapping, industry requirements और employment strategy से जुड़ी कमियां भी दर्ज कीं। उत्तर प्रदेश के मामले में CAG ने केंद्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों में 12,616 placements का उल्लेख किया, जबकि राज्य की संबंधित एजेंसी के पास उनका रिकॉर्ड नहीं मिला।

इन आंकड़ों के आधार पर पूरी Skill India योजना को “फेल” घोषित करना भी सही नहीं होगा। सरकार के 2026 के एक स्वतंत्र third-party evaluation के अनुसार PMKVY 4.0 के STT respondents में employed और self-employed लोगों का संयुक्त हिस्सा प्रशिक्षण से पहले 26.6 प्रतिशत से बढ़कर प्रशिक्षण के बाद 45.4 प्रतिशत हुआ। 41.4 प्रतिशत STT और 48.9 प्रतिशत RPL respondents ने प्रशिक्षण और certification के बाद आय बढ़ने की जानकारी दी। यह सर्वेक्षण आधारित impact assessment है, इसलिए इसे पूरे देश के हर प्रशिक्षित युवा की नौकरी का प्रतिशत नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे इतना जरूर पता चलता है कि नई व्यवस्था में कुछ रोजगार और आय संबंधी परिणाम बेहतर हुए हैं।

इसलिए असली समस्या “Skill India सफल या असफल” जैसे दो शब्दों में बंद नहीं होती। असली सवाल है कि कौशल प्रशिक्षण को रोजगार में बदलने की क्षमता कितनी है। किसी युवा को तीन महीने का certificate देना और उसे ऐसी नौकरी दिलाना जिसमें उसकी आय, काम की स्थिरता और आगे बढ़ने की संभावना हो—दो अलग चीजें हैं। भारत के लिए दूसरी चीज ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि certificate बेरोजगारी का स्थायी समाधान नहीं है; बाजार में उपयोगी कौशल, उद्योग की मांग, apprenticeship, नौकरी की गुणवत्ता और career progression का पूरा ecosystem ही वास्तविक रोजगार बनाता है।

यहीं NEP और Skill India एक-दूसरे से जुड़ते हैं। शिक्षा व्यवस्था यदि केवल यह तय करने में व्यस्त हो जाए कि युवा अपनी सांस्कृतिक पहचान को कैसे समझे, लेकिन उसे यह न सिखा पाए कि AI, automation, नई तकनीक और बदलते labour market में अपनी क्षमता कैसे बढ़ानी है, तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी। दूसरी तरफ अगर skill policy युवाओं को केवल market-ready worker बनाने तक सीमित कर दे और उन्हें इतिहास, संविधान, समाज, संस्कृति तथा आलोचनात्मक चिंतन से काट दे, तो वह भी अधूरी होगी। देश को केवल employable युवा नहीं चाहिए; उसे सोचने वाला employable नागरिक चाहिए।

यही वह जगह है जहां आने वाले दशक का सबसे दिलचस्प विरोधाभास पैदा हो सकता है। एक तरफ किताबों में आत्मनिर्भर भारत, भारतीय ज्ञान और सांस्कृतिक जड़ों की चर्चा बढ़े और दूसरी तरफ वही युवा अस्थायी काम, gig economy, कम वेतन और नौकरी की अनिश्चितता से जूझता रहे। एक तरफ उसे बताया जाए कि भारत ज्ञान और तकनीक में वैश्विक शक्ति बन रहा है, दूसरी तरफ उसे अपनी qualification के अनुरूप अवसर पाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़े। तब सवाल केवल शिक्षा मंत्रालय या Skill Development Ministry का नहीं रहेगा; सवाल यह होगा कि क्या भारत की education policy और employment policy एक ही दिशा में चल रही हैं?

भविष्य की चिंता इसी स्तर पर ज्यादा गंभीर हो जाती है। यदि पाठ्यक्रम में वैचारिक विविधता धीरे-धीरे कम हुई और कौशल कार्यक्रमों में enrolment तथा certification रोजगार की तुलना में बड़ा सफलता-मापदंड बन गए, तो हमारे पास एक ऐसी पीढ़ी पैदा होने का जोखिम होगा जिसके पास प्रमाणपत्र बहुत होंगे लेकिन स्वतंत्र विचार और आर्थिक अवसर के बीच जरूरी संतुलन कम होगा। वह अपने अतीत के बारे में बहुत कुछ जान सकती है, लेकिन अपने भविष्य को बनाने के लिए जरूरी संस्थागत और आर्थिक अवसर उसके पास उतने नहीं होंगे। यह कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि नीति-निर्माण के सामने मौजूद एक संभावित जोखिम है।

इसका समाधान भी किसी एक विचारधारा को हटाकर दूसरी विचारधारा स्थापित करना नहीं है। समाधान ज्यादा कठिन लेकिन ज्यादा लोकतांत्रिक है—भारतीय ज्ञान परंपरा को पढ़ाया जाए, लेकिन उसके भीतर की विविधता के साथ; RSS से जुड़े विशेषज्ञ हों तो उनके साथ अन्य वैचारिक और अकादमिक पृष्ठभूमि के विशेषज्ञ भी हों; इतिहास में उपलब्धियां हों तो आलोचनाएं भी हों; संस्कृति हो तो संविधान भी हो; परंपरा हो तो वैज्ञानिक पद्धति भी हो; और कौशल प्रशिक्षण हो तो उसके साथ वास्तविक उद्योग मांग, apprenticeship, placement, wages और long-term career outcomes की भी निगरानी हो। स्वयं सरकार PMKVY 4.0 को demand-driven, industry-aligned और outcome-oriented बनाने की दिशा में बदलाव के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

आखिरकार शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य यह तय करना नहीं है कि बच्चे को भारत के बारे में कौन-सा विचार स्वीकार करना चाहिए। उसका उद्देश्य यह है कि बच्चा भारत के बारे में अलग-अलग विचारों को पढ़े, उनके प्रमाण और तर्क को समझे और फिर अपना निष्कर्ष स्वयं बना सके। उसी तरह कौशल नीति का उद्देश्य केवल यह नहीं कि कितने युवाओं ने प्रशिक्षण पूरा किया; असली सवाल यह है कि प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं की आर्थिक स्थिति बदली, कितनों को टिकाऊ काम मिला और कितने बदलती अर्थव्यवस्था के साथ खुद को फिर से प्रशिक्षित कर पाए।

भारत को ऐसी शिक्षा चाहिए जिसमें पहचान हो लेकिन पहचान के भीतर विविधता भी हो; परंपरा हो लेकिन उसके साथ प्रश्न पूछने की आजादी भी हो; विज्ञान हो लेकिन जिज्ञासा भी हो; कौशल हो लेकिन उसके इस्तेमाल के अवसर भी हों। क्योंकि आने वाले भारत की असली परीक्षा इस बात से नहीं होगी कि उसकी किताबों में किस विचार की जीत हुई। असली परीक्षा यह होगी कि उन किताबों से निकलने वाला युवा कितना स्वतंत्र होकर सोच सकता है, कितना सक्षम होकर काम कर सकता है और कितनी स्वतंत्रता से अपना भविष्य बना सकता है।

और शायद NEP, RSS की भूमिका तथा Skill India को एक साथ देखने की यही सबसे जरूरी कसौटी है—भारत अपने बच्चों को केवल एक कहानी सुना रहा है, या उन्हें इतनी समझ और क्षमता भी दे रहा है कि वे आगे चलकर उस कहानी को खुद लिख सकें।

लेखक के बारे में

Ankit Awasthi

श्री अवस्थी स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं कंटेंट राइटर हैं। पिछले करीब छह वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय श्री अवस्थी ने न्यूज़ट्रैक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया है। समाचार एवं फीचर लेखन के अलावा डिजिटल कंटेंट, SEO और ऑनलाइन मीडिया प्रोडक्शन में भी उनका अनुभव रहा है। राजनीति विज्ञान में परास्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा MBA (IT) की शिक्षा प्राप्त श्री अवस्थी की विशेष रुचि समसामयिक राजनीति, सामाजिक बदलाव, शासन-व्यवस्था और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर तथ्यपरक एवं खोजपरक लेखन में है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों के माध्यम से किसी विषय की बारीक पड़ताल कर उसके विभिन्न पहलुओं को सामने लाना उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। श्री अवस्थी एक पुस्तक के लेखक भी हैं और लेखन के माध्यम से समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को समझने और उन पर विमर्श विकसित करने में सक्रिय हैं। पत्रकारिता के साथ डिजिटल मार्केटिंग, वेब कंटेंट और लीड जनरेशन के क्षेत्र में भी उन्होंने कार्य किया है। काम के अलावा उन्हें अध्ययन, संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनसे ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। Ankit Awasthi की सभी खबरें देखें →

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