SIR पूरा होने के बाद भी वोटर लिस्ट में जुड़ सकता है नाम, सुप्रीम कोर्ट की दोटूक- मतदाता सूची फ्रीज नहीं होती

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने कहा है कि SIR की प्रक्रिया पूरी हो जाने का यह मतलब नहीं है कि मतदाता सूची हमेशा के लिए बंद या फ्रीज हो गई। पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है। यानी जिन लोगों का नाम सूची से छूट गया है या हट गया है, उनके पास नियमानुसार दोबारा नाम जुड़वाने का रास्ता खुला रहेगा।
शुक्रवार, 30 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश, केरल और छत्तीसगढ़ में SIR से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी की। अदालत की इस बात से उन मतदाताओं की चिंता कम हो सकती है, जिन्हें आशंका थी कि SIR पूरा होने के बाद उनका नाम दोबारा सूची में शामिल नहीं हो पाएगा।
समय सीमा बढ़ाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से SIR की समय सीमा बढ़ाने की मांग की गई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि नाम जोड़ने की प्रक्रिया लगातार चलती है और चुनाव में नामांकन दाखिल करने तक पात्र मतदाताओं के नाम शामिल किए जा सकते हैं।
इसका अर्थ यह है कि SIR की निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का वैधानिक रास्ता बंद नहीं होता। हालांकि, इसके लिए संबंधित व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया और पात्रता संबंधी शर्तों का पालन करना होगा।
यूपी में फॉर्म-7 के थोक इस्तेमाल पर चुनाव आयोग ने मानी चूक
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल का मुद्दा भी उठा। चुनाव आयोग ने स्वीकार किया कि राज्य में कुछ अधिकारियों की ओर से फॉर्म-7 स्वीकार करने में चूक हुई थी।
आयोग ने अदालत को बताया कि इस मामले में सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित गड़बड़ियों का विवरण चुनाव आयोग के सामने रखने की अनुमति भी दी, ताकि उनकी जांच की जा सके।
फॉर्म-7 का इस्तेमाल किसी मतदाता का नाम हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। इसलिए इसके गलत या सामूहिक इस्तेमाल से पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।

केरल में 24 लाख मतदाताओं के नाम छूटने का दावा
सुनवाई में केरल का मुद्दा भी उठा। माकपा की ओर से अदालत को बताया गया कि SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद करीब 24 लाख मतदाता सूची से बाहर रह गए हैं। पार्टी की ओर से यह भी कहा गया कि कुछ लोग समय की कमी के कारण गणना फॉर्म जमा नहीं कर सके।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्ष से ऐसे मतदाताओं का विवरण उपलब्ध कराने को कहा, ताकि चुनाव आयोग उनकी स्थिति की जांच कर सके और आवश्यक सुधारात्मक कदमों पर विचार करे।
एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से भी केरल में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब मांगे जाने की मांग की गई। अदालत ने इस संबंध में आयोग से जवाब देने को कहा।
मतदाताओं के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सीधा संदेश है कि SIR पूरा होना मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया का अंत नहीं है। यदि कोई पात्र नागरिक सूची में शामिल नहीं हो पाया है या उसका नाम हट गया है, तो वह संबंधित चुनावी नियमों के तहत आवेदन कर सकता है।
नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए सामान्यतः फॉर्म-6 का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, पहले से दर्ज नाम में पता या अन्य विवरण बदलने के लिए फॉर्म-8 का प्रावधान है। नाम हटाने से जुड़ी आपत्ति के लिए फॉर्म-7 इस्तेमाल होता है।
हालांकि, केवल आवेदन कर देने से नाम अपने आप सूची में शामिल नहीं हो जाता। चुनावी पंजीकरण अधिकारी पात्रता और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच के बाद नियमानुसार निर्णय लेते हैं।
लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता के साथ समावेशन भी जरूरी
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद दोहराव, गलत प्रविष्टियों तथा अपात्र नामों की पहचान करना है। लेकिन इस प्रक्रिया में कोई पात्र नागरिक छूट न जाए, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी इसी पहलू को रेखांकित करती है। अदालत ने एक तरफ तय समय सीमा को बढ़ाने से इनकार किया, वहीं दूसरी तरफ स्पष्ट किया कि पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। अब उत्तर प्रदेश, केरल और अन्य संबंधित राज्यों में चुनाव आयोग की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर नजर रहेगी।
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