गोमती पुस्तक महोत्सव में पार्थ सारथी सेन शर्मा का साहित्यिक अंदाज, बोले- लखनऊ की बदलती तस्वीर को उपन्यास में समेटने की इच्छा

लखनऊ। गोमती पुस्तक महोत्सव के तीसरे सत्र में अपर मुख्य सचिव, बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा पार्थ सारथी सेन शर्मा ने ‘अनुभव, विचार और संवाद’ विषय पर विशेष संवाद में अपनी साहित्यिक यात्रा, लेखन अनुभव और जीवन से जुड़े कई पहलुओं को साझा किया। सत्र का समन्वय चंद्रशेखर वर्मा ने किया।
प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ साहित्य और लेखन में सक्रिय सेन शर्मा के रचनात्मक पक्ष ने संवाद को खास बना दिया। कार्यक्रम में उनकी चर्चित पुस्तकों ‘लव इन लखनऊ’, ‘अंडमान-अंडमानुष सफर का उपन्यासनामा’, ‘लव साइड बाय साइड’, ‘द विकसित भारत क्विज’, ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘मुसाफिर हूं यारो’, ‘लखनऊ डायरीज’ और ‘एक कदम हजार अफसाने’ पर चर्चा हुई। उन्होंने इन रचनाओं की पृष्ठभूमि, लेखन के अनुभव और साहित्य के प्रति अपने दृष्टिकोण को श्रोताओं के साथ साझा किया।
1916 से 2026 तक के लखनऊ को उपन्यास में पिरोने की इच्छा
लखनऊ के बदलते स्वरूप पर चर्चा करते हुए सेन शर्मा ने कहा कि शहर अपने भीतर कई सदियों का इतिहास, संस्कृति और सामाजिक बदलाव समेटे हुए है। करीब दो दशक पहले का लखनऊ और आज का लखनऊ रहन-सहन तथा सामाजिक परिवेश के लिहाज से काफी अलग है।
उन्होंने भविष्य में लखनऊ को केंद्र में रखकर एक ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की इच्छा जताई। प्रस्तावित रचना में वर्ष 1916 से 2026 तक के लखनऊ की यात्रा को समेटने की योजना है। इसके जरिए शहर में आए सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवनशैली से जुड़े बदलावों को साहित्यिक रूप में सामने लाने की कोशिश होगी।
युवाओं को सकारात्मक सोच देने में साहित्य की अहम भूमिका
अपनी पुस्तक ‘लव इन लखनऊ’ का उल्लेख करते हुए सेन शर्मा ने बताया कि इसे खासतौर पर आज के बच्चों और युवाओं को ध्यान में रखकर लिखा गया है। उन्होंने कहा कि प्रेम संबंधों में असफलता या धोखे के बाद कई युवा भावनात्मक संकट से गुजरते हैं और कभी-कभी बेहद खतरनाक कदम उठा लेते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में साहित्य युवाओं को भावनात्मक रूप से संभालने, परिस्थितियों को समझने और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
‘अंडमान-अंडमानुष सफर का उपन्यासनामा’ पर चर्चा के दौरान उन्होंने अंडमान-निकोबार से जुड़े अपने अनुभव और कई रोचक प्रसंग भी साझा किए।
एआई के दौर में भाषा और साहित्य की मौलिकता जरूरी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव पर विचार रखते हुए सेन शर्मा ने कहा कि एआई हमेशा हमारी बातों और भावनाओं को उसी रूप में प्रस्तुत नहीं करता, जिस तरह हम उन्हें व्यक्त करना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि अपने साहित्य और समाज को सही ढंग से समझने के लिए अपनी भाषाओं को स्वयं विकसित और समृद्ध करना जरूरी है। भाषा की मौलिकता, संवेदनशीलता और साहित्यिक अभिव्यक्ति को बनाए रखना मौजूदा दौर की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
सत्र के दौरान चंद्रशेखर वर्मा के सहज और सारगर्भित सवालों ने संवाद को रोचक बनाए रखा। साहित्य, प्रशासनिक अनुभव, समकालीन विषयों और जीवन के अनुभवों के मेल से हुए इस संवाद ने श्रोताओं को पार्थ सारथी सेन शर्मा के प्रशासनिक व्यक्तित्व के साथ उनके रचनात्मक और साहित्यिक पक्ष से भी रूबरू कराया।
लेखक के बारे में
Santosh Kumar Singh
श्री सिंह ‘विजुअल लाइव’ मासिक पत्रिका एवं न्यूज पोर्टल के संपादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्ष 2004 से उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी सेवाएं देते हुए पत्रकारिता का लंबा अनुभव अर्जित किया है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, राष्ट्रीय स्वरूप और भारत प्रतिदिन सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए उन्होंने रिपोर्टिंग की है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लखनऊ आगमन से लेकर राजनीति, प्रशासन, जनसरोकार और शहर की महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। श्री सिंह की विशेष रुचि खोजी पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल में है। इंटरनेट आधारित शोध, सूचना के स्रोतों की पड़ताल और खबर की बारीकियों तक पहुंचने की उनकी कार्यशैली उन्हें अलग पहचान देती है। बदलते मीडिया परिदृश्य में वे तथ्यपरक, विश्वसनीय और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं। पत्रकारिता के साथ उन्हें संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनका मानना है कि एक पत्रकार के लिए जिज्ञासा, निरंतर सीखने की प्रवृत्ति और तथ्यों के प्रति ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। Santosh Kumar Singh की सभी खबरें देखें →
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