कथक के रंगों से सजा ‘नमन’ समारोह, दिग्गज कलाकारों ने बांधा समां

लखनऊ कथक केंद्र के नवांकुरों ने भी घुंघरुओं की झंकार से जीता दर्शकों का दिल
लखनऊ। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी और कथक केंद्र, लखनऊ की ओर से सुप्रसिद्ध कथकाचार्य पं. लच्छू महाराज की स्मृति में आयोजित दो दिवसीय पारंपरिक कथक समारोह ‘नमन : परंपरा कथक की’ का समापन मंगलवार को रंगारंग प्रस्तुतियों के साथ हुआ। गोमती नगर स्थित संत गाडगेजी महाराज प्रेक्षागृह में सजे मंच पर देश के ख्यातिलब्ध कथक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से कथक की समृद्ध परंपरा, भाव, लय और नृत्य-सौंदर्य के विविध रंग बिखेरे।
समारोह में लखनऊ कथक केंद्र के नवोदित कलाकारों की प्रस्तुतियां भी खास आकर्षण रहीं। मंच पर नन्हे कलाकारों के घुंघरुओं की झंकार और अनुशासित कदमों ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं। पूरे परिसर को सतरंगी छतरियों और फूलों से सजाया गया था, जिसने आयोजन के सांस्कृतिक माहौल को और भव्य बना दिया।
कथक के रंग कृष्ण के संग’ ने बांधा समां
दूसरे दिन की शुरुआत कथक केंद्र, लखनऊ की प्रस्तुति ‘गुरु कृपा’ से हुई। नीता जोशी के निर्देशन में सृष्टि प्रताप, अदिति जायसवाल, केसर सिंह, वैष्णवी अग्निहोत्री समेत कई नवोदित कलाकारों ने कथक की आकर्षक प्रस्तुति दी।
इसके बाद श्रुति शर्मा के निर्देशन में ‘कथक के रंग कृष्ण के संग’ प्रस्तुत किया गया। ‘फुलवा बिनत डार-डार’ बंदिश में सखियों द्वारा फूल चुनने के गत-भाव ने दर्शकों को आकर्षित किया। वहीं ‘श्याम पिया मोरे रंग दे चुनरिया’ में आत्मा के परमात्मा के रंग में रंगने का भाव चक्करों और भाव-भंगिमाओं के साथ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत हुआ। ‘रंग रंगीली छैल छबीली रसीलो नंदलाल’ में गोपियों के नटखट अंदाज ने मंच को जीवंत कर दिया।

रजनी वर्मा के निर्देशन में ‘झूला’ प्रस्तुति में कवित्त, तिहाई, टुकड़ा, परमेलू और परन के साथ राग देस एवं रूपक ताल में पं. बिंदादीन महाराज की रचना ‘झूलत राधे नवल किशोर’ पर सुंदर भाव प्रस्तुत किए गए।
डॉ. रुचि खरे ने दिखाए कथक के पारंपरिक रंग
लखनऊ की प्रतिष्ठित कथक गुरु एवं नृत्यांगना डॉ. रुचि खरे ने ध्रुपद अंग से प्रस्तुति की शुरुआत की। राग मालकौंस में निबद्ध ‘शंकर अति प्रचंड, नाचत कर डमरू बाजे’ ने वातावरण को आध्यात्मिक रंग दिया। इसके बाद ठाट, आमद, परन, गत निकास और अन्य पारंपरिक बंदिशों के माध्यम से कथक की शास्त्रीयता और तकनीकी पक्ष को दर्शाया गया।
डॉ. रुचि के साथ उनकी शिष्याओं ने भी अपनी प्रतिभा का सुंदर प्रदर्शन किया। अष्टपदी और मत्त ताल की प्रस्तुति में विलंबित एवं मध्य लय की लयकारी ने दर्शकों को विशेष रूप से प्रभावित किया। अंत में दादरा ‘कोयलिया मत कर पुकार’ ने भावनात्मक माहौल बना दिया।
देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे कलाकार
इंदौर की डॉ. सुमित्रा हरमलकर ने गणेश स्तुति से शुरुआत कर त्रिताल में ताल नर्तन प्रस्तुत किया, जिसमें रायगढ़ घराने की विशिष्ट बंदिशों की झलक देखने को मिली। सूरदास के पद पर आधारित अभिनय के साथ उनकी प्रस्तुति का समापन हुआ।
पुणे के डॉ. नंदकिशोर कपोते ने पं. बिरजू महाराज की लोकप्रिय वंदना ‘एक अनेक रूप में देखूं गोविंद गोपाल मुरारी’ से शुरुआत की। इसके बाद ‘बाजे रे मुरलिया बाजे’ में भाव पक्ष के साथ लखनऊ कथक घराने के तोड़े, टुकड़े, तिहाई, परन और परमेलू प्रस्तुत किए। अंत में तबला-घुंघरू जुगलबंदी ने खूब तालियां बटोरीं।
मेरठ की प्रो. (डॉ.) भावना ग्रोवर ने वल्लभाचार्य के नंदकुमार अष्टक से प्रस्तुति शुरू की। उन्होंने तीनताल में पारंपरिक कथक की विभिन्न बंदिशें पेश कीं। कृष्ण महारास पर आधारित कवित्त और बिंदादीन महाराज की ठुमरी ‘मेरी सुनो श्याम’ में शृंगार, वात्सल्य और भक्ति रस का प्रभावशाली चित्रण किया गया। तबला-पखावज जुगलबंदी के साथ प्रस्तुति का समापन हुआ।

मुख्य अतिथि ने बताया संगीत को मन को छूने वाली कला
मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के राज्य सूचना आयुक्त स्वतंत्र प्रकाश गुप्ता ने कहा कि संगीत पद्य और गद्य की तुलना में अधिक सूक्ष्म स्तर पर मन और चित्त को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि ‘नमन’ जैसा आयोजन पं. लच्छू महाराज की कला साधना और उनके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
अकादमी के अध्यक्ष प्रो. जयंत खोत, उपाध्यक्ष विभा सिंह और निदेशक राज कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन भारतीय शास्त्रीय कलाओं की परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने कथक के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जताई।
समारोह में भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह समेत बड़ी संख्या में कला प्रेमी और दर्शक मौजूद रहे।
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