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जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में 2 आतंकियों का एनकाउंटर, दोनों पाकिस्तानी, सुरक्षाबलों का ऑपरेशन कल से जारी; इस साल 15 आतंकी मारे जा चुके। आईफोन-18 और प्रो मैक्स पहले पाने की होड़: दिल्ली-मुंबई में एपल स्टोर के बाहर रात से ही डटे युवा, लगी लंबी कतार। ट्रम्प ने कनाडा को लेकर यूरोप को धमकी दी, कहा- EU में शामिल किया तो भारी टैरिफ लगाऊंगा, व्यापार भी रोक दूंगा। करीब तीन साल के अंतराल के बाद अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे ब्याज दरें 3.75 से 4% तक पहुंच गई हैं। फेडरल रिजर्व के इस रुख के बाद दुनियाभर के बाजारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। इसका सबसे तगड़ा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत पर बिल्कुल साफ दिखेगा। जापान में पहली बार एक लाख लोग शतायु: स्वस्थ खान-पान, सक्रिय जीवन से हो रही लंबी आयु; 100 पार में 87.6% महिलाएं। बांग्लादेश में टॉर्च की रोशनी में मरीजों का इलाज, 20 साल का सबसे बड़ा बिजली संकट; भारत पहले ही ज्यादा बिजली दे रहा, मदद मुश्किल। भारत ने अफगानिस्तान को 127 रन से हराया, तीसरे टी-20 में अभिषेक ने 108 रन बनाए, सैमसन की फिफ्टी; नीतीश-बिश्नोई को 3-3 विकेट। नोएडा सीपी लक्ष्मी सिंह, वाराणसी सीपी मोहित अग्रवाल, डीआईजी मुरादाबाद मुनिराज जी और लखनऊ डीसीपी रवीना त्यागी भी शामिल। कानपुर के श्रवण कुमार सिंह, नोएडा के रवि शंकर निम और चित्रकूट एसपी अरुण कुमार सिंह भी संभावित तबादला सूची में। प्रमोद कुमार, अतुल कुमार शर्मा द्वितीय, सोनम कुमार, रविंद्र कुमार, श्रुति श्रीवास्तव और चिराग जैन के नाम भी शामिल। शिवा सिंह, अमित कुमावत, नीतू, एडीसीपी प्रीति यादव, श्रुति श्रीवास्तव और विक्रम दाहिया भी दायरे में। चुनाव के मद्देनजर शासन स्तर पर भी कई अहम प्रशासनिक बदलाव होने की संभावना। लखनऊ : यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बड़े अफसरों के तबादले की तैयारी। चुनाव से पहले पुलिस-प्रशासन में 3 साल से अधिक समय से तैनात अफसर हटाए जाएंगे। एडीजी कानून-व्यवस्था अमिताभ यश समेत कई पुलिस कमिश्नर व अन्य अधिकारी दायरे में। चुनाव आयोग आमतौर पर 3 साल या अधिक कार्यकाल पूरा कर चुके अफसरों का तबादला करता है। यूपी विधानसभा का कार्यकाल 22 मई 2027 तक, इसी आधार पर कटऑफ 31 मई 2027 मानी जा रही है। 2027 चुनाव के मद्देनजर यूपी पुलिस की फील्ड पोस्टिंग वाले करीब 20 आईपीएस अफसर भी हटेंगे। सुलतानपुर। लैला से मिलने रात में पहुंचे मजनू को चोर समझकर ग्रामीणों ने कूटा। बराबर होता था आना-जाना, नजरें बचाकर निकल जाता था युवक, 19 सितंबर की रात ‘चोर-चोर’ के शोर में इश्क का बुखार उतरा। जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में 2 आतंकियों का एनकाउंटर, दोनों पाकिस्तानी, सुरक्षाबलों का ऑपरेशन कल से जारी; इस साल 15 आतंकी मारे जा चुके। आईफोन-18 और प्रो मैक्स पहले पाने की होड़: दिल्ली-मुंबई में एपल स्टोर के बाहर रात से ही डटे युवा, लगी लंबी कतार। ट्रम्प ने कनाडा को लेकर यूरोप को धमकी दी, कहा- EU में शामिल किया तो भारी टैरिफ लगाऊंगा, व्यापार भी रोक दूंगा। करीब तीन साल के अंतराल के बाद अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे ब्याज दरें 3.75 से 4% तक पहुंच गई हैं। फेडरल रिजर्व के इस रुख के बाद दुनियाभर के बाजारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। इसका सबसे तगड़ा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत पर बिल्कुल साफ दिखेगा। जापान में पहली बार एक लाख लोग शतायु: स्वस्थ खान-पान, सक्रिय जीवन से हो रही लंबी आयु; 100 पार में 87.6% महिलाएं। बांग्लादेश में टॉर्च की रोशनी में मरीजों का इलाज, 20 साल का सबसे बड़ा बिजली संकट; भारत पहले ही ज्यादा बिजली दे रहा, मदद मुश्किल। भारत ने अफगानिस्तान को 127 रन से हराया, तीसरे टी-20 में अभिषेक ने 108 रन बनाए, सैमसन की फिफ्टी; नीतीश-बिश्नोई को 3-3 विकेट। नोएडा सीपी लक्ष्मी सिंह, वाराणसी सीपी मोहित अग्रवाल, डीआईजी मुरादाबाद मुनिराज जी और लखनऊ डीसीपी रवीना त्यागी भी शामिल। कानपुर के श्रवण कुमार सिंह, नोएडा के रवि शंकर निम और चित्रकूट एसपी अरुण कुमार सिंह भी संभावित तबादला सूची में। प्रमोद कुमार, अतुल कुमार शर्मा द्वितीय, सोनम कुमार, रविंद्र कुमार, श्रुति श्रीवास्तव और चिराग जैन के नाम भी शामिल। शिवा सिंह, अमित कुमावत, नीतू, एडीसीपी प्रीति यादव, श्रुति श्रीवास्तव और विक्रम दाहिया भी दायरे में। चुनाव के मद्देनजर शासन स्तर पर भी कई अहम प्रशासनिक बदलाव होने की संभावना। लखनऊ : यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बड़े अफसरों के तबादले की तैयारी। चुनाव से पहले पुलिस-प्रशासन में 3 साल से अधिक समय से तैनात अफसर हटाए जाएंगे। एडीजी कानून-व्यवस्था अमिताभ यश समेत कई पुलिस कमिश्नर व अन्य अधिकारी दायरे में। चुनाव आयोग आमतौर पर 3 साल या अधिक कार्यकाल पूरा कर चुके अफसरों का तबादला करता है। यूपी विधानसभा का कार्यकाल 22 मई 2027 तक, इसी आधार पर कटऑफ 31 मई 2027 मानी जा रही है। 2027 चुनाव के मद्देनजर यूपी पुलिस की फील्ड पोस्टिंग वाले करीब 20 आईपीएस अफसर भी हटेंगे। सुलतानपुर। लैला से मिलने रात में पहुंचे मजनू को चोर समझकर ग्रामीणों ने कूटा। बराबर होता था आना-जाना, नजरें बचाकर निकल जाता था युवक, 19 सितंबर की रात ‘चोर-चोर’ के शोर में इश्क का बुखार उतरा।

शाह से जवाबदेही की मांग की बाढ़ में बहा मानसून सत्र

Published By Santosh Kumar SinghAuthor: राजेंद्र शर्मा (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)·12 Aug 2026843
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शाह से जवाबदेही की मांग की बाढ़ में बहा मानसून सत्र

हैरानी की बात नहीं है कि संसद के मानसून सत्र का तीसरा और आखिरी सप्ताह भी गतिरोध पर ही खत्म होने की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। गतिरोध की वजह वही है, जो मोदी राज में एक नया नॉर्मल ही हो गयी है ; सत्तापक्ष को अपनी निरंकुश ताकत पर किसी भी तरह की जवाबदेही मंजूर नहीं है, जबकि विपक्ष को उसकी निरंकुशता चलने देना मंजूर नहीं है। याद रहे जवाबदेही सुनिश्चित करने के विपक्ष के इस बढ़ते दबाव के पीछे, जनता की बढ़ती आवाज है। वास्तव में कुछ ऐसा ही टकराव, बेशक कुछ भिन्न रूप में पूरे देश ने नीट तथा अन्य केंद्रीय परीक्षाओं में भारी गड़बड़ियों के मुद्दे पर, युवाओं के गुस्से के गिर्द देखने को मिले, जेन-जी के आंदोलन में देखा था। यह संयोग ही नहीं है कि इस आंदोलन की केंद्रीय मांग, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी, जो मांग मोदी राज को युवाओं के महीनों के आंदोलन के बाद, आखिरकार स्वीकार करनी पड़ी।

यह मांग जैसा कि अनेक राजनीतिक प्रेक्षकों ने दर्ज किया है, सारत: जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग थी। यह मांग करने वालों में भी शायद ही किसी को यह भ्रम होगा कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से कोई बहुत बड़ा बदलाव आएगा। फिर भी यह मांग, जवाबदेही के जनतांत्रिक सिद्घांत की पुनर्स्थापना के लिए जरूरी थी। यह मांग इसलिए और भी जरूरी थी कि मोदीशाही में भारी विफलताओं के लिए भी कार्यपालिका को जवाबदेही से बचाने पर सारी शासकीय और राजनीतिक ताकत लगाने को नियम ही नहीं बना दिया था, बल्कि जनतांत्रिक जवाबदेही को ही नकारने को, इस नियम के रूप में एक सिद्घांत के स्तर पर ही पहुंचा दिया था कि — इस राज में इस्तीफे नहीं होते हैं! सरकार के इस हठपूर्ण रुख के चलते, जंतर-मंतर पर ही करीब महीने भर धरना चला और तीन हफ्ते भूख हड़ताल। आखिरकार, कॉकरोच जनता पार्टी और वामपंथी व अन्य छात्र संगठनों की पहल पर, युवाओं ने मोदीशाही को जवाबदेही स्वीकार करने और शिक्षा मंत्री से इस्तीफा दिलवाने के लिए मजबूर कर दिया।

बहरहाल, जिस आशंका से बचने के लिए मोदीशाही ने 'हमारे यहां इस्तीफे नहीं होते' का सिद्घांत गढ़कर, जनतांत्रिक जवाबदेही का दरवाजा बंद किया था, वह आशंका सच साबित हुई। जवाबदेही की मांग, सिर्फ धर्मेेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर ही नहीं रुकनी थी और नहीं रुकी। प्रधान के इस्तीफे का ऐलान होने तक, मोदीशाही में नंबर दो माने जाने वाले और मोदी के परम विश्वासपात्र, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की जवाबदेही के गंभीर सवाल प्रमुखता से सामने आ चुके थे। इन सवालों का संबंध सबसे बढ़कर, जंतर-मंतर पर युवा आंदोलन के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में आयोजित, शांतिपूर्ण 'संसद मार्च' पर बर्बर पुलिस दमन के औचित्य से था। दिल्ली में प्रदर्शनों के इतिहास का यह सबसे बर्बर दमन चक्र, दिल्ली पुलिस के नेतृत्व में और केंद्रीय अर्द्घ-सैनिक बलों की मदद से चलाया गया था और इन दोनों की ही जवाबदेही सीधे केंद्रीय गृहमंत्री, अमित शाह के प्रति है।

20 जुलाई को दिल्ली में हुई यह पुलिस बर्बरता, अपने पैमाने में तो अभूतपूर्व थी ही, जिसमें लगभग पांच सौ लोग घायल हुए थे और इनमें करीब दो सौ को अस्पताल ले जाना पड़ा था। इसके साथ ही, यह बर्बरता अपनी तीव्रता और अपनी नीयत, दोनों में भी अभूतपूर्व थी और इसीलिए, घायलों की संख्या के अलावा भी अनेक गंभीर सवाल हैं, जिनका प्रामाणिक जवाब गृहमंत्री ही दे सकते हैं। इनमें से एक सवाल जो अलग से बहुत ही प्रमुखता से सामने आया है और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचा है, प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल का है। जैसा कि सभी जानते हैं, जम्मू-कश्मीर को छोड़कर शेष भारत में, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गनों के इस्तेमाल का यह पहला ही मामला है।

यह भी याद रखने की बात है कि शुरूआत में शासन और उसके मीडिया पैरोकारों की ओर से ऐसे किसी भी हथियार के उपयोग को सिरे से नकारने की ही कोशिश की गयी थी। लेकिन, बाद में पैलेट गन से घायल होने वालों के सामने आने के बाद, स्वतंत्र मीडिया ने जब रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा पैलेट गनों का इस्तेमाल किए जाने के दस्तावेजी साक्ष्य उजागर कर दिए, उसके बाद ही सचाई को झुठलाने की इन कोशिशों पर कुछ विराम लगा है। प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस घातक अस्त्र के प्रयोग की इजाजत किसने, कब और कैसे दी, इसका प्रामाणिक जवाब तो गृहमंत्री शाह से ही मिल सकता है। इसी प्रकार, एक और महत्वपूर्ण मामला, प्रदर्शनकारियों पर पुलिसिया बर्बरता में, उल्लेखनीय संख्या में बिना वर्दी के लोगों का इस्तेमाल किए जाने का है।

इनके संंबंध में सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या ये बिना वर्दी के पुलिस वाले थे या पुलिस से सहयोग कर के चलने वाले या संघी विजिलांते ग्रुपों के लोग थे। पहली सूरत में भी, शासन की नीयत पर सवाल उठता है, जिसने प्रदर्शन को संभालने की जरूरत के सामने, पुलिसवालों की पहचान छुपाने की कोशिश की होगी? यह कोशिश आम तौर पर वर्दीधारी पुलिस अधिकारी भी अपनी नाम पट्टिकाएं नहीं लगाने के जरिए कर रहे थे। दूसरी सूरत में तो यह शासन के बाकायदा फासीवादीकरण का ही मामला हो जाता है। दोनों ही सूरतों में, सीधे गृहमंत्री की जवाबदेही बनती है। और गृहमंत्री की ही जवाबदेही इसकी भी बनती है कि भीड़ नियंत्रण के आम नियम के विपरीत, संसद मार्च के मामले में सबसे पहले जल तोप धार का प्रयोग किया ही नहीं गया। सीधे लाठियों और आंसू गैस के गोलों की अंधाधुंध बारिश और पैलेट गनों का इस्तेमाल किया गया।

अनुपातहीन तरीके से ज्यादा दमनकारी शक्ति के इस्तेमाल के अलावा एक और महत्वपूर्ण मुद्दा, विशेष रूप से प्रदर्शनकारी युवतियों को निशाना बनाकर, मर्द पुलिस वालों द्वारा यौन-हिंसक दुर्व्यवहार किए जाने का है, जिसकी अनेक जघन्य वारदातें कैमरों में कैद भी हुई हैं। गृहमंत्री ही इन सब सवालों के जवाब दे सकते हैं। इतिहास जैसा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता ने कहा है, पुलिस की इस बर्बरता से गृहमंत्री शाह का दो ही तरह का रिश्ता हो सकता है ; यहां किसी तीसरी स्थिति की गुंजाइश नहीं है। या तो यह बर्बरता, केंद्रीय गृहमंत्री के अनुमोदन से हुई थी, यानी वह इस बर्बरता के लिए जिम्मेदार हैं। या फिर यह बर्बरता, उनके गृहमंत्री पद पर होने के बावजूद हुई यानी वह अपने अधीन बलों को अंकुश में रखने में अक्षम साबित हुए।

दोनों ही स्थितियों में इस अभूतपूर्व बर्बरता की जवाबदेही का एक ही तकाजा है — गृहमंत्री इस्तीफा दें! हैरानी की बात नहीं है कि संसद के मानसून सत्र के पहले सप्ताह के बाद से ही, विपक्ष एक स्वर से इसकी मांग कर रहा है कि गृहमंत्री शाह और उनके नियोक्ता प्रधानमंत्री मोदी, संसद में आएं और संसद मार्च पर हुई बर्बरता पर, जन प्रतिनिधि होने के नाते सांसदों द्वारा उठाए जा रहे सवालों का जवाब दें? इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस बलों की अनुपातहीन हिंसा की जिम्मेदारी तय करने के लिए, अन्य विषयों को पीछे रखकर बहस कराने की विपक्ष की मांग और इस मांग को स्वीकार करने से मोदीशाही के इंकार की वजह से ही, संसद के दोनों सदनों में पूर्ण गतिरोध बना हुआ है और वास्तव में बहस-मुबाहिसा पूरी तरह से रुका हुआ है। अलबत्ता सरकारी काम की औपचारिकताएं बखूबी सारे शोर-शराबे के बीच भी पूरी की जा रही हैं और इसमें एक से लेकर पांच मिनट तक में, कम से कम चार विधेयकों पर लोकसभा का ठप्पा लगवाया जाना भी शामिल है।

संसद नहीं चल रही है, इससे मोदीशाही का खास चिंतित नजर नहीं आना भी, इस निजाम का नया नार्मल है। विपक्ष की जवाबदेही की मांग का जवाब, गृह मंत्री और प्रधानमंत्री, दोनों ही एक प्रकार से संसद का ही अघोषित बहिष्कार कर के दे रहे हैं। गृह मंत्री, शाह का यह 'बहिष्कार' और भी दिलचस्प है। हर रोज विपक्षी सांसद संसद के दरवाजे पर प्रदर्शन कर रहे हैं और 'अमित शाह सदन में आओ, सदन में आकर जवाब दो' के नारे लगा रहे हैं। जबकि खुद संसदीय कार्य मंत्री, किरण रिजिजू के बयान के अनुसार शाह, 'संसद से भाग नहीं रहे हैं' बल्कि वह तो हर रोज संसद भवन में आते हैं, दिन भर वहां अपने दफ्तर में रहते हैं, रात को देर से घर वापस जाते हैं — बस संसद के अंदर ही नहीं आ रहे हैं!

एक अभूतपूर्व पहल करते हुए, राज्यसभा के सभापति के नाते उपराष्ट्रपति ने, संसदीय कार्यमंत्री को गृहमंत्री को यह सूचना देने का निर्देश भी दिया कि विपक्ष का आग्रह है कि उन्हें संसद में आना चाहिए, इसके बावजूद शाह को संसद में पांव रखना मंजूर ही नहीं हुआ है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी, जबकि मानसून सत्र के सिर्फ दो दिन बचे हैं, इसके कोई संकेत नहीं हैं कि शाह इस सत्र में संसद में आएंगे।

लेकिन, शाह के संसद में नहीं आने का अर्थ, संसद का वर्तमान गतिरोध बना रहना ही नहीं है। इसका अर्थ उन विवादास्पद विधेयकों का थोपा जाना मुश्किल हो जाना भी है, जिन्हें सत्र के ऐन आखिर में सब को हैरान करते हुए, अपने गुप्त अस्त्र की तरह अचानक पेश करने को, मोदीशाही ने हर बार की अपनी कार्यनीति ही बना लिया है। इनमें विदेशी चंदे पर और कठोर संघी नियंत्रण कायम करने के लिए लाये जा रहे एफसीआरए संशोधन विधेयक के अलावा परिसीमन संबंधी संविधान संशोधन विधेयक भी शामिल है, जो पिछले सत्र में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गया था। पिछले कुछ महीनों में मोदी-शाह की जोड़ी ने विपक्षी सांसदों में जो सेंध लगायी है, जिसे खुद प्रधानमंत्री ने इसी सत्र के दौरान इन दलबदलुओं को अलग से भोजन पर बुलाने के जरिए अपने पक्ष में और पुख्ता भी किया था, उसकी पृष्ठभूमि में उक्त संशोधन विधेयक को इसी सत्र में दोबारा लाए जाने की आशंकाएं जतायी जा रही थीं। लेकिन, लगता है कि सत्ताधारी पार्टी के इन मंसूबों पर भी, जेन-जी द्वारा उठायी गयी जवाबदेही की मांग की तेज बारिश ने पानी फेर दिया है।

बेशक, लोक सभाध्यक्ष ने नये संसद भवन के मुख्य द्वार पर धूप और बारिश से बचाव के लिए एक पोर्च बनवाने की सिफारिश कर दी है, लेकिन पोर्च बन भी गया तब भी सांसदों का बचाव भले हो जाए, लेकिन जवाबदेही की मांग की बारिश और धूप से मोदीशाही को अब राहत नहीं मिलने वाली है।

लेखक के बारे में

Santosh Kumar Singh

श्री सिंह ‘विजुअल लाइव’ मासिक पत्रिका एवं न्यूज पोर्टल के संपादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्ष 2004 से उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी सेवाएं देते हुए पत्रकारिता का लंबा अनुभव अर्जित किया है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, राष्ट्रीय स्वरूप और भारत प्रतिदिन सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए उन्होंने रिपोर्टिंग की है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लखनऊ आगमन से लेकर राजनीति, प्रशासन, जनसरोकार और शहर की महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। श्री सिंह की विशेष रुचि खोजी पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल में है। इंटरनेट आधारित शोध, सूचना के स्रोतों की पड़ताल और खबर की बारीकियों तक पहुंचने की उनकी कार्यशैली उन्हें अलग पहचान देती है। बदलते मीडिया परिदृश्य में वे तथ्यपरक, विश्वसनीय और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं। पत्रकारिता के साथ उन्हें संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनका मानना है कि एक पत्रकार के लिए जिज्ञासा, निरंतर सीखने की प्रवृत्ति और तथ्यों के प्रति ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। Santosh Kumar Singh की सभी खबरें देखें

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