आजादी के मायने - स्वतंत्रता दिवस विशेष
1947 से 2047 तक भारत में स्वतंत्रता की बदलती परिभाषा और एक बहुलतावादी समाज की नई आकांक्षाएं
15 अगस्त 1947 को भारत के लिए आजादी का अर्थ जितना स्पष्ट था, आज उतना ही व्यापक और जटिल हो चुका है। उस समय स्वतंत्रता का सबसे बड़ा अर्थ विदेशी शासन से मुक्ति, अपनी संप्रभु सत्ता की स्थापना और अपने भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार था। जिस पीढ़ी ने औपनिवेशिक शासन, दमन, विभाजन और पराधीनता का अनुभव किया था, उसके लिए आजादी कोई अमूर्त राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न थी। लेकिन 2026 या 2047 की पीढ़ी के लिए अंग्रेजी शासन से मुक्ति एक ऐतिहासिक तथ्य होगी, वर्तमान की समस्या नहीं। वह आजादी को इस सवाल से परिभाषित करेगी कि उसे अच्छी शिक्षा मिलेगी या नहीं, उसकी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिलेगा या नहीं, वह अपने जीवन और करियर के फैसले स्वयं ले सकेगा या नहीं, उसकी बहन और बेटी सार्वजनिक स्थानों पर कितनी सुरक्षित होंगी, उसे अपनी बात कहने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार कितना वास्तविक होगा तथा जिस डिजिटल दुनिया में उसका अधिकांश जीवन बीत रहा है, उसमें उसकी निजता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता वास्तव में उसके हाथ में कितनी बची है। यही कारण है कि स्वतंत्रता को केवल 1947 की एक ऐतिहासिक घटना मानना उसके जीवंत अर्थ को सीमित करना होगा; स्वतंत्रता दरअसल एक सतत सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और मानवीय प्रक्रिया है, जिसका अर्थ समय के साथ बदलता है और जिसमें हर पीढ़ी अपने अनुभवों के आधार पर एक नया अध्याय जोड़ती है।
1947 की पीढ़ी के लिए पहला और सबसे बड़ा सवाल राष्ट्र का था। भारत को अपने निर्णय स्वयं लेने थे, अपनी सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा करनी थी तथा एक ऐसे लोकतांत्रिक गणराज्य का निर्माण करना था जिसमें सत्ता किसी विदेशी साम्राज्य के प्रति जवाबदेह न होकर नागरिकों के प्रति जवाबदेह हो। स्वतंत्रता के बाद संविधान ने इस राजनीतिक मुक्ति को नागरिक स्वतंत्रताओं और अधिकारों का आधार दिया तथा न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को भारतीय गणराज्य की मूल आकांक्षाओं के रूप में स्थापित किया। इसीलिए भारत की आजादी केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं थी; वह एक ऐसी व्यवस्था बनाने का प्रयास भी थी जिसमें व्यक्ति की गरिमा और उसके अधिकार राज्य की शक्ति से बड़े सिद्धांत बनें। यह काम आसान नहीं था, क्योंकि जिस देश ने अभी-अभी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाई थी, उसके सामने गरीबी, अशिक्षा, खाद्य संकट, कमजोर औद्योगिक आधार, सामाजिक असमानता और विभाजन की त्रासदी जैसी अनेक चुनौतियां थीं। इसलिए स्वतंत्र भारत की पहली पीढ़ी के लिए आजादी का अगला अर्थ था—देश को इतना सक्षम बनाना कि राजनीतिक स्वतंत्रता आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता में बदल सके।
इसी संदर्भ में स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों की विकास परियोजना को समझना चाहिए। बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग, इस्पात संयंत्र, वैज्ञानिक संस्थान, IIT, कृषि अनुसंधान और बाद में हरित क्रांति केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं थे; उनके पीछे उस समय के भारत की वह बेचैनी थी कि राजनीतिक रूप से स्वतंत्र देश भोजन, उद्योग, विज्ञान और तकनीक के लिए हमेशा दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह सकता। यदि 1947 ने विदेशी शासन से मुक्ति दी थी तो अगले दो दशकों ने भारत को भूख, आर्थिक निर्भरता और तकनीकी पिछड़ेपन से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास किया। हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन की तस्वीर बदली और देश को उस स्थिति से बाहर निकालने में मदद की जिसमें खाद्य सुरक्षा स्वयं राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रश्न बन गई थी। इस दौर में स्वतंत्रता का अर्थ था—अपने पैरों पर खड़ा होने की क्षमता।
इसके बाद स्वतंत्रता का प्रश्न राष्ट्र की सीमाओं से निकलकर समाज के भीतर पहुंचा। संविधान ने समानता का वादा किया था, लेकिन भारतीय समाज में जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्रीय असमानताएं सदियों पुरानी थीं। इसलिए 1970 और 1980 के दशकों में यह सवाल अधिक तीखा हुआ कि यदि देश स्वतंत्र है तो क्या उसका प्रत्येक नागरिक भी वास्तव में उतना ही स्वतंत्र है? राजनीतिक लोकतंत्र ने मतदान का अधिकार तो दिया, लेकिन सामाजिक लोकतंत्र की यात्रा कहीं अधिक कठिन साबित हुई। दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों और अन्य वंचित समुदायों के अधिकारों तथा प्रतिनिधित्व की बहस ने स्वतंत्रता को एक नया अर्थ दिया। अब यह केवल 'भारत किसके शासन में रहेगा' का प्रश्न नहीं था, बल्कि 'भारत में किसे सम्मान, अवसर और निर्णय लेने की शक्ति मिलेगी' का प्रश्न भी बन चुका था। इस बदलाव को समझे बिना भारतीय लोकतंत्र की यात्रा अधूरी दिखाई देगी।
1991 का आर्थिक उदारीकरण स्वतंत्रता के अर्थ में एक और निर्णायक मोड़ लेकर आया। आर्थिक संकट के बीच भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को अधिक उदार बनाया और धीरे-धीरे निजी क्षेत्र, विदेशी निवेश, वैश्विक व्यापार तथा प्रतिस्पर्धा के लिए दरवाजे खोले। इसका असर केवल आर्थिक नीतियों तक सीमित नहीं रहा; भारतीय मध्यवर्ग के जीवन और आकांक्षाओं में भी बड़ा परिवर्तन आया। उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर शिक्षा, करियर और यात्रा तक विकल्पों का विस्तार हुआ और भारतीय नागरिक का दुनिया से संबंध पहले से कहीं अधिक प्रत्यक्ष हो गया। लेकिन उदारीकरण ने स्वतंत्रता की एक महत्वपूर्ण दुविधा भी सामने रखी—क्या विकल्पों की संख्या बढ़ जाना ही स्वतंत्रता है? यदि बाजार में हजार विकल्प उपलब्ध हों लेकिन उन्हें खरीदने की आर्थिक क्षमता केवल कुछ लोगों के पास हो तो क्या सभी समान रूप से स्वतंत्र हैं? यदि कोई युवा अपनी पसंद का करियर चुन सकता है लेकिन उस करियर में सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध नहीं है तो उसकी स्वतंत्रता कितनी वास्तविक है? आर्थिक उदारीकरण ने अवसरों का दायरा बढ़ाया, लेकिन उसने यह भी दिखाया कि राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक क्षमता के बीच की दूरी को केवल बाजार अपने आप समाप्त नहीं कर सकता।
फिर इंटरनेट और मोबाइल क्रांति ने स्वतंत्रता का एक बिल्कुल नया आयाम खोल दिया। सूचना, जो लंबे समय तक सरकारों, अखबारों, विश्वविद्यालयों और बड़े संस्थानों के नियंत्रण में रहने वाली शक्ति थी, धीरे-धीरे सामान्य नागरिक की हथेली तक पहुंच गई। एक छोटा व्यवसाय वैश्विक ग्राहक तक पहुंच सकता था, एक विद्यार्थी दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के व्याख्यान सुन सकता था, कोई कलाकार बिना किसी बड़े मीडिया संस्थान के लाखों लोगों तक पहुंच सकता था और कोई नागरिक स्वयं सूचना का निर्माता बन सकता था। यह सूचना के लोकतंत्रीकरण का बड़ा क्षण था। लेकिन इसी के साथ स्वतंत्रता की एक नई उलझन भी पैदा हुई—यदि हर व्यक्ति को बोलने की क्षमता मिल गई है तो सूचना और दुष्प्रचार के बीच अंतर कौन करेगा? यदि सोशल मीडिया हमें हमारी पसंद के अनुरूप सामग्री दिखाता है तो हमारी पसंद कितनी स्वतंत्र है? यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारी आदतों, पसंद, संपर्कों और व्यवहार का विशाल डेटा इकट्ठा कर रहे हैं तो व्यक्ति की निजता और स्वायत्तता का क्या होगा? डिजिटल युग ने यह स्पष्ट कर दिया कि 21वीं सदी में स्वतंत्रता की रक्षा केवल संसद और अदालतों में नहीं, बल्कि डेटा, एल्गोरिदम और तकनीकी संस्थानों की दुनिया में भी करनी होगी।
भारत की स्वतंत्रता की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि इसका कोई एक सामाजिक अनुभव नहीं है। भारत में आजादी का अर्थ किसी महानगर के उच्च-मध्यवर्गीय युवा, किसी छोटे कस्बे की युवती, किसी किसान, किसी आदिवासी समुदाय, किसी दलित परिवार, किसी प्रवासी मजदूर, किसी उद्यमी, किसी कलाकार या किसी अल्पसंख्यक नागरिक के लिए समान नहीं हो सकता। किसी के लिए स्वतंत्रता वैश्विक करियर के अवसर हैं, किसी के लिए अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने की क्षमता, किसी के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, किसी के लिए अपनी जमीन और जंगल पर अधिकार, किसी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और किसी के लिए अपनी भाषा, संस्कृति और धार्मिक पहचान के साथ बिना भय के जीने का अधिकार। यही भारत की बहुलता है और इसी वजह से भारत में स्वतंत्रता का प्रश्न हमेशा बहुवचन में मौजूद रहेगा। यहां आजादी का अर्थ एकरंगी नहीं हो सकता, क्योंकि भारत स्वयं एकरंगी समाज नहीं है।
यही कारण है कि भारतीय संदर्भ में स्वतंत्रता और समानता को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। कानून किसी व्यक्ति को बोलने की स्वतंत्रता दे सकता है, लेकिन यदि उसकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति उसे उस स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने की क्षमता ही नहीं देती तो संवैधानिक अधिकार का वास्तविक अनुभव अधूरा रह जाता है। एक बच्चे को विद्यालय में प्रवेश मिल जाना महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलती तो अवसर की समानता अभी पूरी नहीं हुई। एक महिला को काम करने का कानूनी अधिकार मिल जाना जरूरी है, लेकिन यदि सुरक्षित परिवहन, कार्यस्थल की सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति नहीं है तो उसकी वास्तविक स्वतंत्रता सीमित रहेगी। इसलिए स्वतंत्रता का अगला चरण केवल अधिकारों के विस्तार का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों के निर्माण का है जिनमें व्यक्ति उन अधिकारों का वास्तविक उपयोग कर सके।
आज की भारतीय पीढ़ी के सामने स्वतंत्रता के सवाल इसलिए बिल्कुल अलग हैं। उसका सबसे बड़ा संघर्ष शायद विदेशी शासन से नहीं, बल्कि अवसरों की असमानता, रोजगार की अनिश्चितता, शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक दबाव और तकनीकी निर्भरता से है। एक युवा के लिए स्वतंत्रता का अर्थ यह भी है कि उसकी शिक्षा उसे ऐसा रोजगार दे सके जिससे वह अपने परिवार और अपने भविष्य के बारे में सम्मानजनक निर्णय ले सके। किसी लड़की के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल संविधान में समानता पढ़ लेना नहीं, बल्कि रात में सुरक्षित घर लौटने की वास्तविक संभावना भी है। किसी छोटे शहर के विद्यार्थी के लिए स्वतंत्रता का अर्थ यह हो सकता है कि वह अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से अवसरों से वंचित न हो। किसी किसान के लिए स्वतंत्रता का अर्थ खेती के अलावा दूसरे आर्थिक विकल्पों तक पहुंच हो सकती है। इस अर्थ में स्वतंत्रता का आधुनिक चेहरा 'चुनने की क्षमता' है—और यह क्षमता शिक्षा, आय, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक वातावरण और संस्थागत न्याय से मिलकर बनती है।
2047 की ओर बढ़ते भारत के सामने यह सवाल और गंभीर होगा, क्योंकि उस समय 1947 की पीढ़ी का अनुभव मुख्यतः इतिहास की स्मृति रह जाएगा। 2047 का युवा शायद यह नहीं पूछेगा कि भारत अंग्रेजों से कब मुक्त हुआ; वह पूछेगा कि सौ वर्षों में भारत ने अपने नागरिकों को कितना सक्षम बनाया। वह यह जानना चाहेगा कि क्या जन्म उसकी संभावनाओं की सीमा तय करता है, क्या गरीब परिवार का बच्चा दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय तक पहुंच सकता है, क्या भारतीय विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान हैं या ज्ञान और तकनीक के वैश्विक केंद्र बन चुके हैं, क्या युवाओं को ऐसी नौकरियां मिलती हैं जिनमें उनका कौशल और श्रम सम्मानजनक मूल्य पाता है और क्या देश की आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचा है। 2047 में स्वतंत्रता की सबसे बड़ी कसौटी शायद यही होगी कि भारतीय नागरिक के पास अपने जीवन के कितने वास्तविक विकल्प हैं।
इस बदलते अर्थ में पर्यावरण भी स्वतंत्रता का प्रश्न बनने जा रहा है। 1947 की पीढ़ी के सामने औद्योगीकरण और खाद्य सुरक्षा प्राथमिकताएं थीं, लेकिन 2047 की पीढ़ी के सामने स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, रहने योग्य शहर, जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित कृषि और टिकाऊ ऊर्जा जैसे प्रश्न होंगे। यदि किसी बच्चे को शिक्षा और रोजगार तो मिल जाए, लेकिन वह ऐसे शहर में बड़ा हो जहां हवा सांस लेने लायक न हो, पानी लगातार संकट में हो और अत्यधिक गर्मी उसके स्वास्थ्य तथा काम की क्षमता को प्रभावित करे, तो विकास का अर्थ अधूरा रहेगा। आने वाले दशकों में पर्यावरणीय सुरक्षा को आर्थिक विकास से अलग नहीं किया जा सकेगा और स्वच्छ पर्यावरण स्वयं नागरिक स्वतंत्रता तथा जीवन की गरिमा का हिस्सा बन सकता है।
इसी तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI स्वतंत्रता की परिभाषा में एक नया अध्याय जोड़ने वाली है। यदि मशीनें आज के अनेक routine jobs को करने लगती हैं तो भविष्य की शिक्षा को केवल किसी एक skill की ट्रेनिंग देने से आगे बढ़ना होगा। व्यक्ति को लगातार सीखने, समस्या समझने, सही प्रश्न पूछने, तकनीक का आलोचनात्मक इस्तेमाल करने और बदलते रोजगार बाजार के अनुकूल स्वयं को पुनर्गठित करने की क्षमता चाहिए होगी। ऐसे समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को ऐसी बौद्धिक स्वतंत्रता देना होगा जिससे वह तकनीक का उपयोग कर सके, तकनीक का केवल उपभोक्ता बनकर न रह जाए। आने वाले समय में जिस नागरिक के पास सीखते रहने की क्षमता होगी, वही शायद सबसे अधिक स्वतंत्र होगा।
भारत की बहुलता इस यात्रा को और चुनौतीपूर्ण बनाती है। यहां स्वतंत्रता का अर्थ केवल राज्य से व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन भी है। किसी की धार्मिक स्वतंत्रता दूसरे की सामाजिक शांति से टकरा सकती है, किसी समुदाय की परंपरा व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकारों के सामने प्रश्न खड़ा कर सकती है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच तनाव पैदा हो सकता है। ऐसे में लोकतंत्र की असली परीक्षा केवल यह नहीं कि बहुमत क्या चाहता है, बल्कि यह भी है कि बहुमत के बीच अल्पमत कितना सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता है। भारतीय संविधान ने स्वतंत्रता के साथ समानता, न्याय और बंधुता को इसलिए जोड़ा था, क्योंकि विविध समाज में केवल बहुमत की इच्छा को स्वतंत्रता का अंतिम पैमाना नहीं बनाया जा सकता। भारत की स्वतंत्रता का सबसे परिपक्व रूप वही होगा जिसमें विविधता को सहने से आगे बढ़कर उसे लोकतांत्रिक शक्ति में बदला जा सके।
यदि 1947 से 2047 तक की यात्रा को एक वाक्य में समेटना हो तो कहा जा सकता है कि हमने पहले विदेशी शासन से स्वतंत्रता हासिल की, फिर भूख और आर्थिक निर्भरता से लड़ने की कोशिश की, सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी के प्रश्न उठाए, आर्थिक उदारीकरण के जरिए विकल्पों का विस्तार किया, डिजिटल क्रांति के माध्यम से सूचना तक पहुंच को व्यापक बनाया और अब रोजगार, डेटा, AI, पर्यावरण, निजता तथा व्यक्तिगत गरिमा जैसी नई सीमाओं से जूझ रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि पुराने प्रश्न समाप्त हो गए हैं। भारत में आज भी गरीबी, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, शिक्षा की गुणवत्ता और आर्थिक असुरक्षा जैसे प्रश्न मौजूद हैं; बल्कि स्वतंत्रता की प्रकृति यही है कि एक उपलब्धि दूसरी चुनौती को समाप्त करने के बजाय कई बार नई चुनौती को सामने ले आती है।
इसलिए आजादी को किसी एक तारीख में बंद करके नहीं देखा जा सकता। 15 अगस्त 1947 उसका जन्मक्षण था, लेकिन उसकी यात्रा तब भी जारी रही और आज भी जारी है। हर पीढ़ी को अपने समय की बेड़ियों की पहचान करनी होगी और यह तय करना होगा कि उसके लिए स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ क्या है। हमारे पूर्वजों के लिए वह बेड़ी विदेशी शासन थी; बाद की पीढ़ियों के लिए भूख, अशिक्षा, सामाजिक असमानता और आर्थिक निर्भरता बड़ी चुनौतियां बनीं; आज की पीढ़ी रोजगार, अवसर, डिजिटल निजता, सामाजिक सुरक्षा और अभिव्यक्ति के सवालों से जूझ रही है और आने वाली पीढ़ी के सामने AI, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी असमानता और मानवीय स्वायत्तता जैसे प्रश्न हो सकते हैं। बेड़ियां बदलती रहेंगी तो स्वतंत्रता का अर्थ भी बदलता रहेगा।
2047 में भारत जब स्वतंत्रता की शताब्दी मनाए, तब शायद सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह नहीं होगी कि हमने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में कौन-सा स्थान हासिल किया या हमारे शहर कितने आधुनिक हो गए। उससे बड़ा प्रश्न यह होगा कि क्या हमने ऐसा समाज बनाया जिसमें किसी बच्चे का जन्म उसकी संभावनाओं की सीमा तय नहीं करता, जहां शिक्षा केवल डिग्री नहीं बल्कि सोचने की क्षमता देती है, जहां रोजगार केवल जीविका नहीं बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का आधार बनता है, जहां महिला की सुरक्षा उसके अधिकारों का व्यावहारिक हिस्सा है, जहां नागरिक असहमति के बावजूद सम्मान के साथ रह सकते हैं, जहां विविधता को विभाजन की वजह नहीं बल्कि रचनात्मक शक्ति माना जाता है और जहां तकनीकी प्रगति मनुष्य की स्वतंत्रता को कमजोर करने के बजाय उसे विस्तृत करती है।
1947 ने भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाया था; 2047 की चुनौती उससे कहीं बड़ी है—भारत को स्वतंत्र नागरिकों का ऐसा समाज बनाना, जिनके पास केवल अधिकारों की संवैधानिक सूची नहीं बल्कि उन अधिकारों का इस्तेमाल करने की वास्तविक क्षमता भी हो। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक स्वतंत्रता सामाजिक, आर्थिक और मानवीय स्वतंत्रता में बदलती है। किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता का अंतिम प्रमाण उसके झंडे की ऊंचाई नहीं, उसके नागरिक के पास मौजूद विकल्पों की व्यापकता होती है। यदि एक भारतीय अपने जन्म, जाति, लिंग, भाषा, धर्म, आर्थिक स्थिति या भौगोलिक स्थान से परे अपने जीवन की दिशा चुनने में सक्षम है, अपनी प्रतिभा को विकसित कर सकता है, असहमति व्यक्त कर सकता है, सम्मान के साथ काम कर सकता है और अपने भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय ले सकता है, तभी 2047 की स्वतंत्रता 1947 की विरासत का वास्तविक विस्तार कही जाएगी।
आजादी इसलिए कोई पूर्ण विराम नहीं है; यह हर पीढ़ी के हाथ में पहुंचने वाला ऐसा वाक्य है जिसमें अगली पंक्ति उसे स्वयं लिखनी होती है। 1947 की पीढ़ी ने पहला अध्याय लिखा था, 2047 की पीढ़ी को यह तय करना है कि उस किताब का अगला अध्याय कितना अधिक स्वतंत्र, समान, गरिमापूर्ण और मानवीय होगा।
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