आजादी के 79 साल बाद : क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं?
स्वतंत्रता दिवस पर हम हर साल तिरंगा फहराते हैं, राष्ट्रगान गाते हैं और आजादी के संघर्ष को याद करते हैं। लेकिन क्या कभी हमने ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि आखिर स्वतंत्रता है क्या? क्या केवल विदेशी शासन से मुक्ति ही स्वतंत्रता है? और यदि देश स्वतंत्र हो गया है तो क्या देश का हर नागरिक भी वास्तव में स्वतंत्र हो गया है?
15 अगस्त 1947 को भारत ने राजनीतिक गुलामी की लंबी रात से मुक्ति पाई थी। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी। इसके पीछे लाखों लोगों का संघर्ष, त्याग और बलिदान था। अंग्रेज चले गए और सत्ता भारतीयों के हाथ में आ गई। हमने अपना संविधान बनाया, लोकतंत्र अपनाया और नागरिकों को अधिकार दिए। आज हम अपनी सरकार चुनते हैं, अपनी बात कह सकते हैं और अपने भविष्य का फैसला करने का अधिकार रखते हैं। इस अर्थ में भारत निस्संदेह स्वतंत्र है।
लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यहीं समाप्त नहीं हो जाता।
एक गरीब व्यक्ति से पूछिए कि उसके लिए स्वतंत्रता क्या है। संभव है उसका जवाब हो—दो वक्त की रोटी की चिंता से मुक्ति। एक बेरोजगार युवा से पूछिए तो वह कह सकता है—अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर। किसी विद्यार्थी से पूछिए तो शायद वह कहे—ऐसी परीक्षा व्यवस्था जिसमें उसकी मेहनत का ईमानदार मूल्यांकन हो। किसी महिला से पूछिए तो उसके लिए स्वतंत्रता का अर्थ भय से मुक्त होकर अपने फैसले लेने का अधिकार हो सकता है।
यानी स्वतंत्रता हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग रूप लेकर सामने आती है और यहीं से हमें राजनीतिक स्वतंत्रता और वास्तविक स्वतंत्रता के बीच का अंतर समझ में आता है।
राजनीतिक आजादी हमें 1947 में मिल गई, लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता की लड़ाई आज भी जारी है। जब कोई व्यक्ति केवल इसलिए किसी नौकरी में बना रहता है कि उसके पास दूसरा विकल्प नहीं है, जब परिवार कर्ज के बोझ में दबा है, जब बीमारी या शिक्षा का खर्च पूरी आर्थिक व्यवस्था को हिला देता है, तब यह पूछना स्वाभाविक है कि उस व्यक्ति की स्वतंत्रता कितनी वास्तविक है।
इसी तरह केवल मतदान करने का अधिकार होना बौद्धिक स्वतंत्रता की गारंटी नहीं है। यदि हम किसी नेता, विचारधारा, जाति, धर्म या सोशल मीडिया के प्रभाव में बिना सोचे हर बात को सच मान लेते हैं तो हमारा शरीर भले स्वतंत्र हो, लेकिन हमारी बुद्धि स्वतंत्र नहीं है। स्वतंत्र विचार का मतलब किसी की हर बात का विरोध करना नहीं है। इसका मतलब केवल इतना है कि हम अपनी बुद्धि को किराये पर न दें।
आज के समय में यह चुनौती और बड़ी हो गई है। हमारे हाथ में स्मार्टफोन है, दुनिया भर की सूचनाएं हमारी उंगलियों पर हैं, लेकिन सूचना की इस बाढ़ में अपनी सोच को बचाए रखना पहले से कठिन हो गया है। हम क्या देखें, क्या पढ़ें और किस खबर पर विश्वास करें—कई बार यह भी कोई और तय कर रहा होता है। ऐसे में स्वतंत्रता का एक अर्थ यह भी हो जाता है कि हम अपनी सोच के मालिक बने रहें।
लेकिन स्वतंत्रता की सबसे बड़ी और सबसे गहरी परिभाषा शायद राजनीति, अर्थव्यवस्था या समाज से आगे कहीं और छिपी है।
हमारे यहां एक शब्द है—स्वतंत्रता।
इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह शब्द अपने भीतर एक सुंदर संकेत देता है—स्व + तंत्र।
अर्थात् अपने “स्व” का तंत्र। अपना संचालन, अपनी व्यवस्था, अपना नियंत्रण।
अब सवाल उठता है कि यह “स्व” कौन है?
क्या मैं केवल यह शरीर हूं? क्या मैं अपना नाम हूं? अपना पद हूं? अपना पैसा हूं? मेरा परिवार, मेरी नौकरी, मेरी सामाजिक पहचान—क्या यही मेरा पूरा अस्तित्व है?
भारतीय आध्यात्मिक चिंतन हजारों वर्षों से इससे भी गहरा सवाल पूछता आया है—मैं कौन हूं?
शरीर बदलता है, विचार बदलते हैं, भावनाएं बदलती हैं, इच्छाएं बदलती हैं। बचपन का शरीर आज नहीं है। कल की पसंद आज की पसंद नहीं है। कल जो बात बहुत महत्वपूर्ण लगती थी, आज उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। फिर भी इन सभी परिवर्तनों के बीच एक “मैं” लगातार मौजूद होने का अनुभव करता है।
भारतीय दर्शन इसी भीतर के “मैं” को आत्मा या चेतना के रूप में देखने की दिशा देता है।
इस दृष्टि से स्वतंत्रता का आध्यात्मिक अर्थ बहुत गहरा हो जाता है। अपने वास्तविक स्व को जानना और अपने जीवन का संचालन उसी जागरूकता के आधार पर करना—यही आध्यात्मिक स्वतंत्रता की दिशा है।
हम बाहर की गुलामी को तो पहचान लेते हैं, भीतर की गुलामी को अक्सर पहचान ही नहीं पाते।
क्रोध आता है और हम क्रोध में बह जाते हैं। लोभ आता है और हम उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। अहंकार हमें दूसरों से लड़ाता है। भय हमें सही बात कहने से रोक देता है। मोह हमें गलत को भी सही मानने के लिए मजबूर करता है। इच्छाएं हमें एक लक्ष्य से दूसरे लक्ष्य तक दौड़ाती रहती हैं।
फिर सवाल यह है कि इन सबको चला कौन रहा है?
यदि मेरा क्रोध मुझे चला रहा है, मेरा लोभ मुझे चला रहा है, मेरा भय मुझे चला रहा है और मेरी इच्छाएं मेरे निर्णय ले रही हैं तो मैं कितना स्वतंत्र हूं?
शायद असली गुलामी वही है जिसमें इंसान को पता ही नहीं चलता कि वह गुलाम है।
आध्यात्मिक स्वतंत्रता का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि व्यक्ति जंगल में चला जाए और जिम्मेदारियों से बच निकले। असली चुनौती तो संसार के बीच रहते हुए अपने भीतर स्वतंत्र होने की है।
क्रोध आए लेकिन मैं क्रोध का गुलाम न बनूं। धन आए लेकिन धन मेरा मालिक न बन जाए। सफलता मिले लेकिन अहंकार मुझे नियंत्रित न करने लगे। असफलता आए लेकिन मैं भीतर से टूट न जाऊं। प्रशंसा मिले तो मैं बहकूं नहीं और आलोचना हो तो बिखरूं नहीं।
यानी परिस्थितियां रहें, लेकिन मेरा अस्तित्व परिस्थितियों का गुलाम न रहे।
यहीं आकर स्वतंत्रता का अर्थ बहुत व्यापक हो जाता है।
राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है—किसी विदेशी सत्ता की गुलामी से मुक्ति।
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है—आर्थिक मजबूरी की गुलामी से मुक्ति।
बौद्धिक स्वतंत्रता का अर्थ है—अंधानुकरण से मुक्ति।
सामाजिक स्वतंत्रता का अर्थ है—अनावश्यक सामाजिक दबाव से मुक्ति।
और आध्यात्मिक स्वतंत्रता का अर्थ है—अज्ञान और अपने ही मन की गुलामी से मुक्ति।
शायद स्वतंत्रता की हमारी अगली यात्रा यहीं से शुरू होती है।
हमें यह सवाल पूछना होगा कि हम अपने बच्चों को केवल नौकरी के लिए शिक्षित कर रहे हैं या उन्हें स्वतंत्र सोचने की क्षमता भी दे रहे हैं? हम आर्थिक विकास को केवल अधिक कमाई के रूप में देख रहे हैं या आर्थिक आत्मनिर्भरता के रूप में भी? हम लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित कर रहे हैं या असहमति के सम्मान को भी लोकतंत्र का हिस्सा मान रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या हम अपने भीतर झांकना भी सीख रहे हैं?
किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था, सेना या तकनीक में नहीं होती। उसकी असली शक्ति उसके नागरिकों की जागरूकता, विवेक और आत्मनिर्भरता में होती है।
इसलिए 15 अगस्त को केवल यह याद करना पर्याप्त नहीं है कि भारत अंग्रेजों से कब स्वतंत्र हुआ। हमें यह भी पूछना चाहिए कि भारत का नागरिक कब पूरी तरह स्वतंत्र होगा?
जब उसे शिक्षा के लिए संघर्ष न करना पड़े।
जब उसकी मेहनत को अवसर मिले।
जब वह आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
जब वह बिना भय के प्रश्न पूछ सके।
जब वह किसी नेता या विचारधारा का अंधभक्त बनने के बजाय अपने विवेक से निर्णय ले सके।
और जब वह अंततः अपने भीतर झांककर यह पूछने का साहस कर सके—मैं वास्तव में कौन हूं?
शायद स्वतंत्रता का अंतिम पड़ाव बाहर नहीं, भीतर है।
1947 में हमने सत्ता की गुलामी से मुक्ति पाई थी। अब समय है कि हम भय, अज्ञान, आर्थिक मजबूरी, अंधानुकरण और अपने ही मन की गुलामी से मुक्ति की ओर बढ़ें।
क्योंकि जिस दिन मनुष्य अपने वास्तविक “स्व” को पहचान लेता है और अपने जीवन का तंत्र उसी जागरूकता से संचालित करना सीख जाता है, उस दिन वह केवल एक स्वतंत्र नागरिक नहीं रहता।
वह भीतर से भी स्वतंत्र हो जाता है।
और शायद स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भी यही है—
अपने स्व को जानना, अपने जीवन का तंत्र स्वयं संभालना और किसी बाहरी या आंतरिक गुलामी को अपने विवेक पर शासन न करने देना।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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