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सीमा के आखिरी गांव नहीं, अब देश के ‘पहले गांव’: विकास के साथ मजबूत हो रही भारत की सीमाई सुरक्षा

By Santosh Kumar Singh·06 Sept 2026 12:07 PM (IST)
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सीमा के आखिरी गांव नहीं, अब देश के ‘पहले गांव’: विकास के साथ मजबूत हो रही भारत की सीमाई सुरक्षा

नई दिल्ली। भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से लगे गांवों को अब केवल देश की आखिरी बस्तियों के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के रणनीतिक साझेदार के तौर पर विकसित किया जा रहा है। केंद्र सरकार का वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम (VVP) इसी सोच के साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क, बिजली, दूरसंचार, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका की सुविधाओं का विस्तार कर रहा है।

मोदी सरकार ने VVP-I और VVP-II के लिए कुल 11,639 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। दोनों चरणों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्थलीय सीमाओं से जुड़े 2,616 से अधिक गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का लक्ष्य है। इस पहल का बड़ा उद्देश्य सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार के साथ वहां स्थायी आर्थिक अवसर पैदा करना और पलायन को रोकना है।

15 हजार किमी से ज्यादा सीमा, गांवों की भूमिका अहम

भारत सात पड़ोसी देशों के साथ 15,000 किलोमीटर से अधिक लंबी अंतरराष्ट्रीय स्थलीय सीमा साझा करता है। बांग्लादेश के साथ 4,096.7 किमी, चीन के साथ 3,488 किमी और पाकिस्तान के साथ 3,323 किमी सीमा है। लंबे समय तक दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, कमजोर कनेक्टिविटी और सीमित रोजगार के कारण अनेक सीमावर्ती गांव अलग-थलग रहे। इसका असर आबादी और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा।

VVP इसी चुनौती को बदलने की कोशिश है। सरकार ने सीमावर्ती गांवों को ‘अंतिम गांव’ के बजाय ‘पहले गांव’ मानकर विकास का दृष्टिकोण अपनाया है। इसका सीधा संबंध सुरक्षा से भी जोड़ा गया है, क्योंकि सक्रिय और आबादी वाले सीमावर्ती गांव सीमा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

VVP-I से उत्तरी सीमाओं पर शुरुआत

वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम के पहले चरण की घोषणा केंद्रीय बजट 2022-23 में की गई थी और 10 अप्रैल 2023 को अरुणाचल प्रदेश के किबिथू से इसकी शुरुआत हुई। VVP-I में अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और लद्दाख के 19 जिलों में 46 ब्लॉक के सीमावर्ती गांवों की पहचान की गई। करीब 1.42 लाख आबादी वाले 662 रणनीतिक गांवों को व्यापक विकास के लिए प्राथमिकता दी गई।

इस चरण के लिए 4,800 करोड़ रुपये का परिव्यय रखा गया, जिसमें अकेले 2,500 करोड़ रुपये सड़क संपर्क के लिए निर्धारित किए गए।

VVP-II ने बढ़ाया दायरा

पहले चरण के अनुभव को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार ने 2 अप्रैल 2025 को VVP-II को मंजूरी दी। इसे 20 फरवरी 2026 को असम के कछार जिले के नाथनपुर गांव से लॉन्च किया गया। VVP-II के लिए 2028-29 तक 6,839 करोड़ रुपये का प्रावधान है।

इस चरण में 15 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के 334 ब्लॉकों में 1,954 गांवों को शामिल किया गया है। इनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है। VVP-II में सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ स्मार्ट क्लासरूम, पर्यटन सर्किट, सहकारी समितियों, स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास और दूरसंचार कनेक्टिविटी पर भी जोर दिया गया है।

सड़क से बाजार तक पहुंच, पर्यटन से रोजगार

जुलाई 2026 तक VVP-I के तहत गृह मंत्रालय ने 3,020.32 करोड़ रुपये की 1,248 परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 953.47 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके थे और 283 परियोजनाओं के पूरा होने की सूचना दी गई थी।

सड़क संपर्क को इस अभियान का अहम आधार बनाया गया है। 2,481.93 करोड़ रुपये की 111 सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनसे 134 ऐसे गांव जुड़ेंगे जहां पहले सड़क संपर्क नहीं था। इनके साथ 35 लंबे पुलों को भी मंजूरी दी गई है।

पर्यटन को भी सीमावर्ती क्षेत्रों में आय का नया माध्यम बनाया जा रहा है। VVP-I के तहत 145 करोड़ रुपये की 327 पर्यटन परियोजनाओं को मंजूरी मिली है, जिनमें व्यूप्वाइंट, इको-टूरिज्म, इको-रिसॉर्ट, ट्रेक रूट और पर्यटक केंद्र शामिल हैं।

विकास के साथ सुरक्षा का नया समीकरण

VVP का असर केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है। सरकार इसे सुरक्षा, स्थानीय अर्थव्यवस्था, बेहतर शासन और पलायन रोकने से जोड़ रही है। सीमावर्ती गांवों में रोजगार और आय के अवसर बढ़ने से लोगों को अपने गांवों में रहने या वापस लौटने का आधार मिल रहा है।

कार्यक्रम का मूल संदेश यही है कि सीमा सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करने वाले पहलू हैं। सड़क, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से मजबूत होता गांव न केवल बेहतर जीवन देता है, बल्कि सीमा क्षेत्र को अधिक जीवंत और सुरक्षित बनाने में भी भूमिका निभाता है।

इसी सोच के साथ वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम 2047 तक सुरक्षित, समावेशी और विकसित भारत की परिकल्पना में सीमावर्ती गांवों को सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

लेखक के बारे में

Santosh Kumar Singh

श्री सिंह ‘विजुअल लाइव’ मासिक पत्रिका एवं न्यूज पोर्टल के संपादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्ष 2004 से उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी सेवाएं देते हुए पत्रकारिता का लंबा अनुभव अर्जित किया है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, राष्ट्रीय स्वरूप और भारत प्रतिदिन सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए उन्होंने रिपोर्टिंग की है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लखनऊ आगमन से लेकर राजनीति, प्रशासन, जनसरोकार और शहर की महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। श्री सिंह की विशेष रुचि खोजी पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल में है। इंटरनेट आधारित शोध, सूचना के स्रोतों की पड़ताल और खबर की बारीकियों तक पहुंचने की उनकी कार्यशैली उन्हें अलग पहचान देती है। बदलते मीडिया परिदृश्य में वे तथ्यपरक, विश्वसनीय और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं। पत्रकारिता के साथ उन्हें संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनका मानना है कि एक पत्रकार के लिए जिज्ञासा, निरंतर सीखने की प्रवृत्ति और तथ्यों के प्रति ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। Santosh Kumar Singh की सभी खबरें देखें →

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