मानव उत्पत्ति के रहस्यों की पड़ताल करेगा BHU, ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी से समझौता; जनवरी 2027 से शुरू होगा शोध

वाराणसी। मानव की उत्पत्ति कैसे हुई, आधुनिक मानव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक कैसे पहुंचा और बदलते पर्यावरण के बीच उसका अस्तित्व कैसे बना रहा—इन महत्वपूर्ण सवालों के जवाब तलाशने के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के बीच अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग को औपचारिक रूप दिया गया है। इस साझेदारी के तहत जनवरी 2027 से शोध कार्य शुरू होने की तैयारी है। इसमें भारतीय वैज्ञानिक दक्षिण एशिया के मानव इतिहास, आनुवंशिकी और आबादी के विकास से जुड़े पहलुओं पर योगदान देंगे।
22 अक्टूबर को समझौते पर हुए हस्ताक्षर
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, दोनों संस्थानों के बीच Partner Organisation Agreement पर 22 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षर किए गए। BHU की ओर से कुलसचिव राजन श्रीवास्तव और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी की ओर से रिसर्च सर्विसेज की डिप्टी डायरेक्टर लिनेट फरकुहर ने ई-हस्ताक्षर के माध्यम से समझौते की प्रक्रिया पूरी की। इससे अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजना में BHU की भागीदारी को औपचारिक आधार मिला।
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे निभाएंगे अहम भूमिका
इस परियोजना में BHU के जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे Partner Investigator के रूप में शामिल हैं। मानव आनुवंशिकी, प्राचीन डीएनए और दक्षिण एशियाई आबादी के जनसांख्यिकीय इतिहास से जुड़े उनके शोध अनुभव का उपयोग परियोजना में किया जाएगा।
BHU के आधिकारिक विवरण के अनुसार, यह शोध ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के ARC Centre of Excellence for Transforming Human Origins Research के अंतर्गत किया जा रहा है। केंद्र का नेतृत्व प्रोफेसर माइकल पेट्राग्लिया कर रहे हैं।
शोध में क्या पता लगाने की कोशिश होगी?
इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना का प्रमुख सवाल है कि होमो सेपियंस यानी आधुनिक मानव पृथ्वी पर बची हुई मानव प्रजाति कैसे बना। वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास करेंगे कि मानव आबादी का अलग-अलग क्षेत्रों में प्रसार कैसे हुआ, लोगों ने बदलती जलवायु और पर्यावरण के अनुसार खुद को कैसे ढाला और जैविक तथा सांस्कृतिक विविधता का विकास किस तरह हुआ।
शोध में अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिनका मानव इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन जिन पर अब तक अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है। इसके लिए आनुवंशिकी, पुरातत्व, पर्यावरण अध्ययन और सांस्कृतिक इतिहास जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बीच सहयोग किया जाएगा।
सात साल की वैश्विक शोध पहल
ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के नेतृत्व वाले इस शोध केंद्र को ऑस्ट्रेलियन रिसर्च काउंसिल से सात साल की अवधि (2026–2032) के लिए 85 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिलने की जानकारी BHU ने अपने आधिकारिक विवरण में दी है। इस पहल में कई देशों के विश्वविद्यालय और शोध संस्थान भाग ले रहे हैं। भारत से BHU के अलावा चेन्नई की अन्ना यूनिवर्सिटी भी साझेदार संस्थानों में शामिल है।
दक्षिण एशिया के इतिहास को मिलेगी वैश्विक शोध में जगह
इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मानव उत्पत्ति से जुड़े शोध में दक्षिण एशिया और स्थानीय समुदायों के ज्ञान को अधिक महत्व देना है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त आनुवंशिक, पुरातात्विक और पर्यावरणीय साक्ष्यों को एक साथ समझने से मानव प्रवास और विकास के इतिहास की अधिक व्यापक तस्वीर सामने आ सकेगी।
BHU की भागीदारी से वाराणसी के शोधकर्ताओं को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक नेटवर्क के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। जनवरी 2027 से प्रस्तावित शोध के निष्कर्ष सामने आने में समय लगेगा, लेकिन यह सहयोग मानव इतिहास को समझने के लिए भारत की वैज्ञानिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
लेखक के बारे में
Anup Sharma
मूल रूप से वाराणसी, उत्तर प्रदेश के रहने वाले अनूप कुमार शर्मा पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और डिजिटल तकनीक एवं मीडिया के क्षेत्र में विशेष रुचि रखते हैं। तकनीकी दक्षता के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली और बदलती मीडिया तकनीकों को समझने में उनकी गहरी दिलचस्पी है। डिजिटल मीडिया के तेजी से बदलते स्वरूप के बीच वे नई तकनीकों, वेब प्लेटफॉर्म, डिजिटल कंटेंट और ऑनलाइन मीडिया टूल्स को सीखने और उन्हें प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते हैं। तकनीकी सोच और रचनात्मक दृष्टिकोण का बेहतर तालमेल उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। मीडिया और तकनीक के बीच बढ़ते संबंधों को वे भविष्य की पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। तकनीकी नवाचारों के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता को अधिक तेज, प्रभावी और पाठक-केंद्रित बनाने में उनकी विशेष रुचि है। Anup Sharma की सभी खबरें देखें →
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