संभल केस में यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका

संभल। संभल हिंसा से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। मामला आरोपी मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी निवारक हिरासत से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
मुल्ला अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने की। कोर्ट ने 8 सितंबर को सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
पुलिस हिरासत में कथित कबूलनामे पर उठे सवाल
मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत के दौरान दिए गए कथित कबूलनामे को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार बनाया जा सकता है। कोर्ट ने इसी बिंदु पर उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किए थे।
मुल्ला अफरोज को वर्ष 2024 की संभल हिंसा के मामले में आरोपी बनाया गया था। यह हिंसा संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हुई थी। अफरोज की ओर से दावा किया गया था कि उन्हें हिंसा के मामले में बाद में सामने आए कथित कबूलनामे के आधार पर जोड़ा गया।
13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत हिरासत
मुल्ला अफरोज को 13 अक्टूबर 2025 को NSA की धारा 3(2) के तहत हिरासत में लिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में दलील दी थी कि संभल हिंसा के बाद क्षेत्र की कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति प्रभावित हुई थी और उपलब्ध सामग्री के आधार पर उन्हें भविष्य में ऐसी गतिविधियों से रोकने के लिए निवारक हिरासत जरूरी थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में अफरोज की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाने का आदेश दिया है।
क्या है संभल हिंसा का मामला?
संभल में नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी। घटना में चार लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद पुलिस ने हिंसा से जुड़े मामलों में कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी। मुल्ला अफरोज भी इसी मामले में आरोपी बनाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने निवारक हिरासत के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री और पुलिस हिरासत में कथित कबूलनामे की वैधता पर महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। मामले में अदालत के आदेश के बाद अब प्रिवेंटिव डिटेंशन की कार्रवाई को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की स्थिति पर असर पड़ेगा।
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