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दमन से नहीं, संवाद से चलेगा लोकतंत्र: क्या सरकारें जनता के सवालों का जवाब देने को तैयार हैं?

Published By डॉ.अजय कुमार मिश्रा·11 Aug 2026 01:43 PM (IST)
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दमन से नहीं, संवाद से चलेगा लोकतंत्र: क्या सरकारें जनता के सवालों का जवाब देने को तैयार हैं?

किसी भी देश या प्रदेश का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब शासन व्यवस्था पारदर्शिता के साथ कार्य करे और उसमें जनसहभागिता सुनिश्चित हो । लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं, इसलिए उनका मूल दायित्व भी जनता के प्रति ही होना चाहिए । लेकिन विगत कुछ दशकों में यह देखने को मिला है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकारों में धीरे-धीरे एक प्रकार का तानाशाही रवैया विकसित होता जा रहा है । सरकारों को स्वयं यह विश्वास होने लगा है कि उनके द्वारा किए जा रहे कार्य ही सर्वश्रेष्ठ हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि उनके कई निर्णयों में न तो व्यापक जनहित दिखाई देता है और न ही समाज के एक बड़े हिस्से की स्वीकार्यता ।

स्थिति अब अत्यंत चिंताजनक स्वरूप ले चुकी है । सरकारें प्रश्नों का सामना करने के बजाय प्रश्न पूछने वालों से ही चिढ़ने लगी हैं और कई मामलों में “शूट द मैसेंजर” की नीति अपनाती दिखाई देती हैं । यदि कोई व्यक्ति अथवा सामाजिक संस्था सरकार से उचित और लोकतांत्रिक तरीके से कोई प्रश्न करती है, तो उसके प्रश्न का उत्तर देने के बजाय उसकी व्यक्तिगत कमियों, विवादों या कमजोरियों को सामने लाकर उसे ही दोषी सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है ।

जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों को उचित प्रश्नों का खुले मन से सामना करना चाहिए और उनका स्पष्ट उत्तर देना चाहिए । आखिर सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और उसका सीधा दायित्व भी जनता के प्रति ही होता है । सवाल पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है ।

तकनीक, निजता और बढ़ता सरकारी नियंत्रण

बढ़ती आधुनिक तकनीक और आम नागरिक की लगातार समाप्त होती निजता के बीच बने इस नए सामंजस्य ने सरकारों को अभूतपूर्व नियंत्रण की शक्ति प्रदान कर दी है । ऐसी स्थिति में शासन का स्वरूप धीरे-धीरे इस दिशा में बढ़ता दिखाई देता है, जहाँ सरकार का निर्णय और उसका वचन ही शासन का अंतिम रूप मान लिया जाए ।

यह स्थिति न केवल देश के विकास के लिए, बल्कि लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है । प्रश्न यह है कि ऐसी व्यवस्था में आखिर आम नागरिक का भला कैसे संभव है?

आज अनेक सरकारों में सेवा-भाव का अभाव दिखाई देने लगा है और शासन का स्वरूप कहीं-कहीं दमनकारी होता जा रहा है । आम नागरिक की सेहत, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर यदि गंभीर प्रश्न उठते हैं और उनका समाधान करने के बजाय प्रश्न उठाने वाले को ही देशद्रोही, विरोधी अथवा व्यवस्था-विरोधी बताने का प्रयास किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए निश्चित रूप से चिंताजनक स्थिति है ।

हर समस्या के लिए पूर्ववर्ती सरकारों को दोष देना समाधान नहीं

आज एक और प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है । वर्तमान समस्याओं का समाधान करने के बजाय पूर्ववर्ती सरकारों की कमियों को सामने लाकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया जाता है । निश्चित रूप से पिछली सरकारों की गलतियों की समीक्षा होनी चाहिए, लेकिन उनका उपयोग वर्तमान समस्याओं से मुंह मोड़ने के लिए नहीं किया जा सकता ।

वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी वर्तमान समस्याओं का समाधान करना है । जनता ने उसे अतीत की गलतियों का हिसाब देने के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने का अवसर दिया है ।

दुर्भाग्य से, इस पूरी व्यवस्था में बड़े मीडिया संस्थानों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती जा रही है । कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्र सवाल पूछने के बजाय सरकार का प्रवक्ता बनता जा रहा है । बड़े विज्ञापनों और आर्थिक हितों के दबाव में यदि मीडिया जनता के सवालों को उठाने के बजाय सत्ता के पक्ष में खड़ा दिखाई दे, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है ।

बढ़ता असंतोष भविष्य के लिए संकेत

क्या यह व्यवस्था लंबे समय तक चल सकती है? यह निश्चित रूप से विचारणीय प्रश्न है ।

बढ़ती आर्थिक असमानता, आकस्मिक दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें, योग्यता के अनुरूप अवसरों का अभाव, हर क्षेत्र में ठेका प्रणाली लागू करना, व्यक्तिगत असंतोष, ठेका प्रणाली की खामियां, नियमित रोजगार के अवसरों में कमी तथा शिक्षा और स्वास्थ्य के बढ़ते निजीकरण ने आम नागरिक के बीच व्यापक असंतोष को जन्म दिया है ।

यदि इन समस्याओं का समय रहते समाधान नहीं किया गया तो इसका प्रभाव केवल सामाजिक जीवन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोकतांत्रिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा । आगामी चुनावों में जनता अपनी नाराजगी किस रूप में व्यक्त करेगी, यह भविष्य ही बताएगा, लेकिन सरकारों को इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए ।

दमन से शासन संभव है, दिलों पर राज नहीं

सरकारें यदि लालच और नियंत्रण की राजनीति से बाहर निकलकर सेवा-भाव से कार्य करेंगी, तभी वास्तविक और टिकाऊ आर्थिक विकास संभव होगा । दमनकारी नीति से शासन तो किया जा सकता है, लेकिन जनता के दिलों पर राज नहीं किया जा सकता ।

हर परिस्थिति में सरकारों के लिए यह आवश्यक होना चाहिए कि वे आम जनता के प्रश्नों का खुले मंच पर उत्तर दें । सरकार का कार्य केवल अपने अनुरूप नियम बनाकर देश चलाना नहीं होना चाहिए । जिन लोगों के लिए नियम बनाए जा रहे हैं, उनकी आवश्यकताओं, समस्याओं और चिंताओं को समझना तथा यथासंभव उनकी सहभागिता सुनिश्चित करना भी शासन की जिम्मेदारी है ।

सरकार को अपनी कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए और त्वरित एवं उचित कार्रवाई करनी चाहिए । यह समझना आवश्यक है कि तानाशाही और दमन का दुष्प्रभाव लंबे समय तक रहता है, जबकि अपनी गलती स्वीकार कर समय रहते सुधारात्मक कार्रवाई करने से जनता का विश्वास सरकार में और मजबूत होता है ।

किसी एक नीति या प्रणाली को हर विषय पर लागू नहीं किया जा सकता । यदि सरकार ने एक अच्छा कार्य किया है तो उसकी आड़ में कई गलत कार्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता । अच्छे कार्यों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन गलतियों पर सवाल उठाना भी जनता का अधिकार है ।

अब समय है जनता को सुनने का

अब समय आ गया है कि सरकारें केवल अपने पद और अधिकारों की सीमाओं में रहकर शासन करने के बजाय आम जनता की वास्तविक आवश्यकताओं को समझें । जनता के प्रश्नों का उत्तर दें, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करें और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता एवं जनसहभागिता को प्राथमिकता दें ।

दमनकारी नीति अपनाकर या आम नागरिक को देशद्रोही साबित करके सरकार उन सवालों को समाप्त नहीं कर सकती, जो वास्तव में उचित हैं । प्रश्नों को दबाने से प्रश्न समाप्त नहीं होते, बल्कि वे भीतर ही भीतर और अधिक मजबूत होते जाते हैं ।

एक अच्छी सरकार का नैतिक दायित्व है कि वह पहले जनता के हितों की बात करे, उनके लिए कार्य करे और उसके बाद अपने कार्यों का प्रचार करे । केवल प्रचार से शासन की वास्तविक कमियां छिपाई नहीं जा सकतीं ।

जनता के प्रश्नों का उत्तर न देना, शिकायतों पर कार्रवाई न करना और आलोचना को दबाने का प्रयास अंततः सरकार के प्रति अविश्वास को जन्म देता है । यही अविश्वास समय के साथ इतना व्यापक रूप ले सकता है कि इतिहास स्वयं तय कर देता है कि कौन-सी व्यवस्था जनता के साथ खड़ी थी और कौन-सी व्यवस्था जनता से दूर हो गई थी ।

लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता के नियंत्रण में नहीं, बल्कि जनता के सवाल पूछने और सरकार के उन सवालों का जवाब देने में है । इसलिए दमन नहीं, संवाद ही सुशासन का आधार होना चाहिए ।

लेखक के बारे में

डॉ.अजय कुमार मिश्रा

पत्रकार वह व्यक्ति होता है जो समाचार, घटनाओं, और मुद्दों की जानकारी देता है, उनकी जांच करता है, और उन्हें विभिन्न माध्यमों जैसे अखबार, टीवी, रेडियो, या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत करता है। यह लेखक Visual Live के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉ.अजय कुमार मिश्रा की सभी खबरें देखें →

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