'तनखैया' बयान पर आजम खां की मुश्किलें बरकरार, इलाहाबाद HC ने सरकार से मांगा जवाब; 30 नवंबर को सुनवाई

प्रयागराज। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खां की कानूनी मुश्किलों से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों से जवाब मांगा है। मामला वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए उनके कथित 'तनखैया' बयान से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए विपक्षी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर को होगी।
न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ ने आजम खां की ओर से दाखिल याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई सजा और दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए दोनों फैसलों को निरस्त करने तथा सभी आरोपों से बरी किए जाने की मांग की गई है।
2019 के चुनावी भाषण से शुरू हुआ था विवाद
यह मामला 9 अप्रैल 2019 का है। लोकसभा चुनाव के दौरान रामपुर जिले के मनकरा गांव में आयोजित एक जनसभा में आजम खां ने तत्कालीन जिलाधिकारी और अन्य सरकारी अधिकारियों के लिए कथित तौर पर 'तनखैया' शब्द का इस्तेमाल किया था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, उन्होंने अधिकारियों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की और समर्थकों से कलेक्टर से नहीं डरने की बात कही थी।
आरोप है कि भाषण में अधिकारियों के अपमान के साथ विभिन्न वर्गों के बीच वैमनस्य बढ़ाने वाली बातें भी कही गई थीं। इस मामले में तत्कालीन टांडा उपजिलाधिकारी घनश्याम त्रिपाठी ने 15 अप्रैल 2019 को शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद पुलिस ने जांच कर आरोपपत्र दाखिल किया।

एमपी-एमएलए कोर्ट ने सुनाई थी दो साल की सजा
रामपुर की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने 16 मई 2026 को आजम खां को भारतीय दंड संहिता की चार धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने प्रत्येक अपराध के लिए दो वर्ष का साधारण कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। सभी सजाएं साथ-साथ चलाने का आदेश दिया गया था।
आजम खां ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, लेकिन 18 जुलाई 2026 को रामपुर की विशेष अदालत ने उनकी अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
हाईकोर्ट में आजम खां ने क्या दलील दी?
याचिका में आजम खां की ओर से कहा गया है कि उनके भाषण को उसके राजनीतिक और चुनावी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बचाव पक्ष का तर्क है कि टिप्पणी सरकारी अधिकारियों के कामकाज की राजनीतिक आलोचना तक सीमित थी और इसका उद्देश्य किसी धर्म, जाति या समुदाय के खिलाफ नफरत अथवा वैमनस्य फैलाना नहीं था।
याचिका में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उनकी कानूनी स्वीकार्यता पर भी सवाल उठाए गए हैं। बचाव पक्ष ने वीडियो के मूल स्रोत, उसे अपलोड करने वाले व्यक्ति की जानकारी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इन दलीलों पर हाईकोर्ट में अंतिम निर्णय होना अभी बाकी है।
अब 30 नवंबर को होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने फिलहाल राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों से दो सप्ताह में जवाब मांगा है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 30 नवंबर को निर्धारित की गई है। अदालत में आगे होने वाली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड के आधार पर मामले की आगे की दिशा तय होगी।
लेखक के बारे में
Anup Sharma
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